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हैरतअंगेज: अंतरिक्ष से प्रदूषण कम करने जापान ला रहा लकड़ी से बना सैटेलाइट

जापान लकड़ी का सैटेलाइट बना रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)
जापान लकड़ी का सैटेलाइट बना रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

अंतरिक्ष में खराब हो चुके सैटेलाइट्स का कबाड़ (satellite junk in space) जमा है, जिसकी वजह से कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है. यही देखते हुए जापान लकड़ी का सैटेलाइट (wooden satellite by Japan) बना रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 26, 2020, 9:00 AM IST
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कोरोना के बीच भी इस साल अंतरिक्ष की दुनिया में हमने कई अहम काम किए. जापान इसमें सबसे आगे निकलता दिख रहा है. उसने जल्द ही लकड़ी का बना सैटेलाइट लॉन्च करने की घोषणा की है. जापान के मुताबिक इससे स्पेस में प्रदूषण पर रोक लग सकेगी. इसे इको-फ्रेंडली सैटेलाइट कहा जा रहा है, जो साल 2023 तक लाने की योजना है.

पर्यावरण को लेकर काफी संवेदनशील रहा जापान अब लकड़ी का सैटेलाइट लाकर एक हैरतअंगेज काम करने जा रहा है. क्योटो यूनिवर्सिटी और सुमिटोमो फॉरेस्ट्री ने मिलकर इसपर काम भी शुरू कर दिया है. वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द ऐसा सैटेलाइट तैयार हो सके, जो स्पेस में कम से कम प्रदूषण करे.

मानव-निर्मित चीजें जमा हैं स्पेस में
प्रदूषण रोकने के लिहाज से ये कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. बता दें कि न केवल धरती हमारे कारण क्लाइमेट चेंज का शिकार हो रही है, बल्कि अंतरिक्ष में भी जल्दी ही ये नौबत आ सकती है. इसकी वजह ये है कि वहां पर सैटेलाइट स्थापित कर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अब तक 23,000 से भी ज्यादा मानव-निर्मित चीजें जमा हो गई हैं. ये पुराने और खराब हो चुके सैटेलाइटों का कबाड़ है, जो यहां से वहां घूम रहा है. ये कबाड़ ठीक तरह से काम कर रहे सैटेलाइटों को लिए भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है.
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अंतरिक्ष में खराब हो चुके सैटेलाइट्स का कबाड़ जमा है- सांकेतिक फोटो (flickr)




लकड़ी का अधिकतम इस्तेमाल
यही देखते हुए जापान ने लकड़ी के सैटेलाइट पर काम शुरू कर दिया है. यहां रिसर्च की जा रही है कि कैसे लकड़ी का इस्तेमाल अंतरिक्ष में किया जा सकता है. निकेई एशिया नामक जापानी मीडिया में इस रिसर्च के बारे में काफी विस्तार से छपा है कि ये किस तरह से काम करेगा. चूंक स्पेस में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें बहुत तेज होती हैं तो ऐसे एक्सट्रीम वातावरण में लकड़ी फिलहाल कारगर नहीं दिख रही. ऐसे में वैज्ञानिक समझने की कोशिश में हैं कि किस तरह से सैटेलाइट में लकड़ी का अधिकतम इस्तेमाल करने के बाद भी उसे स्पेस में जाते हुए सुरक्षित रखा जा सके.

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अंतरिक्ष में ही नष्ट हो जाएगा
अगर ऐसा मुमकिन हो सका तो ये अंतरिक्ष के पर्यावरण के लिए काफी फायदेमंद होगा. लकड़ी का सैटेलाइट अपना काम पूरा करने के बाद अंतरिक्ष में ही नष्ट हो जाएगा. या फिर धुरी से हटने के बाद बिना किसी खतरे के धरती में वापस लौटाया जा सकेगा और फिर यहां लाकर उसे नष्ट या रिसाइकिल भी किया जा सकेगा. फिलहाल रिसर्च चल रही है और जापान का दावा है कि वो अगले तीन सालों में ये कर दिखाएगा. अगर ऐसा होता है तो स्पेस की दुनिया के लिए ये किसी चमत्कार से कम नहीं होगा.

बहुत से देशों ने अंतरिक्ष में अपने-अपने सैटेलाइट भेज रखे हैं सांकेतिक फोटो (pikist)


क्या होता है सैटेलाइट खराब होने पर
बहुत से देशों ने अंतरिक्ष में अपने-अपने सैटेलाइट भेज रखे हैं. हर सैटेलाइट के साथ ये पक्का होता है कि एक समय के बाद वो खराब हो जाएगा. उनके एक्सपायर होने के बाद उनकी जगह दूसरा सैटेलाइट ले लेता है. लेकिन ये जानना जरूरी है कि आखिर एक्सपायर हो चुके सैटेलाइट के साथ क्या होता है.

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इसके लिए दो विकल्प हैं, जिनमें से चुनाव इस बात तय होता है कि सैटेलाइट धरती से कितनी दूरी पर हैं. अगर सैटेलाइट काफी हाई ऑर्बिट पर हो, तो उसमें तकनीकी गड़बड़ी आने के बाद उसे धरती पर लौटाने में काफी ईंधन खर्च हो सकता है. ऐसे में वैज्ञानिक उसे अंतरिक्ष में ही और आगे भेज देते हैं ताकि वो धरती की धुरी तक कभी आ ही न सके.

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धरती पर लौटाया जाता है
एक और विकल्प भी है, जो ज्यादातर सैटेलाइटों के मामले में काम में आता रहा है. वो है उन्हें धरती पर लौटा लाना और एक जगह जमा करते जाना. अब चूंकि सैटेलाइट अंतरिक्ष से लौटकर आते हैं, लिहाजा सैटेलाइट के मलबे को किसी सुरक्षित जगह जमा करना होता है, जो आबादी से दूर हो. इसके लिए, जिस जगह का इस्तेमाल होता आया है, उसे पॉइंट निमो कहते हैं.

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खराब सैटेलाइट जमा करने के लिए जिस जगह का इस्तेमाल होता है, उसे पॉइंट निमो कहते हैं- सांकेतिक फोटो (flickr)


आज तक कोई नहीं जा सका यहां
निमो पॉइंट किसी खास देश की सीमा में नहीं आता, बल्कि इसके सबसे करीब के द्वीप को भी देखना चाहें तो वो लगभग 2,688 किलोमीटर की दूरी पर है. इस जगह की आबादी से दूरी और दुर्गमता का अनुमान इससे लगता है कि इस जगह की खोज करने वाला तक यहां नहीं गया. एक कनाडियन मूल के सर्वे इंजीनियर Hrvoje Lukatela ने खास फ्रीक्वेंसी के जरिए इसका पता लगाया था. ये आज से लगभग 27 साल पहले की घटना है. इसके बाद इस जगह का इस्तेमाल होने लगा.

जमा हो चुका है कबाड़
यहां पर स्पेस जाने के दौरान या वहां खराब हुई सैटेलाइट या फिर उसका ईंधन गिराया जाता है. ये ढेर इतना ज्यादा है कि इसे धरती पर सैटेलाइटों का कब्रिस्तान कहा जाने लगा है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार अब तक यहां 100 से भी ज्यादा सैटेलाइट का कबाड़ इकट्ठा किया जा चुका है.
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