सुप्रीम कोर्ट का वो सख्त जज जिसकी कोर्ट में आते हुए लोग घबराते भी थे

सुप्रीम कोर्ट का वो सख्त जज जिसकी कोर्ट में आते हुए लोग घबराते भी थे
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने पिछले कुछ सालों में कई अहम फैसले किए

सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्रा 02 सितंबर को अपने लंबे करियर के बाद रिटायर हो जाएंगे. लेकिन हाल के बरसों में उन्हें उनके कई अहम फैसलों के लिए जाना जाएगा. हालांकि वो तब बहुत आहत हो गए थे जबकि चार सीनियर जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 2, 2020, 12:54 PM IST
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जस्टिस अरुण मिश्रा की ख्याति सख्त और तुरंत फैसला लेने वाले जज की रही है. हाल ही में उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए. वो उस खंडपीठ की अगुवाई कर रहे थे, जिसमें जाने-माने वकील प्रशांत भूषण को न्यायालय की अवमानना मामले में दोषी ठहराते हुए उन पर एक रुपए का जुर्माना लगाया गया. एक लंबी और उम्दा पारी खेलने के बाद जस्टिस मिश्रा आज यानि 02 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं.

वह जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने. इससे पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और कलकत्ता हाईकोर्ट के जज रहे. उनका खुद का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट में 16 घंटे तक काम करते हैं. अक्सर लोग उनकी कोर्ट में आते हुए घबराते भी थे, क्योंकि माना जाता रहा कि वो किसी को बख्शते नहीं. खासकर अगर किसी ने अनावश्यक मामलों पर याचिका दायर करके कोर्ट का समय बर्बाद किया हो.
03 सितंबर, 1955 को जन्मे अरुण मिश्रा ने संवैधानिक, सिविल, इंडस्ट्रियल और क्रिमिनल मामलों पर प्रैक्टिस की है. वह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सबसे युवा चेयरमैन बनने वाले शख्स भी रहे.

01 लाख से ज्यादा केस निपटाए
मध्य प्रदेश, राजस्थान और कलकत्ता हाईकोर्ट का जज रहते हुए अरुण मिश्रा ने करीब 97 हजार केसों पर फैसले दिए. न्यायिक हलकों में कहा जाता है कि अपने पूरे कार्यकाल में न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने लगभग एक लाख मामलों का निपटारा भी किया है.



पिता थे मप्र हाईकोर्ट के जज
मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने विज्ञान में एमए की डिग्री लेने के बाद क़ानून की पढ़ाई इसलिए की, क्योंकि उनकी स्वाभाविक रुचि इसमें थी. उनके पिता हरगोविंद मिश्रा जबलपुर हाई कोर्ट के जज थे, जबकि उनके परिवार में कई रिश्तेदार नामी वकील हैं.

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ख़ुद उनकी बेटी भी दिल्ली हाई कोर्ट की वकील हैं. लगभग 21 सालों तक वकालत करते रहने के बावजूद उन्होंने क़ानून पढ़ाने का काम भी किया. मध्य प्रदेश में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से जुड़े रहे.

कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे
वर्ष 2012 में वो कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति लंबित रही, तीन बार ऐसे मौक़े आए, जब उन्हें नियुक्त किया जाना था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. वर्ष 2014 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया.

वर्ष 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट के 04 जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी, उसकी आंच जस्टिस अरुण मिश्रा पर भी आई. वो इससे काफी आहत हो गए थे.


तब वो चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस से काफी आहत हो गए थे
वर्ष 2018 की है, जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट में चल रही व्यवस्था की आलोचना की थी. इनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोज़फ़ और जस्टिस चेलमेश्वर शामिल थे, जिन्होंने आरोप लगाया था कि अहम मामलों को ख़ास जजों की बेंच में लिस्ट किया जा रहा है.

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न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से इतना आहत हुए थे कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को उन्हें समझाने में काफ़ी मशक्क़त करनी पड़ी थी. तब जस्टिस अरुण मिश्रा ये कहते हुए भावुक हो गए कि मामला उठाने वाले चार न्यायाधीशों ने उनकी 'क्षमता' और 'ईमानदारी' पर सवाल उठाकर उन्हें 'अनुचित रूप से' निशाना बनाया.

मैने सिर्फ इज्जत कमाई है
उन्होंने भावुक होकर कहा, 'मैंने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इज्जत कमाई और आपने उस पर ही हमला कर दिया. आपने मेरी प्रतिष्ठा को जो नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई कैसे करेंगे. इससे बेहतर होता कि आप मुझे गोली मार देते.'

