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Explained: क्यों जापान में बच्चों से ज्यादा पालतू जानवरों का रजिस्ट्रेशन हो रहा है?

रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि कैसे जापान में पशु बच्चों को रिप्लेस कर चुके- सांकेतिक फोटो
रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि कैसे जापान में पशु बच्चों को रिप्लेस कर चुके- सांकेतिक फोटो

जन्मदर कम होने के बीच जापान (Japan low birthrate) में लोग कुत्ते-बिल्लियां पाल रहे हैं. हालत ये है कि वहां बच्चों के उत्पादों की जगह पालतू जानवरों के उत्पाद ज्यादा आसानी से मिलते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 2, 2021, 11:10 AM IST
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जापान में जन्मदर लगातार घटने के बीच एक अलग ही ट्रेंड दिख रहा है. वहां लोगों में कुत्ते-बिल्लियां पालने का शौक इतना बढ़ चुका है कि बच्चों से ज्यादा रजिस्ट्रेशन पालतू जानवरों का हो गया है. बता दें कि जापान जैसे देशों में अगर आप पालतू जानवरों को अपने साथ रखते हैं या उसे विदेश यात्रा पर ले जाते हैं तो उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है. ये उनका पहचान पत्र होता है. तो हाल के सालों में बच्चों से ज्यादा पालतू पशुओं का पहचान पत्र बना है.

अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाला Goldman Sachs ने लगभग सारे देशों के आर्थिक ट्रेंड पता करने के दौरान जापान में अनोखा चलन देखा. जापान की अर्थव्यवस्था में गिरावट के लिए कम जन्मदर को जिम्मेदार मानते हुए जब कंपनी ने गौर किया तो पाया कि वहां बच्चों की जगह पालतू पशु ले चुके हैं. बिजनेस इनसाइडर में कंपनी की इस रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि कैसे जापान में पशु बच्चों को रिप्लेस कर चुके.

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इसके मुताबिक साल 2014 में 15 साल के लगभग 16.5 मिलियन बच्चे जापान में थे, जबकि पालतू पशु जैसे कुत्ते-बिल्लियों की संख्या 21.3 मिलियन रही. जापान में पालतू जानवर बच्चों की जगह ले रहे हैं. वहीं जोड़ों में संतान पैदान करने का चाव भी कम हुआ है. इसकी कई वजहें हैं, जिनमें एक बड़ी वजह जापानियों का काम के लिए ऑब्सेशन माना जाता है. बता दें कि जापान में लोग छुट्टियां लेने से इतना बचते हैं कि खुद कंपनियों ने ऐसा नियम बना दिया कि हर कर्मचारी को सालाना कम से कम 14 दिनों की छुट्टी लेनी ही होगी ताकि उनका मानसिक स्वास्थ्य सही रहे.
काम के लिए दीवानगी पुरुषों-महिलाओं में बराबर है तो ऐसे में संतान की जिम्मेदारी कौन ले- सांकेतिक फोटो (pixabay)


काम के लिए दीवानगी पुरुषों-महिलाओं में बराबर है तो ऐसे में संतान की जिम्मेदारी कौन ले. इसका असर वहां की आबादी पर दिख रहा है. बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर जोड़ों ने संतान जन्म पर ध्यान नहीं दिया तो अगले 20 सालों में यहां की 35 प्रतिशत आबादी 80 साल से ज्यादा आयु वालों की होगी. वहीं अगले 5 ही सालों में यानी 2025 तक जापान का हर 3 में से 1 इंसान 65 साल की उम्र से ज्यादा का होगा. बुजुर्ग आबादी बढ़ने का सीधा असर जनसंख्या पर होगा और ये कम होती जाएगी. विशेषज्ञों को डर है कि अगर जनसंख्या न बढ़ाई गई तो अगले 50 सालों में आबादी घटकर महज 80 मिलियन रह जाएगी, और 100 सालों में केवल 40 मिलियन. यानी केवल बुजुर्ग आबादी नहीं बढ़ रही, बल्कि आबादी घट भी रही है.

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इस बीच जापान पालतू जानवरों के मामले में सुपरपावर बन गया. यहां युवाओं से ज्यादा कुत्ते-बिल्लियों की संख्या है. औसत आय के मामले में दूसरे देशों से काफी आगे जापान में लोग अपने पालतू पशु की देखभाल भी शानदार तरीके से कर पाते हैं. इसमें साफ-सफाई, खाना और समय पर टीकाकरण ही नहीं है, बल्कि लोग ज्यादातर वीकेंड पर जानवरों के लिए शॉपिंग करते हैं और नए ट्रेंड के कपड़े लेते हैं. कई बड़े इंटरनेशनल ब्रांड जापान में कुत्तों के लिए डिजाइनर कपड़े बनाने लगे हैं.

कुत्तों के टीकाकरण के मामले में जापान काफी आगे जा चुका है- सांकेतिक फोटो


टोक्यो की हालत ये हो चुकी है कि बच्चों के कपड़ों और जरूरत की चीजें खोजने में भले ही मुश्किल हो, लेकिन कुत्तों के लिए कपड़े और सामान आसानी से मिल जाते हैं. यहां जानवरों की जरूरतें के लिए सज चुकी इंडस्ट्री में सालाना 8.2 पाउंड बिलियन से ज्यादा कमाई होती है. इसमें कुत्तों के लिए योग की क्लास तक शामिल है.

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कुत्तों के टीकाकरण के मामले में जापान काफी आगे जा चुका है. साल 1957 के बाद से वहां कुत्तों या पालतू जानवरों के काटने पर रेबीज का कोई मामला नहीं आया. रेबीज का वैक्सीन दिलवाने के बाद पशु के मालिक को अपने घर की मुख्य दीवार पर वो स्टिकर लगाना होता है, जो डॉक्टरों ने टीकाकरण के बाद दिया था. जापान में ये नियम है ताकि लोग आश्वस्त रहें.

अगर कोई जानवर दूसरे देशों से खरीदकर लाया जाए तो उसे जापान के घर में सीधी एंट्री नहीं मिलती, बल्कि पहले क्वारंटाइन किया जाता है. इसे Animal Quarantine Service (AQS) कहते हैं जिसके लिए सारे ही शहरों में अलग-अलग सेंटर हैं. केवल ऑस्ट्रेलिया, ताइवान, न्यूजीलैंड और फिजी से लाए गए जानवरों को क्वारंटाइन नहीं किया जाता है.

पालतू जानवरों के रहने-खाने पर ही नहीं, बल्कि लोग उनकी मौत के बाद अंतिम संस्कार पर भी लाखों खर्च कर रहे हैं. द गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे कुत्तों की मौत के बाद बौद्ध तौर-तरीकों से उनका अंतिम संस्कार होता है. इसमें भी सामान्य, इकनॉमी, डीलक्स कई श्रेणियां होती हैं.
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