कैलाश मानसरोवर में बर्फ पिघलने पर सुनाई पड़ती है एक रहस्यमयी आवाज़

जानें कैलाश मानसरोवर यात्रा के बारे में सबकुछ. कैसे पहुंचे और क्या है इस पवित्र जगह का खास महत्व

News18Hindi
Updated: September 12, 2018, 2:59 PM IST
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Updated: September 12, 2018, 2:59 PM IST
इन दिनों कैलाश मानसरोवर की यात्रा चल रही है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस यात्रा पर हैं. कैलाश मानसरोवर हिंदू ही नहीं कई अन्य धर्मों के लिए भी पवित्र भूमि है. हर बार जब यहां बर्फ पिघलती है तो एक रहस्यमय आवाज दूर-दूर तक सुनी जाती है. गर्मी के दिनों में जब मानसरोवर की बर्फ पिघलती है, तो एक प्रकार की आवाज भी सुनाई देती है, ये दूर-दूर तक सुनाई पड़ती है. कुछ लोग इसे रहस्यमयी आवाज मानते हैं. ये आज तक पता नहीं चल पाया कि आवाज कहां से आती है. श्रद्धालु मानते हैं कि यह मृदंग की आवाज है.


 यात्रा का इतिहास और उतार-चढाव 

कैलाश मानसरोवर यात्रा सदियों पुरानी है. यही यात्रा है, जिसने कुमाऊं के प्रमुख शिव मंदिरों, आस्था स्थलों को एक-दूसरे से जोड़ा. अतीत में सैकड़ों मील की यात्रा पैदल की जाती थी. भारत के आजाद होने के कुछ वर्षों बाद ही राजनीतिक कारणों से शिव भक्तों की इस पवित्र यात्रा पर ग्रहण लग गया. 1980 के आसपास यात्रा दोबारा शुरू हुई लेकिन यात्रा का स्वरूप, तरीका और मार्ग सब बदल गए.



-  1948 से 1961 तक की यात्रा के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं परंतु यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव धारचुला से पता चलता है कि इस दौरान भी यात्री छोटे छोटे जत्थों में राजा अस्कोट की मदद से यात्रा करते रहे. इस यात्रा में पाला (तिब्बत) में यात्रियों के कागजात आदि चेक होते थे.


- फिर वर्ष 1962 से 1971 तक चीन युद्ध के कारण इस यात्रा पर रोक लगा दी गई.



22 हजार फुट की ऊंचाई पर बसा बेहद रहस्यमयी है शिव का कैलाश, इसलिए गए हैं राहुल-kailash mansarovar-interesting facts congress-president-rahul-gandhi-on-kailash mansarovar-yatra
22 हजार फुट की ऊंचाई पर बसा बेहद रहस्यमयी है शिव का कैलास



- वर्ष 1972 से अब तक यह यात्रा विदेश मंत्रालय, उत्तराखंड और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के साझा सहयोग से चल रही है.

- नैनीताल, अल्मोड़ा, काठगोदाम और पिथौरागढ़ को मिलाकर इस इलाके को अस्कोट कहा जाता था. अस्कोट को सदियों पहले पाल वंश के शासकों द्वारा स्थापित किया गया था. पाल वंश विश्व में एकमात्र ऐसा राजवंश है जिसकी पीढियां ढाई हजार साल से अब तक चलती आ रही हैं. इस पीढ़ी के वर्तमान अस्कोट राजा श्री भानुराज पाल हैं. वह इस वंश के 108वें राजा हैं. जिनका अस्कोट में पैतृक महल है.


धार्मिक मान्यता, विश्वास और महत्व 

कैलास सरोवर का असली मतलब होता है कैलास पर्वत और मानस सरोवर, जो हिंदू धर्म का नहीं बल्कि बौद्ध और जैन धर्मों की आस्था का प्रतीक भी है.

- जैन धर्म के प्रथम तीर्थांकर आदिनाथ श्री ऋषभदेव जी का निर्वाण भी अष्टपद कैलास पर हुआ था. जैन श्रृद्धालु कैलास को अष्टपद इसलिए कहते हैं क्योंकि वो मानते हैं कि ऋषभदेव ने आठ पग में इसकी यात्रा की थी.