जज लोया मामले से शुरू हुआ विवाद 
उन्हें लेकर विवाद तब हुआ, जब वरीयता की सूची में 10वें स्थान पर मौजूद जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा की खंडपीठ के सामने सबसे संवेदनशील न्यायमूर्ति बीएच लोया की हत्या का मामला 'लिस्ट' किया गया. जस्टिस लोया गुजरात के सोहराबुद्दीन 'एनकाउंटर' केस की सुनवाई कर रहे थे. विरोध कर रहे इन चारों वरीय जजों का भी यही आरोप था कि संवेदनशील मामलों को वरिष्ठ जजों की खंडपीठ को नहीं देकर चुनिंदा जजों को दिया जाता है.हालांकि बाद में जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने ख़ुद को जस्टिस लोया मामले से 'रेक्युज़' यानी अलग कर लिया था.

अपने आखिरी दिनों में उन्होंने एक के बाद एक कई महत्वपूर्ण फैसले किए, जिसमें प्रशांत भूषण का अदालत काी अवमानना का मामला शामिल है


सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा एक और मामला काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा और वो था पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मी की ओर से यौन उत्पीड़न का आरोप. जिस खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी, उसमें ख़ुद मुख्य न्यायाधीश तो थे ही, साथ ही तीन सदस्यों वाली इस खंडपीठ में सुप्रीम कोर्ट के 27 जजों में से जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता को शामिल किया गया था.

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वो तब भी विवाद में आए, जब ज़मीन अधिग्रहण के एक मामले में उन्होंने फ़ैसला सुनाया था. बाद में ये मामला उसी संविधान पीठ को सौंप दिया गया, जिसके वो भी सदस्य थे. न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने ख़ुद को उस संविधान पीठ से 'रेक्युज़' यानी अलग करने से इनकार कर दिया था. मतलब ये कि ख़ुद के दिए गए फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई में वे ख़ुद भी शामिल थे.

मोदी की तारीफ कर आलोचना के घेरे में भी आए
इसी साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक रूप से तारीफ करके उन्होंने नया विवाद पैदा कर दिया. उन्होंने मोदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दार्शनिक की संज्ञा देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री सदाबहार ज्ञानी भी हैं.इसे लेकर उनकी आलोचना भी हुई. ये बहस शुरू हुई कि क्या सुप्रीम कोर्ट के जज को ऐसा करना चाहिए.

कई अहम मामले
उन्होंने पूर्व आईपीएस ऑफिसर संजीव भट्ट की याचिका पर सुनवाई की, जिसके तहत गोधरा दंगे की फाइल फिर से खोलने की अपील की गई थी. जस्टिस मिश्रा ने सहारा-बिरला डायरी मामले की जांच और मेडिकल एडमिशन स्कैम की सुनवाई की. एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत विदेश से हासिल की गई क़ानून की डिग्री को भारत में मान्यता के दिशानिर्देश बनाने का श्रेय भी जस्टिस मिश्रा को जाता है. आम्रपाली रियल एस्टेट के कई प्रोजेक्ट्स पर भी फैसला करके उन्होंने हजारों फ्लैट खरीददारों को राहत दी.

कार्यकाल के आखिरी दिनों में कई फैसले
अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्होंने तेजी से साथ जिन महत्वपूर्ण मामलों में फैसले सुनाए. वो ये थे-

प्रशांत भूषण अवमानना - ये काफी संवेदनशील मामला था. जिसे जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने 31 अगस्त को निपटाया. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना केस (Contempt Of Court Case) में 1 रुपये का जुर्माना भरने की सजा दी गई.

महाकाल मंदिर - उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए शिवलिंग को क्षरण से बचाव के लिए तमाम आदेश पारित किए. अदालत ने कहा है कि मंदिर के शिवलिंग पर कोई भी भक्त पंचामृत नहीं चढ़ाएगा. शुद्ध दूध से पूजा की जाएगी.

टेलीकॉम कंपनियों को बड़ी राहत- जस्टिस अरुण मिश्रा ने जस्टिस एस. अब्दुल नजीर और जस्टिस एम. आर. शाह के साथ वाली बेंच के जरिए बकाया एजीआर के भुगतान के मामले टेलीकॉम कंपनियों को बड़ी राहत दी. जस्टिस मिश्रा ने अपने कामकाजी दिन के आखिरी दिन फैसले में कहा कि टेलीकॉम कंपनियों को 31 मार्च, 2021 तक कुल बकाया का 10 फीसदी भुगतान करना होगा.टेलीकॉम कंपनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का एजीआर रेवेन्यू बकाया है.
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