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Jawaharlal Nehru B’day: कैसे महात्मा गांधी के प्रभाव से बदले जवाहरलाल नेहरू

Jawaharlal Nehru B’day: कैसे महात्मा गांधी के प्रभाव से बदले जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) मतभेदों के बाद भी हमेशा गांधी जी के साथ नजर आए थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) मतभेदों के बाद भी हमेशा गांधी जी के साथ नजर आए थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के जीवन में गांधी जी (Mahatma Gandhi) की भूमिका कई उतार चढ़ाव वाली रही, लेकिन नेहरू ने हमेशा ही गांधीजी के साथ अपने रिश्ते को अपने कुछ मतभेदों की भेंट चढ़ने नहीं दिया. दोनों के बीच इन मतांतरों को लेकर खुलकर बातचीत होती रही, लेकिन नेहरू ने गांधी जी का साथ और सम्मान कभी नहीं छोड़ा और उनके जाने के बाद आधुनिक भारत (India) के निर्माण में गांधी जी के विचारधारा को नीतिगत रूप से शामिल भी किया. लेकिन नेहरू का पूरा जीवन ही गांधीजी के प्रभाव से और ज्यादा मजबूत ही होता रहा.

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    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) की कल्पना बिना महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के नहीं हो सकती है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Freedom Movement) के इतिहास में गांधी जी का नेहरू पर प्रभाव धीरे धीरे बढ़ा, लेकिन नेहरू ने पहली ही मुलाकात से ही गांधी जी को बहुत सम्मान की निगाह से देखा पर शुरू में वे गांधी जी से ज्यादा सहमत नहीं दिखे थे. 14 नवंबर को नेहरू का जन्मदिन है जिसे देश हर साल बाल दिवस के रूप में मनाता है. आइए नेहरू जयंती के मौके पर जानते हैं कि गांधी जी के प्रभाव से नेहरू में कैसे बदलाव आए.

    नेहरू पर गांधी का प्रभाव
    दरअसल कई लोग इस या नेहरू को गांधी के परम भक्त के रूप में देखते हैं या फिर दोनों के बीच की असहमतियों को रेखांकित कर उनके बीच अंतर को दिखाने का प्रयास करते हैं.  लेकिन अगर हमें नेहरू के जीवन के लिहाज से देखें तो पाएंगे कि नेहरू की विचारधारा पर गांधी का बहुत प्रभाव रहा और यह बदलाव रातोंरात नहीं हुआ बल्कि दोंनों के संबंध विकसित होते रहे.

    वकालत में नहीं थी रुचि
    गांधी जी से मुलाकात से पहले नेहरू 1912 में ब्रिटेन से बैरिस्टर बन कर लौटे थे और इलाहबाद  हाईकोर्ट में वकील के तौर पर काम भी करने लगे थे. लेकिन उनके पिता की तरह उनकी वकालत में रुचि नहीं थी. उस समय कांग्रेस में नरमपंथियों को बोलबाला था. वे कांग्रेस के कामकाज से संतुष्ट नहीं थे और स्वतंत्रता आंदोलन में की गति से संतुष्ट नहीं थे. फिर भी उनके मन में गांधी जी के प्रति शुरू से ही बहुत आदर था.

    प्रथम विश्व युद्ध के दौरान
    नेहरू ने 1914 में शुरू हुए विश्व युद्ध में नेहरू पूरी तरह से मित्र राष्ट्रों के खिलाफ भी नहीं थे. उनका झुकाव फ्रांस की ओर ज्यादा था जो युद्ध में अंग्रेजों के साथ था. लेकिन वे भारत में अंग्रेज सरकार के सेंसर शिप  वाले कानूनों की भी खिलाफत करते रहे. 1916 में उन्होंने एनी बेसेंट और  बाल गंगाधर तिलक दोनों की ही होमरूल लीग से जुड़ना पसंद किया. इसी साल लखनऊ पैक्ट के भी वे समर्थक के रूप में दिखे जो हिंदू मुस्लिम प्रतिनिधित्व से संबंधित था.

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    जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) अधिकांश समय स्वतंत्रता आंदोलन की धीमी गति से असंतुष्ट थे. (फाइल फोटो)

    कब हुई दोनों की पहली मुलाकात
    26 दिसंबर 1916 को 27 साल के नेहरू इलाहबाद से लखनऊ रेलवे स्टेशन पर पहुंचे थे. वहां चारबाग स्टेशन के सामने उनकी पहली मुलाकात 47 साल के गांधी जी से हुई जो अहमदाबाद से वहां पहुंचे थे. कांग्रसे के उस लखनऊ अधिवेशन में गांधी जी ने अपना भाषण दिया था और उसी अधिवेशन में दोनों की मुलाकात हुई थी.

    क्या कहा नेहरू ने इस मुलाकात के  बारे में
    अपनी आत्मकथा टूवर्ड्स फ्रीडम में नेहरू ने अपनी और गांधी जी की पहली मुलाकात के बारे में बताया  है. “गांधी जी से मेरी पहली मुलाकात 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में हुई थी. हम सभी दक्षिण अफ्रीका में उनके ऐतिहासिक लड़ाई के प्रशंसक थे. लेकिन वे हमारे जैसे युवाओं से बहुत ही दूर, अलग और अराजनैतिक ही थे. उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय राजनीति में हिस्सा लेने से मना कर दिया था. लेकिन जल्द ही चम्पारण में किसानों और मजदूरों के लिए उनके आंदोलन में हम सभी में उत्साह भर दिया. हमने देखा कि वे अपने तरीके भारत में आजमाने के लिए तैयार थे और उनसे सफलता का भरोसा भी दिख रहा था.

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    असहयोग आंदोलन
    इसके बाद नेहरू और गांधी ने मुड़ कर नहीं देखा. देखा गया कि नेहरू गांधी जी के लिए खुद को बिना शर्त समर्पण करते गए. 1920 में  नेहरू असहयोग आंदोलन में बड़ी सक्रियता के साथ  भाग लिया और जेल भी गए. जब चौरी चौरा घटना की वजह से गांधी जी ने आंदोलन रद्द कर दिया तो उनका देशभर में विरोध हुआ, लेकिन नेहरू पूरी तरह से गांधी जी के साथ खड़े रहे.

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    जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के प्रधानमंत्री कार्यकाल में उनकी नीतियों पर गांधी जी की विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव दिखता है. (फाइल फोटो)

    दोनों में भिन्नता भी दिखी
    1920 के दशक के अंतिम सालों में नेहरू देश के स्वतंत्रता आंदोलन की धीमी गति से साफ तौर पर असंतुष्ट दिखे. वे चाहते थे कि कांग्रेस को स्वराज की जगह पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना चाहिए. नेहरू के विचारों में मार्क्सवाद का स्पष्ट प्रभाव दिखा. पहली बार यहां गांधी से नेहरू बहुत ही अलग दिखे और दोनों के बीच अलग भाषा और राजनीति देखने को स्पष्ट रूप से दिखाई दी. लेकिन उनके नेहरू फिर भी गांधीवादी ही होते गए.

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    गांधी जी ने आजादी के पहले ही  साल 1942 को ही नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इससे पहले भी कई बार दोनों की चिट्ठियों में स्वतंत्रता आंदोलन की गति पर भी दोनों के मतभेद साफ दिखाई देते हैं. गांधी जी ने संदेह भी जताया कि वे दोनों अलग हो सकते हैं. लेकिन नेहरू ने ऐसा कभी होने नहीं दिया. कई मामलों में नेहरू गांधी जी को अव्यवहारिक दिखे लेकिन इसका उन्होंने कभी खुल कर विरोध या जिक्र नहीं किया, बल्कि अपने गांधी वादी होने की पहचान को हमेशा अक्षुण्ण ही रखा.

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