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"मेरी समझ में विकास का दूसरा नाम आजादी है" : ज्यां द्रेज़

"मेरी समझ में विकास का दूसरा नाम आजादी है" : ज्यां द्रेज़

ज्यां द्रेज ने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के तमाम उपाय क्यों असफल रहे हैं और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है?

ज्यां द्रेज ने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के तमाम उपाय क्यों असफल रहे हैं और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है?

ज्यां द्रेज ने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के तमाम उपाय क्यों असफल रहे हैं और इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है?

    झुग्गियों में रहने वाले और लंगर में खाने वाले ज्यां द्रेज़ भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से एक हैं. उन्होंने झारखंड जैसे राज्यों में जन वितरण प्रणाली (PDS) में आधार के प्रयोग को बंद करने की बात कही है. साथ ही उन्होंने वर्तमान सरकार की महत्वाकांक्षी योजना डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) को भी असफल बताया है क्योंकि यह वंचित लोगों को फायदा पहुंचाने में नाकाम रही है. वे यह भी मानते हैं कि भारत में बढ़ती भीड़ हिंसा का भारत की अर्थव्यवस्था से भी संबंध है. किसानों की आय बढ़ाने के उपायों से लेकर मनरेगा की गड़बड़ियों तक ज्यां द्रेज ने देश के तमाम मुद्दों पर न्यूज 18 के साथ एक इंटरव्यू में बात की. पढ़ें पूरा इंटरव्यू -

    आधार प्रोग्राम का विरोध क्यों?
    ज्यां द्रेज आधार से वंचितों को होने वाले फायदे की बात से इंकार करते हैं. वे पेंशन, नरेगा और पीडीएस से जुड़े मामलों में इसके नुकसान की बात करते हैं. वे कहते हैं कि भूख से जो देशभर में 12 मौत की खबरें आई हैं उनमें से कम से कम सात केवल आधार के चलते हुई हैं. वे इसका कारण बायोमैट्रिक आथेंटिकेशन की अनिवार्यता को मानते हैं. वे कहते हैं कि आधार से राशन कार्ड को लिंक कराना साधारण जनता के लिेये बिल्कुल आसान नहीं हैं. और इसके चलते साधारण लोगों को बहुत परेशानियां होती हैं.

    द्रेज बताते हैं कि पिछले साल झारखंड सरकार ने लाखों लोगों का राशन कार्ड फर्जी बताकर रद्द कर दिया था, पर वे फर्जी नहीं थे. कनेक्टिविटी और बायोमैट्रिक फेल्योर के चलते कई बार बायोमैट्रिक ऑथेंटिकेशन काम नहीं करता और इसके चलते बहुत से लोग जन वितरण प्रणाली से वंचित रह जाते हैं.



    डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) का विरोध क्यों?
    द्रेज कहते हैं कि कम से कम जन वितरण प्रणाली (PDS) में DBT की सफलता का अभी तक कोई सबूत नहीं है. कम से कम पांच स्टडी में यह असफल साबित हो चुका है. वे उदाहरण देते हैं कि पहले लोगों को सस्ता चावल एक ही जगह पर मिल जाता था. लेकिन अब उसका पैसा लोगों के बैंक खाते में जाता है ताकि वे बैंक से पैसा लेकर बाजार जाकर 32 रुपये किलो के हिसाब से चावल खरीदकर खा सकें. लेकिन बैंक दूर है, वहां भीड़ है साथ ही कई बार पैसा नहीं आता है या दो महीने बाद आता है. कई बार किसी दूसरे के अकाउंट में जाता है. कई बार बैंक में पता चलता है कि कस्टमर सर्विस सेंटर से ही आपको पैसा निकालना पड़ेगा क्योंकि छोटा अमाउंट है. ऐसे में लोगों को काफी परेशानी होती है. खासकर जो गरीब हैं, विधवा हैं, विकलांग और बुजुर्ग हैं उन्हें बहुत ज्यादा परेशानी होती है. इससे पिछले 5-6 महीने में लोगों को जितना मिलना चाहिये था, उसका आधा अनाज मिला है.

    बल्कि झारखंड सरकार ने भी अब इस बात को मान लिया है और केंद्र सरकार को इसे बंद करने के लिये रिक्वेस्ट भी की है, मुझे उम्मीद है कि अब इसे बंद कर दिया जायेगा.



    किसानों की आय क्यों नहीं बढ़ती?
    अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज इसका मुख्य कारण कृषि क्षेत्र में न बढ़ने वाली प्रोडक्टिविटी को मानते हैं. इसके कारण जो किसान डाइवर्सिफाइ नहीं हो रहे और नई फसलें नहीं उगा रहे वो पीछे रह जा रहे हैं. बाकि लोगों का इकॉनमी के हिसाब से आगे बढ़ रहे हैं और इसी के चलते वे परेशान हो जाते हैं.

    वे कहते हैं कि दुख की बात यह है कि आय बढ़ाने के लिये भी जिन उपाय की बात हो रही है, जैसे एमएसपी बढ़ाना या लोन-वेवर आदि. उनसे भी फायदे कि उम्मीद नहीं है. वे साफ करते हैं कि वे इन कदमों के खिलाफ नहीं हैं पर ऐसे उपाय ज्यादातर बड़े किसानों को ही फायदा पहुंचायेंगे. ऐसे किसान जो अपनी फसल नहीं बेचते और अपनी जीविका के लिये फसलें उगाते हैं, उनके लिये एमएसपी बढ़ाने और लोन-वेवर से कोई फायदा नहीं होगा.

    वे कहते हैं कि सारे ही किसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ानी है तो कई तरह के समर्थन सरकार की ओर से चाहिये होंगे, मसलन इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली, सिंचाई, मार्केटिंग, क्रेडिट और इंश्योरेंस आदि. और छोटे किसानों की मदद के लिये तो और भी ऐसे कदम उठाये जाने चाहिये.



    भीड़ हिंसा का आर्थिक पहलू
    अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज मानते हैं कि बढ़ती भीड़ हिंसा पर भी आर्थिक कारणों का प्रभाव है बल्कि कहें कि उन्हें बढ़ाने में आर्थिक कारणों का इस्तेमाल किया जाता है. वे कहते हैं जब अर्थव्यवस्था में आर्थिक संकट या बेरोजगारी है तो इसका फायदा उठाकर कुछ लोग बलि का बकरा ढूंढते हैं. उस माहौल में उनका लोगों को यह समझाना कि मुस्लिम या दलित उनका दुश्मन है, यह ज्यादा मुश्किल नहीं रह जाता.

    द्रेज कहते हैं कि इसका एक ताजा उदाहरण है, 6 दिसंबर, 2017 को राजस्थान में शंभू लाल रैगर नाम के एक इंसान के एक गरीब मुस्लिम को मारकर जिंदा जला देने की घटना. वे कहते हैं, "यह शंभू लाल रैगर कौन है, यह देखने की बात है. वह एक छोटा-मोटा मार्बल का बिजनेसमैन था. इसके बाद नोटबंदी में उसका बिजनेस ठप्प हो गया और वह घर बैठकर ज्यादातर वक्त वीडियोज देखने लगा. उसमें भी ज्यादातर हेट वीडियोज थे. धीरे-धीरे उसका ब्रेनवॉश होता रहा. उसको लगने लगा कि मुसलमान मेरा दुश्मन है और उन्हीं के चलते देश बर्बाद हो गया है. जबकि होना तो ये चाहिये था कि जिसने मारा और जिसे मारा गया दोनों मिलकर सरकार के खिलाफ संघर्ष करते पर ऐसा नहीं हुआ."

    ऐसे में बेरोजगारी या आर्थिक संकट के वक्त लोग अपने आप भीड़ हिंसा करते हैं ऐसा नहीं हैं, मुझे लगता है इसको करवाये जाने के लिये ऐसा दौर आसान हो जाता है.



    किन क्षेत्रों में कितना प्राइवेटाइजेशन हो?
    ज्यां द्रेज कहते हैं, "बाजार की एक भूमिका होती है तो सरकार और सार्वजनिक कार्यवाही की भी एक भूमिका होती है. हम कह सकते हैं कि जहां कांपिटिशन मदद कर सकता है, वहां प्राइवेटाइजेशन से कभी-कभी मदद ली जा सकती है. और जहां कॉपोरेशन की जरूरत है, वहां सार्वजनिक कार्यवाही जरूरी है. उदाहरण के लिये अगर आपको हर तरह की कार चाहिये, तो अच्छी कार पाने में कांपिटिशन जरूर मदद करेगा. लेकिन अगर आपको पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था कायम करनी है तो यह कांपिटिशन से नहीं होगी, यह सरकारी पहल से ही संभव होगा.

    उनका मानना है, खासकर सामाजिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा के मामलों में कांपिटिशन का कोई रोल नहीं है. इसमें कॉपरेशन और पब्लिक एक्शन की अहम भूमिका है.

