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नेहरू ने क्‍यों कहा था कि मैं ब्राह्मण हूं और ब्राह्मण ही रहूंगा

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 10:03 AM IST
नेहरू ने क्‍यों कहा था कि मैं ब्राह्मण हूं और ब्राह्मण ही रहूंगा
साधुओं के साथ जवाहरलाल नेहरू (फाइल फोटो)

नेहरू मानते थे कि हिंदुओं के यहां बहुत पुरानी बुरी और पीछे ले जाने वाले रस्म-रिवाज माने जाते हैं, फिर भी वे धर्म के विषय में अत्यंत क्रांतिकारी और मौलिक विचारों की चर्चा करने के लिए भी हमेशा तैयार रहते हैं.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 10:03 AM IST
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नई दिल्‍ली. पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्‍म के 130 साल होने के मौके पर उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं की चर्चा हो रही है. ऐसे में उस फर्जी वॉट्सऐप मैसेज और डिजिटल अफवाह की चर्चा भी हो जानी चाहिए कि क्‍या वे मुसलमान थे. कई लोगों ने ऐसे मैसेज भी पढ़ें होंगे, जिसमें बताया जाता है कि वे अपने आपको दुर्घटनावश हिंदू बताते थे.

बहरहाल इन अफवाहों से अलग जरा ईश्‍वर और धर्म के बारे में नेहरू के विचार जानते हैं. यही नहीं यह भी जाना जाए कि वह हिंदू धर्म और खुद की धार्मिकता को लेकर उनके क्‍या विचार थे. इस प्रश्‍न को जानने के लिए 1923 के आसपास का घटनाक्रम बड़ा काम का होगा.

उस समय मौलाना मुहम्‍मद अली कांग्रेस के सभापति और नेहरू कांग्रेस के सचिव थे. मौलाना मुहम्‍मद अली को मुहम्‍मद अली जिन्‍ना समझने की भूल पाठक नहीं करेंगे. दरअसल ये खिलाफत आंदोलन वाले अली बंधु मोहम्‍मद अली और शौकत अली में से एक थे. इनका पूरा नाम मौलाना मोहम्‍मद अली जौहर था. अब आप समझ गए होंगे कि समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान ने रामपुर में जो यूनिवर्सिटी बनाई है, वह इन्‍हीं मोहम्‍मद अली जौहर के नाम पर है.

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बहरहाल मोहम्‍मद अली भारत की आजादी के सच्‍चे सपूत होने के साथ ही पक्‍के मजहबी आदमी थे. अपने धर्म को मानते थे. धर्म को लेकर नेहरू के विचार काफी खुले थे, इसलिए वे कोशिश करते थे कि मौलाना से धर्म के बारे में उनकी चर्चा कम हो.

नेहरू जी ने अपनी आत्‍मकथा 'मेरी कहानी' में इस घटना वर्णन किया है. नेहरू अपनी आत्‍मकथा में जो लिखते हैं उसका हिस्‍सा देखिए:

''एक और विषय था जिस पर अक्सर हमारी बहस हुआ करती थी और वह था ईश्वर. मोहम्मद अली एक अजीब तरीके से अल्लाह का जिक्र कांग्रेस के प्रस्तावों में भी ले आया करते थे. या तो शुक्रिया अदा करने की शक्ल में या किसी किस्म की दुआ की शक्ल में. मैं इसका विरोध किया करता था. वह जोर से बिगड़ते और कहते तुम बड़े नास्तिक हो. मगर फिर भी आश्चर्य है कि थोड़ी देर बाद मुझसे कहते कि एक मजहबी आदमी के सारे जरूरी गुण तुम में हैं, हालांकि तुम्हारा जाहिरा बर्ताव और दावा इसके खिलाफ है."
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नेहरू का मानना था कि किसी भी मत के कट्टर मानने वाले से धर्म पर खुले विचारों की किसी भी किस्म की चर्चा करना हमेशा मुश्किल होता है.


"मैंने कई बार मन में सोचा है कि उनका कहना कितना सच था शायद यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई मजहब की क्या मानी करता है.''