- बौद्ध धर्म के सभी तीर्थ स्थानों में कैलास ज्यादा महत्वपूर्ण है. कैलास पर स्थित बुद्ध भगवान का अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्धों के लिए पूजनीय है. बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ कहा जाता है. बौद्ध अनुयायियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है.

- भगवान बुद्ध के बाद बौद्ध धर्म के तमाम प्रसिद्ध लामाओं ने 17वीं सदी में यहां की यात्रा की थी.

- बौद्ध कैलास पर्वत को कांग रिनपोचे भी कहते हैं, जिसका मतलब है आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति. कहा जाता है कि मानसरोवर के पास ही भगवान बुद्ध महारानी माया के गर्भ में आए.



कैलास पर्वत (फाइल फोटो)



- इसी कड़ी में बोनपाओ (बुद्ध-पूर्व काल में तिब्बत का धर्म) का ऐसा विश्वास है कि कैलास एक नवमंजिला स्वास्तिक शिखर है तथा धरती का मर्म स्थल है.

- मान्यता है कि सबसे पहले ऋषि मान्धाता इस पवित्र भूमि पर आए थे.

- महाभारत के मुताबिक कृष्ण, अर्जुन, भीम ने समय समय पर कैलास और मानसरोवर की परिक्रमा की थी. इतना ही नहीं यमद्वार नामक जगह पर यमराज ने युधिष्ठिर के लिए वायुयान भेजा था और स्वयं यमराज स्वान के रूप में यमद्वार तक उनके साथ रहे थे.

- पांडवों के दिग्विजय प्रयास के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय हासिल की थी. युधिष्ठिर के राजसूर्य यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न और याक के पूँछ के बने काले और सफेद चामर भेंट किए थे. इस प्रदेश की यात्रा व्यास, भीम, कृष्ण, दत्तात्रेय आदि ने की थी.

- जनश्रुति है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने शरीर का त्याग कैलास पर किया था.

-  भगवतगीता में कैलास पर्वत को इस तरह उद्धृत किया गया है - मेरु शिखरिणाहम (10.23) यानि शिखरों में मैं श्रेष्ठ मेरु (कैलास) हूं.

- हिन्दू धर्म में मान्यता है कि कैलास पर्वत मेरु पर्वत है जो ब्रह्मांड की धुरी है. 

- गुरु नानकदेव जी ने भी यहाँ ध्यान किया था.

- मान्यता है कि ये पर्वत स्वयंभू है. कैलास -मानसरोवर हमारी सृष्टि जितना प्राचीन है.

मानसरोवर झील का उद्भव ब्रह्मा जी के मानस में हुआ था. उन्होंने इसे धरती पर स्थापित किया.

- मान्यता है कि कैलास पर्वत पर भगवान शिव और पार्वती निवास करते हैं. इस स्थान को 12 ज्योर्तिलिंगों की तरह ही श्रेष्ठ माना गया है.



दुनिया की सबसे मुश्किल धार्मिक यात्राओं में से एक है कैलास मानसरोवर यात्रा



- शिव पुराण के मुताबिक स्वयं शिव ने कहा था कैलास ब्रह्मस्थान है, जिसका कभी नाश नहीं होता. भगीरथ गंगा को स्वर्ग पर लाये तो शिव ने कैलास पर ही गंगा को अपनी जटा में धारण किया.

- शाक्त ग्रंथ के अनुसार देवी सती का दायां हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे ये झील तैयार हुई.

- मान्यता है कि ब्रह्ममुहुर्त में मानसरोवर, किन्नर, ऋषिमुनि स्नान करने आते हैंं.

- कहते हैं कि कोई व्यक्ति अगर मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले तो वह रुद्र लोक पहुंच जाता है, जो मानसरोवर की धरती को छू ले वह ब्रह्मलोक पहुंच जाता है. जो यहां का पानी पी ले, उसे  भगवान के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है.


भूगोल 

- ये जगह समुद्री तल से 22,028 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. ये ३२ मील में फैला है. पवित्र कैलास चारों ओर से पांच पवित्र बौद्ध गाम्फाओं से घिरा है.