    वे कहते हैं, "स्वास्थ्य विकास का सबसे बड़ा आधार है और जीवन की गुणवत्ता के लिये सबसे महत्वपूर्ण है. स्वास्थ्य में कांपिटिशन काम नहीं करता है, ये इकॉनमिक्स में तय है. खासकर पब्लिक हेल्थ के मुद्दों जैसे स्वच्छता, टीकाकरण या मच्छरों का नियंत्रण में मुनाफे की गुंजाइश ही नहीं है तो इसमें कांपिटिशन फायदा नहीं करता बल्कि कई बार तो नुकसान भी करता है. जैसे एक कारण है कि मरीज को जानकारी नहीं होती कि उसे बीमारी क्या है और ऐसे में उसका शोषण किया जा सकता है. इसलिये ऐसे मामलों में पब्लिक एक्शन बहुत जरूरी है. ऐसे मसलों में कांपिटिशन से शोषण बनता है. इसलिये प्राइवेट हेल्थ सेक्टर में शोषण बहुत ज्यादा है. पूरी दुनिया की व्यवस्था देख लें तो हेल्थ सेक्टर में सरकार की भूमिका बहुत अहम है. हां ! आपको एअर इंडिया को प्राइवेटाइज करना है तो मुझे उससे कोई समस्या नहीं है. पर सार्वजनिक विकास की बात करें तो उसमें कांपिटिशन से बहुत कम आशा रखें."



    मनरेगा की गड़बड़ियों के कारण
    ज्यां द्रेज जो मनरेगा की ड्राफ्टिंग में प्रमुख थे कहते हैं, "मनरेगा को कभी पूरी तरह सफल नहीं कहा, यह एक संघर्ष रहा है. लेकिन इसने गरीबों की मदद की है और अब भी कर भी रहा है. उदाहरण के लिये, महिलाओं को गांव से बाहर जाने में, गरीबी से लोगों को उबारने में, और ग्राम सभाओं को स्थापित करने में कई तरह की सफलता मिली है."

    वे कहते हैं, "पर गरीब राज्यों में लोगों में जागरुकता नहीं है. मनरेगा को सुधारने के लिये कई कदम उठाये जाने हैं. इसके लिये राजनीतिक पहल बहुत जरूरी है. मनरेगा के मामले में कई बार देखा गया है कि फंड की चोरी करने वालों को किसी न किसी पॉलिटिकल पार्टी से प्रोटेक्शन होता है. ऐसे में जब सरकार सोच लेगी कि हमें मनरेगा को अच्छे से चलाना है न कि बिचौलियों के साथ मिलकर पैसा खाना है तो ही इसे अच्छे से चलाया जा सकेगा."

    द्रेज कहते हैं, "दूसरी बात इन राज्यों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में भुगतान की समस्या बहुत ज्यादा हो चुकी है. जबसे आधार बेस्ड पेमेंट सिस्टम आया है और ई-केवाईसी को जरूरी किया गया, तबसे और समस्याएं बढ़ गई हैं. डिलेड पेमेंट, रिजेक्टेड पेमेंट, डायवर्ट पेमेंट और ई-केवाईसी न करवाने के चलते अब लॉक्ड पेमेंट जैसी कई समस्याएं ऐसे में सामने आ रही हैं. कोई कुछ भी कहे पर यह सच्चाई है कि आज ई-केवाईसी अनिवार्य है. केंद्र सरकार के ही आंकड़ें देखें तो किसी न किसी टेक्निकल ग्लिच के चलते इसी साल 5-6 सौ करोड़ का भुगतान रिजेक्ट हुआ है.  मजदूर लोगों का इससे विमोह हो रहा है. मजदूर रुचि छोड़ेंगे तो मनरेगा को बचाना बहुत मुश्किल हो जायेगा."



    डेवलेपमेंट इकॉनमिक्स बाजार विरोधी है
    अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं, "विकास लालाच से होता है, मैं बिल्कुल नहीं मानता हूं. आप आर्थिक वृद्धि की बात करें तो इसमें कभी-कभी लालच से मदद हो सकती है. लेकिन विकास अलग बात है. मेरी समझ में विकास का दूसरा नाम आजादी है. गरीबी से आजादी, भूख से आजादी, शोषण, बेरोजगारी, असमानता से आजादी. उस संदर्भ में देखें तो आर्थिक वृद्धि में यह मदद कर सकता है. जिससे लोगों की आय बढ़ती है,
    इससे सरकार का रेवेन्यू भी बढ़ता है. और सार्वजनिक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं. लेकिन विकास के लिये और कई चीजें भी बहुत जरूरी हैं उदाहरण के लिये शिक्षा. शिक्षा विकास के लिये सबसे जरूरी है. आर्थिक वृद्धि के लिये, लोकतंत्र के लिये, स्वास्थ्य के लिये, समानता लाने के लिये, लैंगिक समानता के लिये."