मजहब की बहस से बचते थे नेहरू
नेहरू आगे लिखते हैं: ''मैं उनके साथ हमेशा मजहब के मामले में बहस करना टालता था क्योंकि मैं जानता था इसका नतीजा यही होता कि हम दोनों एक दूसरे पर चिढ़ उठते. मुमकिन था कि उनका जी दुख जाता. किसी भी मत के कट्टर मानने वाले से इस किस्म की चर्चा करना हमेशा मुश्किल होता है. बहुत से मुसलमानों के लिए तो यह शायद और भी मुश्किल हो, क्योंंकि उनके यहां विचारों की आजादी मजहबी तौर पर नहीं दी गई है. विचारों की दृष्टि से देखा जाए तो उनका सीधा मगर तंग रास्ता है. उसका अनुयाई जरा भी दाएं बाएं नहीं जा सकता.

हिंदू धर्म के मामले में मुसलमानों से अलग
इसी संबंध में नेहरू लिखते हैं, "हिंदुओं की हालत इस से कुछ भिन्न है, सो भी हमेशा नहीं. व्यवहार में चाहे वे कट्टर हों, उनके यहां बहुत पुरानी बुरी और पीछे ले जाने वाली रस्म रिवाज माने जाते हैं, फिर भी वे धर्म के विषय में अत्यंत क्रांतिकारी और मौलिक विचारों की चर्चा करने के लिए भी हमेशा तैयार रहते हैं. मेरा ख्याल है कि आधुनिक आर्य समाजियों की दृष्टि आमतौर पर इतनी विशाल नहीं होती. मुसलमानों की तरह वे भी अपने सीधे और तंग रास्ते पर ही चलते हैं."

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" विद्या-बुद्धि में बढ़े-चढ़े हिंदुओं के यहां ऐसी कुछ दार्शनिक परंपरा चली आ रही है, जो धार्मिक प्रश्नों में भिन्न-भिन्न विचार-द्ष्टियों को स्थान देती है. हालांकि व्यवहार पर उसका कोई असर नहीं पड़ता. मैं समझता हूं कि इसका आंशिक कारण यह है कि हिंदू जाति में तरह-तरह के और अक्सर परस्पर विरोधी प्रमाण और रिवाज पाए जाते हैं. इस संबंध में यहां तक कहा जाता है कि हिंदू धर्म को साधारण अर्थ में मजहब नहीं कह सकते.फिर भी कितनी गजब की दृढ़ता उसमें है. अपने आप को जिंदा रखने की कितनी जबरदस्त ताकत."

नेहरू का कहना था कि मैं एक ब्राह्मण पैदा हुआ और मालूम होता है कि ब्राह्मण ही रहूंगा, फिर मैं धर्म और सामाजिक रीति रिवाज के बारे में कुछ भी कहता और करता रहूं. हिंदुस्तानी दुनिया के लिए मैं पंडित हूं चाहे मैं उपाधि को नापसंद ही करूं


भले ही कोई नास्तिक हो लेकिन रहता ही हिंदू ही है 
नेहरू इसी मामले में आगे लिखते हैं, "भले ही कोई अपने को नास्तिक कहता हो, जैसा कि चार्वाक था. फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि वह हिंदू नहीं रहा. हिंदू धर्म अपनी संतानों को उनके न चाहते हुए भी पकड़ रखता है. मैं एक ब्राह्मण पैदा हुआ और मालूम होता है कि ब्राह्मण ही रहूंगा, फिर मैं धर्म और सामाजिक रीति रिवाज के बारे में कुछ भी कहता और करता रहूं. हिंदुस्तानी दुनिया के लिए मैं पंडित हूं चाहे मैं उपाधि को नापसंद ही करूं.''

हिंदू धर्म को लेकर उदार थे नेहरू के विचार 
दरअसल धर्म और खासकर हिंदू धर्म को लेकर नेहरू के विचार खासे उदार थे. वे महात्‍मा गांधी की उसी धार्मिक दृष्टि से प्रेरणा लेते थे जो कहती थी कि इतने विशाल देश को धर्म को किराने रखकर नहीं चलाया जा सकता. उनके लिए धर्म का मतलब एक निजी आध्‍यात्मिकता थी. हां, वे इसके राजनैतिक इस्‍तेमाल के खिलाफ जीवन भर डटे रहे.

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First published: November 9, 2019, 8:54 AM IST
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