उस महिला वैज्ञानिक से मिलिए, जिसने सबसे पहले देखा था कोरोना वायरस

कोरोना वायरस की माइक्रोस्कोपिक इमेजिंग की सांकेतिक तस्वीर.

कोरोना वायरस की माइक्रोस्कोपिक इमेजिंग की सांकेतिक तस्वीर.

WHO का मैनुअल लिखे जाने से लेकर एक माइक्रोस्कोपिक तकनीक (Microscopic Technic) और कई पेटेंट्स के लिए मशहूर जून अल्मेडा के बारे में खास यह है कि गरीबी के कारण वो पढ़ाई और फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ले सकी थीं, फिर भी विज्ञान उनका कर्ज़दार रहा.

  • Share this:
जिसने सबसे पहले मनुष्यों को संक्रमित करने वाले कोरोना वायरस (Human Coronavirus) को अपनी आंखों से देखा था, वो पहला वैज्ञानिक कौन था? वो थीं डॉ. जून अल्मेडा. उन्होंने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (Electron Microscopy) की जिन तकनीकों का आगाज़ किया था, उन्हीं की बदौलत बाद में हेपेटाइटिस बी, रुबेला, HIV और कोरोना वायरस आदि को डायग्नोस किया जा सका. जून की ज़िंदगी और उनकी अद्भुत खोजों के बारे में पिटारा खोलती एक किताब (Book on June Almeida) इस महीने बाज़ार में उपलब्ध होने जा रही है, तो इस साइंटिस्ट से जुड़ी खास बातें आपको हैरान भी कर सकती हैं.

कौन थीं जून अल्मेडा?
ब्रिटेन के ग्लासगो में जन्मी और पली बढीं जून बहुत प्रतिभावाना छात्रा थीं, लेकिन गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के कारण 16 साल की उम्र में ही उन्हें स्कूल की पढ़ाई छोड़ देना पड़ी थी. साइंस प्राइज़ जीतने के बावजूद उनका परिवार आगे की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सका, लेकिन इससे जून के भीतर का वैज्ञानिक मर नहीं गया.

ये भी पढ़ें : क्या दो डोज़ के बीच गैप बढ़ाने से ज़्यादा असरदार होती है वैक्सीन?
1947 में जून ने स्कूल छोड़ा और एक स्थानीय लैब में बतौर टेक्नीशियन नौकरी करने लगीं. हर हफ्ते 25 शिलिंग कमाने वाली जून को इस जॉब के साथ ही वायरोलॉजी में दिलचस्पी पैदा हुई. उन्होंने माइक्रोस्कोप के थ्रू उन वायरसों को देखना शुरू किया, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था. यहां तक कि उन्होंने वायरल इन्फेक्शन फैलाने वाले रोगाणुओं को भी देखा.



corona virus research, corona virus study, first case of corona, corona virus discovery, कोरोना वायरस रिसर्च, कोरोना वायरस खोज, कोरोना वायरस का पहला केस, कोरोना वायरस स्टडी
ह्यूमन कोरोना वायरस पहली बार देखने वाली डॉ. जून अल्मेडा.


शादी के बाद कनाडा पहुंचीं जून को इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियन का काम मिला, जो उनके करियर में मील का पत्थर बना. जून के कई जीवनीकार इस बात को रेखांकित कर चुके हैं कि उस वक्त औपचारिक ट्रेनिंग के बगैर काम मिलना आसान था. कैंसर इंस्टीट्यूट में उन्होंने काम करते हुए वायरस और माइक्रोस्कोपी से जुड़े कई वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे, जिससे उन्हें न सिर्फ शोहरत बल्कि मान्यता भी मिली.

ये भी पढ़ें : मुंबई में बिजली गुल क्या चीन का हमला था? जानिए कितना बड़ा है ये खतरा

निगेटिव स्टेनिंग के इस्तेमाल से इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी की तकनीक जून ने ईजाद की थी. इसी तकनीक से सबसे पहली बार वो वायरस देखे गए जो एंटीबॉडी में मौजूद थे. जून ने उस वायरस को देखा, जिसे कोरोना के नाम से पहचाना गया. यही नहीं, पहली बार रुबेला वायरस देखने वाली भी जून ही थीं. इसी तरह, हेपेटाइटिस बी वायरस के दो अहम कंपोनेंट्स को समझने में भी जून का योगदान अहम था.

जून के कुछ दिलचस्प फैक्ट्स
इससे पहले कि आपको बताएं कि कोरोना वायरस को देखने वाली जून पहली वैज्ञानिक कैसे बनी थीं, उनकी ज़िंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें जानिए, जो बेहद दिलचस्प भी हैं.

ये भी पढ़ें : प. बंगाल चुनाव: कांग्रेस से हाथ मिलाने वाली ISF, वोट काटेगी या किंगमेकर बनेगी?

* जून के पिता बस ड्राइवर थे, जिसकी वजह से वो प्रतिभावान जून को ज़्यादा पढ़ा नहीं सके.
* जून जब 10 साल की थीं, तब उनके छोटे भाई की मौत डिप्थीरिया से हुई थी. यहीं से रोगों को समझने के लिए जून के मन में लहर उठी थी.
* बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के भी जून ने काम करते हुए जो शोध पत्र लिखे, उनकी बदौलत उन्हें 1964 में डॉक्टर की उपाधि मिली थी.
* इमेजिंग वायरस से जुड़े कई पेटेंट जून के नाम रहे.
* 1979 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मैनुअल लिखने में उनकी भूमिका रही.
* जून एक ट्रेंड योग टीचर रहीं और अपने पति की मौत के बाद उनके एंटीक बिज़नेस को भी उन्होंने संभाला.

corona virus research, corona virus study, first case of corona, corona virus discovery, कोरोना वायरस रिसर्च, कोरोना वायरस खोज, कोरोना वायरस का पहला केस, कोरोना वायरस स्टडी
कोरोना की ये पहली माइक्रोस्कोपिक तस्वीरें भारत में रिलीज़ की गई थी.


कोरोना वायरस की खोज का किस्सा
1965 में वैज्ञानिक शोध और दावे प्रकाशित हुए जिनमें दो वैज्ञानिकों डीजे टायरेल और एमएल बायनो ने B814 नाम के वायरस का ज़िक्र किया. इसके बारे में दोनों ने लिखा कि बहुत मुमकिन है कि यह वायरस मनुष्यों के सांस तंत्र में कहीं मौजूद रहता है, जो संक्रमण के बाद सर्दी बुखार जैसे लक्षण पैदा करता है. लेकिन इन दोनों ने कहा कि इसे कोशिका लाइन में देखा नहीं जा सका.

ये भी पढ़ें : क्या 2024 में एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव लड़ेंगे डोनाल्ड ट्रंप?

इसके दो साल बाद 1967 में जून ने सैंपल कलेक्ट किए और इस वायरस को माइक्रोस्कोप के थ्रू देखने की कोशिश की. इसके लिए जून ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी तकनीक की पहल की और इतिहास रच दिया. टायरेल के साथ मिलकर भी जून ने वायरस को देखा. बाद में इसे दोनों ने कोरोना वायरस कहा क्योंकि अपनी सतह पर यह किसी राजा के मुकुट जैसी आकृति में दिखता था. 1968 में इस नाम को मंज़ूरी भी मिली.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज