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नहीं होता ये मुस्लिम नेता तो शायद न बन पाता JNU...

News18Hindi
Updated: November 20, 2019, 6:08 PM IST
नहीं होता ये मुस्लिम नेता तो शायद न बन पाता JNU...
लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में शिक्षा मंत्री रहे मोहम्मद करीब छागला ने ही जेएनयू के विचार को मजबूत किया था.

लाल बहादुर शास्त्री ने शिक्षा मंत्रालय पूर्व न्यायविद मोहम्मद करीम छागला (Mohammadali Carim Chagla) के हाथों में सौंपा था. एमसी छागला गुजराती शिया मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले भारतीय नेता थे. राजनीति में आने से पहले वो बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी थे.

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  • Last Updated: November 20, 2019, 6:08 PM IST
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नई दिल्ली. 27 मई 1964 को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) की मौत के बाद भारतीय राजनीति (Indian Politics) में एक सन्नाटा पसरा हुआ था. नेहरू जैसे नेता का जाना न सिर्फ कांग्रेस के लिए बल्कि विपक्षी पार्टियों के लिए भी आघात जैसा था. सभी ऊहापोह में थे कि भारतीय राजनीति अब किस करवट बैठेगी. ऐसा सोचना स्वाभाविक भी था. नेहरू न सिर्फ एक राजनेता थे बल्कि उनका बौद्धिक कद भी वैश्विक स्तर का था. उनके द्वारा विपक्षी पार्टियों के नेताओं की भी मदद किए जाने के कई किस्से मशहूर हैं. समाजवादी हों, कम्युनिस्ट हों या जनसंघी सभी नेहरू जैसे बड़े कद के नेता की मृत्यु से आहत थे.

शास्त्री और छागला
जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में ही मंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने शिक्षा मंत्रालय पूर्व न्यायविद मोहम्मद करीम छागला (Mohammad ali Carim Chagla) के हाथों में सौंपा. एमसी छागला गुजराती शिया मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले भारतीय नेता थे. राजनीति में आने से पहले वो बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी थे. शास्त्री से पहले उन्हें जवाहर लाल नेहरू भी देश के शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा सौंप चुके थे.

देश का खराब दौर और जेएनयू की कल्पना

ये वो दौर था जब पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध बेहद खराब हालात में थे. विपक्षी भी कांग्रेस पर हमलावर थे. वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के नाम को लेकर समाजवादी नेता अपना विरोध दर्ज करा रहे थे. उनका कहना था कि बीएचयू के नाम से हिंदू शब्द निकाला जाए और इसका पुराना नाम काशी विश्वविद्यालय ही फिर कर दिया जाए. ऐसी स्थितियों के बीच ही नए शिक्षा मंत्री एमसी छागला ने एक नया विश्वविद्यालय बनाने के लिए बिल पेश किया. ये यूनिवर्सिटी थी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी आज का JNU.

लाल बहादुर शास्त्री.
लाल बहादुर शास्त्री.


उस वक्त भारत का शिक्षा मंत्रालय उतना मजबूत नहीं था जितना की बाद के दिनों में हुआ क्योंकि ज्यादातर विश्वविद्यालय राज्यों के अधीन होते थे. मंत्रालय के पास सिर्फ मशविरा देने का अधिकार था. कई राज्यों में अध्यापकों की तनख्वाह बेहद कम थी. शिक्षा मंत्री ने व्यापक स्तर पर ध्यान देकर देश के शिक्षकों की स्थिति जानी. कहा जाता है कि उस समय शिक्षकों की तनख्वाह के बारे में सुनकर छागला ने तंज किया था कि अगर हम शिक्षकों को इतनी कम तनख्वाह देते हैं तो फिर चपरासियों को कितनी सैलरी देते हैं. छागला ने इसे लेकर देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से भी बातचीत की. उन्होंने पीएम को सलाह दी कि अगर हम सिविल सर्वेंट्स के लिए पे कमीशन लगा सकते हैं तो शिक्षकों के लिए क्यों नहीं? छागला ने पीएम से कहा था कि शिक्षकों का काम किसी भी रूप में सिविल सर्वेंट्स से कम नहीं है.
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विज़नरी मंत्री
छागला ने देशभर में शिक्षा को लेकर प्रैक्टिकल सुधार करने की कोशिश की. इसी क्रम में उनका मानना था कि देश की राजधानी दिल्ली में भी एक दूसरा विश्वविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय के अलावा) होना चाहिए. उनका विचार था कि एक वैश्विक सोच और एक्सेलेंस वाले विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए. इस विश्वविद्यालय के जरिए पुराने विश्वविद्यालयों पर से विद्यार्थियों के बोझ को भी कम किया जा सकता था. लंबी उधेड़बुन के बाद आखिरकार एजुकेशन कमीशन में विचार मंथन के बाद एक नया विश्वविद्यालय शुरू करने की बात पक्की हुई. हालांकि भारत जैसे गरीब देश में उस वक्त एक नया विश्वविद्यालय खोलने का विचार आसान नहीं था.

ये भी पढ़ें: JNU पर समाजवादी नेता बोले थे-क्या आप नेहरू के नाम पर चर्च बनाना चाहते हैं? जानें पूरी कहानी

विरोधियों को मनाया
छागला ने इस चुनौती को स्वीकार किया. जेएयू के विचार को लेकर पनपी हर समस्या का उन्होंने समाधान किया और पूरी कोशिश की ये विश्वविद्यालय अपने स्वरूप में देश की सेवा कर सके. छागला ने अगस्त 1965 में राज्यसभा में इस यूनिवर्सिटी को लेकर बिल पेश किया था. इसके ठीक अगले महीने लोकसभा में भी इस बिल को शिक्षा राज्य मंत्री भक्त दर्शन ने पेश किया था. तब समाजवादी नेताओं ने इस यूनिवर्सिटी को लेकर कई सवाल खड़े किए थे. हालांकि यूनिवर्सिटी बनाने की शुरुआत उनके समय में नहीं हो पाई लेकिन छागला उन लोगों में थे जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को एक विश्वविद्यालय बनाने की परिकल्पना की थी.



कौन थे छागला?
30 सितंबर 1900 को बॉम्बे में जन्मे छागला गुजराती शिया मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे. छागला के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. उन्होंने लिंकन कॉलेज लंदन से पढ़ाई करने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की थी. इस दौरान उन्होंने सर जमशेद जी कांगा और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नामी वकीलों के साथ काम किया. शुरुआत में उन्होंने जिन्ना के साथ मुस्लिम लीग के लिए भी काम किया लेकिन बाद में जब जिन्ना ने अलग देश की मांग कर डाली तो उन्होंने राहें बदल लीं. छागला जिन्ना के इस कदम से इतने नाराज हुए कि उन्होंने बॉम्बे मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की.

वो गवर्नमेंट लॉ कॉलेज बॉम्बे में प्रोफेसर बने और यहां पर भीमराव अंबेडकर के साथ काम किया. 1941 में वो बॉम्बे हाईकोर्ट में जज बनाए गए और बाद में 1948 से 1958 तक यहां चीफ जस्टिस भी रहे. जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें देश के शिक्षा मंत्री पद की बागडोर सौंपी थी. तब नेहरू की काफी आलोचना भी की गई थी लेकिन छागला ने साबित किया कि वो इस पद के सबसे योग्य उम्मीवदवार थे.

(इस स्टोरी में कई उद्धरण जेएनयू के प्रोफेसर राकेश बाताब्याल की किताब से लिए गए हैं. इस किताब का नाम है JNU: The Making of a University. )

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First published: November 20, 2019, 5:11 PM IST
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