कैलाश मानसरोवर झील की ऊंचाई समुद्री तट से 14,850 फुट पर है, इसकी बाहरी परिधि 85 किलोमीटर है. इसकी अधिकतम गहराई लगभग 300 फीट है और ये करीब 200 वर्ग मील क्षेत्र को घेरती है.

- इसके साथ राक्षस ताल भी है जो करीब २२५ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी. इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं. एक छोटी नदी गंगा-चू दोनों झीलों को जोड़ती है. इस ताल में पूजा-पाठ और स्नान वर्जित है. इस झील का रंग भी काला है.


- चार बड़ी नदियों का उदगम  

1. सतलज- तिब्बती में इसे लांजचेन खम्बाब के नाम से जानते हैं, मतलब हाथी के मुंह से निकलने वाली नदी. कांगड़ी कालचक्र के अनुसार इसका नाम गंगा है, जो पश्चिम दिशा की तरफ बहती है

2. करनाली-तिब्बती में इसे मेपचा खम्बाब कहते हैं. कांगड़ी कालचक्र के अनुसार इसका नाम सिंधू है, इसका मौजूदा भारतीय नाम करनाली है. ये दक्षिण दिशा की ओर से बहती है. जो बाद में सरयू और फिर घाघरा बन जाती है.



कैलास मानसरोवर क्षेत्र से चार बड़ी नदियां भी निकलती हैं



3. ब्रह्मपुत्र - तिब्बती में इसे तमचोक खम्बाब कहते हैं यानि घोड़े के मुंह से निकली नदी. कांगड़ी कालचक्र के अनुसार इसका नाम पंक्शू है. भारतीय नाम ब्रह्मपुत्र है, ये पूर्वी छोर से निकलती है.

4. सिंधू - तिब्बती नाम सेंगे खम्बाब है, ये शेर के मुंह से निकलने वाली नदी मानी जाती है. कांगड़ी कालचक्र के अनुसार इसे सीता का नाम दिया गया है. भारतीय नाम इंडस या सिंधू है, ये उत्तर दिशा से बहती है.


कैलास के आसपास

कैलास पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यदि आप इसकी परिक्रमा करना चाहते हैं, तो यह परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है.

कैलास पर्वत की चोटी को हिमरत्न भी कहा जाता है. परिक्रमा के दौरान एक किलोमीटर परिधि वाला गौरीकुंड भी मिलता है. यह कुंड हमेशा बर्फ से ढंका रहता है, मगर तीर्थयात्री बर्फ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करना नहीं भूलते.


पुराणों और ग्रंथों में कैलास मानसरोवर 

- कालीदास के मेघदूत में कैलास का वर्णन है-

गत्वा चोध्र्य दशमुखभु जोच्छ् वासितप्रस्थसंधै:।

कैलासस्य त्रिदशवनितादर्पणस्यातिथि: स्या:।।

शृंगोच्छायै: कुमुदविशदैर्यो वितत्थ स्थित:।

राशीभूत: प्रतिदिनमिव त्रयम्बकस्याट्टहास:।।

यानि हे मेघ! आगे बढक़र कैलाश पर्वत के अतिथि होना जो अपनी शुभ्रता के कारण देव गणनाओं के लिए दर्पण के समान है. उसकी धारों के जोड़ रावण की भुजाओं से झड़झड़ाए जाने के कारण ढीले पड़ गये हैं. वह कुमुद के पुष्प जैसी श्वेत बर्फीली चोटियों की ऊँचाई से आसमान को छाए हुए ऐसे खड़ा है मानो शिव के प्रतिदिन के अट्हास का ढेर लग गया है.


- बौद्ध तथा पाली ग्रंथों में मानसरोवर अनोप्ता तथा अनवतप्ता के नाम से वर्णित है, जिसका अर्थ है - बिना तापवाली और बिना कष्टवाली झील. मानसरोवर झील का जल जितना मीठा है, उतना किसी और नदी-सरोवर का नहीं है.




सड़क मार्ग से यात्रा

भारत सीमा में यात्रा - 14 दिन

(126 कि.मी. पैदल, 1306 कि.मी. बस से, कुल 1433 कि.मी.)

