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    जन्मदिन: ज्योति बसु का नाम पीएम के लिए तय हो गया था लेकिन उनकी पार्टी ही पीछे हट गई

    ज्योति बसु 23 सालों तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे
    ज्योति बसु 23 सालों तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे

    ज्योति बसु का नाम 1996 में तीसरे मोर्चे ने प्रधानमंत्री के तौर पर तय हो चुका था. कांग्रेस इस पर सहमत थी लेकिन खुद बसु की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने ही इसे बहुमत से खारिज कर दिया. इसे बाद में माकपा की बहुत बड़ी भूल भी कहा गया. बसु 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे, हालांकि लोग ये भी कहते हैं कि उन्होंने राज्य के विकास को पीछे धकेल दिया

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    अगर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उस दिन कामरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने पर रजामंदी जाहिर कर दी होती तो यकीनन माकपा की स्थिति आज कुछ और होती.  ये मामला 1996 का है. तब 11 वीं लोकसभा के चुनावी नतीजों ने किसी पार्टी को सरकार के लिए नंबर नहीं दिए थे. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. लेकिन कांग्रेस और अन्य दल मिलकर सरकार बना सकते थे. तब ज्योति बसु की अगुवाई में सरकार बनाने पर सभी सहमत थे लेकिन खुद माकपा ने ही पैर पीछे खींच लिए और देश में एक नया इतिहास बनते बनते रह गया.

    ये मई 1996 का दूसरा हफ्ता था. लोकसभा के नतीजे आ चुके थे बीजेपी को 162 सीटें मिली थीं. कांग्रेस 136 सीटें जीत पाई थी. बीजेपी में अगर अटलबिहारी वाजेपेयी दो जगह से जीते थे तो कांग्रेस से पीवी नरसिंहराव दो सीटों से जीते थे. इसके अलावा जनता दल 46, सीपीएम 32, तमिल मनीला कांग्रेस 20, द्रमुक 17, सपा 17, तेलगूदेशम 17 सीटों पर थे. इसके अलावा सीपीआई 12, बसपा 11, समता पार्टी 08, अकाली दल 08 और असम गण परिषद को 05 सीटें मिलीं थीं.

    कांग्रेस ने ये जता दिया कि अगर कोई तीसरा मोर्चा खड़ा होता है कि कांग्रेस उसे बगैर शर्त समर्थन देगी. हरकिशन सिंह सुरजीत तीसरे मोर्चे के सूत्रधार बनकर उभरे. वीपी सिंह ने फिर प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया था. अब सवाल ये था कि किसे प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार बनाया जाए, जिस पर तीसरे मोर्चे की पार्टियां सहमत भी हों. तब वीपी सिंह ने ही देश के सबसे अनुभवी नेता और मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम सुझाया.



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    उस समय वाम मोर्चे के पास 52 सांसद (माकपा - 32, भाकपा- 12, आरएसपी- 4, फॉरवर्ड ब्लॉक- 3 और केरल कांग्रेस-मणि-1) थे. ये तीसरे मोर्चे का सबसे बड़ा गुट था. अब इस पर माकपा को मुहर लगानी थी.

    1996 में लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद संयुक्त मोर्चा ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत था लेकिन उन्हीं की पार्टी ने इसे खारिज कर दिया


    माकपा ने ही इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया
    जब इस प्रस्ताव पर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने पर मुहर लगाने के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी पार्टी की सेन्ट्रल कमिटी की बैठक बुलाई. इस कमेटी ने इस प्रस्ताव को बहुमत के आधार पर खारिज कर दिया. क्योंकि उसका मानना था कि यदि ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उन्हें ग्लोबलाइजेशन और बाजार के उसूलों की नीतियों पर चलना होगा. जो सीपीएम को मंजूर नहीं था. इसलिए उसने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को नहीं माना.

    कद्दावर सियासी कद
    खैर ज्योति बसु की पार्टी ने उनके साथ जो भी किया हो लेकिन तब भी ज्योति बसु का कद देश के सियासी जगत में खासा कद्दावर था. लेकिन उन्होंने खुद को पश्चिम बंगाल तक ही सीमित किया हुआ था. हालाकि ज्योति बसु के आलोचक ये भी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने इस राज्य को तरक्की की दौड़ में बहुत पीछे कर दिया. साथ में यहां के प्रतिभाशाली लोगों के साथ बहुत अन्याय किया.