    वे यह भी कहते हैं कि पिछले बीस सालों में हमने अगर डेवलपमेंट इकॉनमिक्स से कुछ सीखा तो वह यह कि शिक्षा कई पहलुओं में सुधार के लिये बहुत जरूरी है. अगर उसमें लालच की बात करें तो जो लालची शिक्षक होगा वह अनुपस्थित रहेगा. शिक्षक तो वह है जो बच्चों को प्रेम करता है और ध्यान से उन्हें पढ़ाता है. वे कहते हैं, "विकास के लिये एथिक्स बहुत जरूरी हैं. सादा जीवन न केवल व्यक्ति को शांति दे सकता है बल्कि सामाजिक जीवन के लिये भी अच्छा है."



    भारत में किन चीजों का भविष्य में सकारात्मक परिणाम होगा?
    इस बारे में ज्यां द्रेज कहते हैं, "लोग आज जागरुक और समझदार हो रहे हैं. संघर्ष भी करने लगे हैं. आरटीआई को लेकर हर साल लाखों लोग जवाब मांग रहे हैं और सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरा इस तरह के जवाब के कारण कई राज्यों में सामाजिक नीतियों में सुधार दिख रहा है. मीडिया में कई बार नेगेटिव चीजें आती हैं पर वाकई कई राज्यों में सुधार दिख रहा है. केरल को ही पहले भारत में एक राज्य था जहां सामाजिक विकास दिखता था. बाद में तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश आदि में वहां के अनुभवों से सीखकर योजनाओं को लागू किया गया. इससे कई राज्य सीखने लगे और कई राज्य खासकर उत्तर भारत के जिन्हें बीमारू राज्य कहते हैं उनकी भी हालत में सुधार आया है."

    उनका यह भी मानना है कि पहले इन राज्यों में PDS का जो 80-90 फीसदी बिचौलिये खा जाते थे, उसकी हालत में सुधार आया है और आज हालत उल्टी हो गई है. अब 80 से 90 फीसदी लोगों के पास पहुंच रहा है और 10 से 20 फीसदी आज भी बिचौलिये ले जा रहे हैं.

    ज्यां द्रेज कहते हैं कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण योजना है 'समेकित बाल विकास योजना.' वे इसे भारत की सबसे सुंदर योजना कहते हैं. वे इसका कारण बताते हैं कि मनुष्य का स्वास्थ्य और पोषण बचपन में ही निर्धारित हो जाता है उस वक्त अगर बच्चों को सही पोषण मिलता है तो उनके भविष्य में भी सुधार लाया जा सकता है.

    वे बताते हैं, "अब राज्यों में आंगनवाड़ी व्यवस्था सही से विकसित हो रही है और साथ ही उसके हालात में भी सुधार हो रहा है. आगे भी ऐसे कदमों से योजना को सक्रिय कर सकते हैं. जैसे तमिलनाडु से स्कूल में बच्चों को दिये जाने वाले अंडे तमिलनाडु से शुरू होकर आधे भारत में पहुंच चुके हैं पर इस योजना का कई जगहों पर विरोध भी हो रहा है. खासकर जहां भाजपा की सरकार है वहां वेजिटेरियन लॉबी अंडों का विरोध कर रही है. पर मुझे आशा है कि ऐसे कदम जो तमिलनाडु या केरल जैसे राज्य इस दिशा में उठा रहे हैं, धीरे-धीरे सारे देश में देखने को मिलेंगे."


    हाल ही में राजकमल प्रकाशन से ज्यां द्रेज  की किताब 'भारत और उसके विरोधाभास' प्रकाशित हुई है. यह किताब 'इंडिया एन अनसर्टेन ग्लोरी' का हिंदी अनुवाद है. इस किताब को उन्होंने भारत के नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ मिलकर लिखा है. इस वक्त ज्यां द्रेज रांची यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं. बेल्जियम में जन्मे पर अब भारतीय नागरिक ज्यां द्रेज ने अमर्त्य सेन के साथ मिलकर इस किताब में विस्तार से भारतीय अर्थव्यवस्था और लोककल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा की है.

    यह भी पढ़ें : अर्थशास्‍त्र के क्षेत्र से राजनीति में आए जयंत सिन्‍हाundefined

    Tags: Aadhar card, Indian economy, Landless farmer

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