चीन सीमा में यात्रा 12 दिन

(53 किमी. पैदल, 411किमी बस से, कुल 464 किमी)

संपूर्ण यात्रा २६ दिन

(160 किमी पैदल, 1716 कि.मी. बस से, कुल 1896 किमी)

कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं किंतु उत्तरप्रदेश के अल्मोड़ा से अस्ककोट, खेल, गर्विअंग, लिपूलेह, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है. यह भाग 544 किमी (339 मील) लंबा है और इसमें अनेक चढ़ाव उतार हैं. जाते समय सरलकोट तक 70 किमी (44 मील) की चढ़ाई है, उसके आगे 74 किमी (46 मील) उतराई है. मार्ग में अनेक धर्मशाला और आश्रम है, जहाँ यात्रियों को ठहरने की सुविधा है. गर्विअंग में आगे की यात्रा के निमित्त याक, खच्चर, कुली आदि मिलते हैं. तकला कोट तिब्बत का पहला कस्बा है जहाँ प्रति वर्ष ज्येष्ठ से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है. तकलाकोट से तारचेन जाने के मार्ग में मानसरोवर पड़ता है.


- भारत की राजधानी दिल्ली से पवित्र कैलास पर्वत करीब 865 किमी दूर है.

- दिल्ली से काठगोदाम, भवाली, अल्मोड़ा, तकूला, बागेश्वर, डिडीहॅट, धारचूला, तवाघाट, मंगती, गाला गढ़, मालपा, बुद्धि गुन्जी, कालापानी नवीधांग, लिप्पूलेख पास, तकलाकोट, राक्षसताल, जैदी, परखा प्लेनस से होते हुए तारचेन पहुंचते हैं, जहां से पवित्र कैलाश पर्वत की परिधि की 54 किलोमीटर की परिक्रमा शुरू होती है।


- इस परिक्रमाम में तारचेन से दिरूपूल, डोलमा पास, जोंग जेरबू तक जाकर फिर से तारचेन की परिक्रमा में लगभग तीन दिन की पैदल यात्रा करनी पड़ती है. तारचेन से लौटकर परखा प्लेनस आकर पवित्र मानसरोवर झील की 32 किलोमीटर की यात्रा करनी होती है,  जिसमें होरे, छुग्गु, जैदी के पड़ाव आते हैं.



कितने बैच जाते हैं 

- भारत सरकार द्वारा यात्रा में 60 श्रद्धालुओं के समूह सरकारी राजपत्रित अधिकारियों के नेतृत्व में 16 बैचों में भेजती है. सूत्रों के मुताबिक इस यात्रा का खर्च एक लाख रुपए के आसपास है. कुछ राज्य सरकारें भी खर्च के तहत प्रोत्साहन राशि देती हैं.

- इसके अलावा, इसी यात्रा को कुछ निजी टूर आपरेटर भी करवाते हैं. वे इस यात्रा को जीप से 13 दिनों में पूरा करते हैं जिसका खर्च एक लाख रुपये है. ये यात्रा हेलिकॉप्टर से भी होती है.

- अब चीन ने नाथुला दर्रे से भी एक रास्ता मान सरोवर तक के लिए खोल दिया है.


 कैसे पहुंचें? 

1. भारत से सडक़ मार्ग. भारत सरकार सडक़ मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है. यहां के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है. तय लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है.

2. वायु मार्ग. वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंचकर वहाँ से सडक़ मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है. 

3. कैलास तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है. काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुँचकर, वहाँ से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है. मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं.

4. काठमांडू से ल्हासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहाँ से तिब्बत के विभिन्न कस्बों - गाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर जा सकते हैं.


यात्रा की सावधानियां 

कैलास मानसरोवर यात्रियों को किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं होनी चाहिए.

- चूंकि यह तीर्थस्थान चीन की सीमा में स्थित है, लिहाजा विदेश मंत्रालय में यात्रा के लिए प्रार्थनापत्र देना होता है. फिर चीन से वीजा मिलने के बाद कैलास मानसरोवर की यात्रा कर सकते हैं.

- दिल्ली के सरकारी अस्पताल में दो दिन तक फिजिकल फिटनेस की जांच की जाती है. जांच में फिट होने के बाद ही यात्रा की अनुमति मिल पाती है.

 - कैलाश मानसरोवर की यात्रा के दौरान 20 हजार फीट की ऊंचाई तक जाना पड़ सकता है.
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