    आलोचना करने वाले भी कम नहीं
    सुमोन के चक्रवर्ती ने न्यूज 18 में प्रकाशित अपने ब्लॉग में लिखा  कि उन्होंने बंगाल में औद्योगिकरण को खत्म कर दिया तो स्कूलिंग सिस्टम पर बुरा असर डाला. उन्होंने लिखा कि बसु के कार्यकाल में बंगाल में ब्रेन ड्रेन की स्थिति आ गई और राज्य का आर्थिक ढांचा बुरी तरह तहस-नहस हुआ जबकि वो अगर चाहते तो दो दशकों के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इस राज्य को समूचा बदल डालते.

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    वो लिखते हैं कि बंगाल को 1956 में डॉ विधान चंद्र राय ने देश का डेयरी हब बना दिया था. जो काम गुजरात के आणंद में वर्गीज कूरियन ने किया, वो राय बहुत पहले बंगाल में कर चुके थे. आजादी के बाद वो बंगाल को जिस तरीके से बढ़ा रहे थे, उसकी तारीफ होती थी. हालांकि ज्योति बसु को बंगाल में भूमि सुधारों के लिए जरूर क्रेडिट देना चाहिए.

    ज्योति बसु का जन्म उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था लेकिन उनके बारे में कहा जाता था कि वो अपना ज्यादा जीवन बहुत सादगी से जिया


    सादगी की बहुत तारीफ होती थी
    हालांकि व्यक्तिगत मोर्चे पर ज्योति बसु की सादगी की बहुत तारीफ होती रही है. ज्योति बसु को एक विधायक के रूप में 250 रुपए तनख्वाह के तौर पर मिलते थे जिसका अधिकांश हिस्सा वो पार्टी को दे दिया करते थे.तब वो बहुत साधारण खाना खाते थे. दाल भात और तले हुए बैंगन (बेगुन भाजा).

    चाय का पहला प्याला 21 साल की उम्र में पिया
    हालांकि ज्योति बसु को लेकर तमाम किस्से हैं, जो उनकी सादगी और सैद्धांतिक सियासत से ही जुड़े हैं. कम लोग जानते हैं कि ज्योति बसु ने 21 साल की उम्र में अपना पहला चाय का प्याला पिया क्योंकि पिता ने उन्हें चाय पीने की मनाही कर रखी थी.

    कानून की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए
    वह एक उच्च मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे. पिता डॉक्टर थे. वो कोलकाता के सबसे अच्छे स्कूल लोरेटो में पढ़े. फिर सेंट जेवियर स्कूल में गए. स्नातक कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से किया. फिर कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए. वहीं वो कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आए.

    ज्योति बसु अपनी पत्नी कमला के साथ


    सियासी सफर 1946 में शुरू हुआ
    भारत लौटने के बाद पूरी तरह के कम्युनिस्ट पार्टी के कामों में लग गए. 1946 में वो बंगाल विधान सभा के लिए चुने गए. जब बिधान चंद्र रॉय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने तो बसु लंबे समय तक विपक्ष के नेता रहे. उनके कामों की सराहना हर किसी ने की. 1964 में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन हुआ तो वो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो के पहले 09 सदस्यों में थे.

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    सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे
    पहले वो उप मुख्यमंत्री बने फिर 21 जून 1977 को बंगाल के मुख्यमंत्री. 06 नवंबर 2000 तक वो राज्य के मुख्यमंत्री रहे. इतने लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहना भी एक रिकॉर्ड है. वर्ष 2000 में बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उन्होेने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया और फिर सक्रिय राजनीति से भी संन्यास की घोषणा कर दी. 17 जनवरी 2010 को उनका निधन हो गया.

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    बेटा उद्योगपति है
    ये भी अजीब सी बात है कि ज्योति बसु जिस पूंजीवाद का जिंदगी भर विरोध करते रहे. उनका बेटा शुभव्रत उर्फ चंदन इसके ठीक उलट एक उद्योगपति है. वह लग्जरी जिंदगी जीते हैं. हालांकि उनके बेटे ने हमेशा यही दावा किया कि उसने अपने पिता की स्थिति का कभी कोई फायदा नहीं उठाया. वो कई कंपनियों का मालिक है.

    बसु ने दो शादियां कीं
    ज्योति बसु ने दो बार शादियां कीं. उनकी पहली पत्नी बसंती का निधन शादी के दो साल बाद ही 1942 में हो गया. इसके छह साल बाद उन्होंने कमला से शादी की जिससे उन्हें एक बेटी और एक बेटा हुआ. बेटी का निधन जन्म के जल्द बाद ही हो गया.
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