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    जानें, स्वामी विवेकानंद के बारे में क्या थे नेहरू के विचार

    नेहरू कहते हैं कि न केवल उनके, बल्कि उनकी पूरी पीढ़ी पर विवेकानंद का गहरा असर रहा
    नेहरू कहते हैं कि न केवल उनके, बल्कि उनकी पूरी पीढ़ी पर विवेकानंद का गहरा असर रहा

    पंडित जवाहरलाल नेहरू मानते थे कि न केवल उनकी, बल्कि बाद की तीन पीढ़ियां भी स्वामी विवेकानंद (Jawaharlal Nehru on Swami Vivekananda) से काफी प्रभावित रहीं. साथ ही वे युवाओं को उन्हें पढ़ने की सलाह देते थे.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 13, 2020, 7:10 AM IST
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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को एक वर्चुअल इवेंट के जरिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण किया. नेहरू कैंपस में ये आदमकद प्रतिमा तीन सालों से अनावरण के इंतजार में थी. वैसे बता दें कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर भी विवेकानंद की बातों का गहरा असर था, जो अक्सर उनकी बातों से भी झलकता था.

    पंडित नेहरू ने अपनी किताब 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में विवेकानंद का जिक्र किया है. वे लिखते हैं कि उन्होंने तब दुखी और उम्मीद छोड़ चुके हिंदुओं के लिए दिमाग के लिए किसी टॉनिक का काम किया. उन्हें यकीन दिलाया कि उनके अतीत की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि वे उसपर गर्व कर सकें.

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    नेहरू साफ कहते हैं कि न केवल उनके, बल्कि उनकी पूरी पीढ़ी पर विवेकानंद का गहरा असर रहा. वे एक जगह इस बात का जिक्र भी करते हैं. मैं नहीं जानता कि नई पीढ़ी में से कितने लोग स्वामी विवेदानंद के भाषण और उनके लेखन को पढ़ते हैं लेकिन मैं ये कह सकता हूं कि हमारी पीढ़ी के काफी लोगों पर उनका गहरा असर रहा. मैं ये भी सलाह देता हूं कि युवा पीढ़ी को भी उन्हें पढ़ना चाहिए. इससे उन्हें काफी कुछ सीखने का मौका मिलेगा.
    jawaharlal nehru
    पंडित नेहरू ने अपनी किताब 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में विवेकानंद का जिक्र किया


    विवेकानंद के एक-एक शब्द के बड़े मायने होते थे. उनकी पूरी शख्सियत ही काफी ओजस्वी थी और वे बेहद विचारवान थे और यही बात उनके लेखन में भी मिलती है. उनके लेखन का सबसे बड़ी खूबी यही है कि कोई भी शब्द बिना काम का नहीं. हर शब्द गहरे विचार से उपजा है. वे अपने दिल और दिमाग को हरेक शब्द में उड़ेल देते थे. यही वजह है कि आगे बढ़ने को इच्छुक युवा पीढ़ी अगर विवेकानंद की लेखनी को पढ़े तो काफी सुधार हो सकता है.

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    देश के प्रथम प्रधानमंत्री खुद काफी शानदार वक्ता हुआ करते थे, लेकिन वे स्वयं स्वामी विवेकानंद के भाषणों से प्रभावित थे. वे अक्सर इस बात का जिक्र किया करते थे कि कैसे विवेकानंद के भाषणों में अच्छे वक्ता की सारी खूबियां थीं. नेहरू का मानना था कि उनके भाषण केवल ओज से ही भरे नहीं होते थे, बल्कि उनमें गहरी दृढ़ता और भावना दिखती थी. ये एक बड़ा कारण है कि वे जब भी बोले, सुनने वालों पर गहरा असर छोड़ गए. बड़ी-बड़ी शख्सियतों को मिलाकर देश की लगभग तीन पीढ़ियों पर उनका गहरा असर रहा.

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    आजादी के दौरान काफी उथल-पुथल रही. इस दौरान काफी कुछ ऐसा हुआ, जिसके कारण लोग भूल जाते हैं कि किस लोगों ने देश को आजादी की ओर ले जाने के लिए पहले कदम रखे. लेकिन अगर आप विवेकानंद के भाषणों को पढ़ते हैं तो इसका अंदाजा हो पाता है. विवेकानंद के भाषण सालों-साल बीतने के बाद भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे बुनियादी बातों और समस्याओं पर बात करते हैं. यानी अगर युवा उन्हें पढ़ेंगे तो आज भी वे उनके काम के साबित होंगे.

    स्वामी विवेकानंद की लिखी हुई बातें आज भी प्रासंगिक हैं


    पंडित नेहरू ने माना था कि विवेकानंद के कारण हम अपनी विरासत पर गर्व करना सीख सके. लेकिन विरासत पर गर्व करने के साथ-साथ उन्होंने गलतियों को भी नजरअंदाज नहीं किया. अपने लेखन और बोलने के दौरान उन्होंने हमारी कमजोरियों और असफलताओं पर भी बात की. गलतियों को सुधारने के लिए वे कई बार जोरों से चोट किया करते थे. इसके साथ ही वे उन बातों को भी उठाया करते थे, जिनके कारण अपनी कमजोरी के वक्त में भी देश मजबूती से उठ खड़ा हुआ और अपनी महानता बनाए रखी.

    जवाहरलाल नेहरू मानते हैं कि स्वामी विवेकानंद राजनेता की परिभाषा से अलग होने के बाद भी एक महान नेता थे. देश में नए आंदोलन को चलाने में उन्होंने एक नींव की तरह काम किया. उनके बाद बहुत से लोग जो देश सुधार के आंदोलन में जुड़े, वे सबके-सब कहीं न कहीं विवेकानंद से ही प्रेरित थे. कुल मिलाकर आज देश जो है, उसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर विवेकानंद का बड़ा योगदान रहा.

    पंडित नेहरू विवेकानंद से इतने प्रभावित थे कि वे बार-बार युवाओं को उन्हें पढ़ने की बात कहते रहे. वे मानते थे विवेकानंद की लेखनी में जो बुद्धिमत्ता और जोश और विवेक है, वो नई पौध को काफी मदद करेगा.
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