काकोरी कांड में लूटे गए थे इतने रुपए, हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए थे 4 क्रांतिकारी

काकोरी कांड ब्रिटिश हुकूमत के लिए बड़ी शर्मिंदगी की घटना थी. इसमें शामिल लोगों को गिरफ्तार करने का जबरदस्त दबाव था. ब्रिटिश पुलिस ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की...

News18Hindi
Updated: August 9, 2019, 2:24 PM IST
काकोरी कांड में लूटे गए थे इतने रुपए, हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए थे 4 क्रांतिकारी
9 अगस्त 1925 को हुआ था काकोरी कांड
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Updated: August 9, 2019, 2:24 PM IST
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में 9 अगस्त 1925 की तारीख हमेशा याद रखी जाएगी. इसी दिन क्रांतिकारियों के एक दल ने लखनऊ से 16 किलोमीटर दूर काकोरी में ट्रेन लूट कांड को अंजाम दिया था. हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के 10 क्रांतिकारियों के एक दल ने ट्रेन पर धावा बोला और सरकारी खजाना लूटकर ले गए. इस घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है. क्रांतिकारियों ने काकोरी कांड के जरिए ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती दी थी.

काकोरी कांड के बाद लूटे गए पैसों का हिसाब-किताब हुआ. लखनऊ के पुलिस कप्तान ने बताया था कि काकोरी ट्रेन लूट कांड में कुल 4601 रुपए लूटे गए थे. आज के लिहाज से ये रकम काफी कम है. लेकिन 1925 में ये एक बड़ी रकम थी. 11 अगस्त 1925 को लखनऊ के पुलिस कप्तान ने ट्रेन लूट कांड पर रिपोर्ट जारी की थी.

उस वक्त उन्होंने बताया था कि काकोरी लूट कांड में शामिल लोग खाकी पैंट और कमीज पहने हुए थे. वो करीब 25 लोग थे. दिखने में सब पढ़े-लिखे लग रहे थे. उनके पिस्तौर और कारतूस को देखकर लगता था कि ये लोग बंगाल से जुड़े थे. बंगाल में क्रांतिकारी इसी तरह के पिस्तौल और कारतूस का इस्तेमाल करते थे.

काकोरी कांड में ब्रिटिश पुलिस ने 40 लोगों को गिरफ्तार किया था

काकोरी कांड ब्रिटिश हुकूमत के लिए बड़ी शर्मिंदगी की घटना थी. इसमें शामिल लोगों को गिरफ्तार करने का जबरदस्त दबाव था. ब्रिटिश पुलिस ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की. इस कांड में सिर्फ 10 क्रांतिकारी शामिल थे. लेकिन कुल 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया. ब्रिटिश पुलिस इस कांड की खानापूर्ती जांच कर जल्दी से जल्दी क्रांतिकारियों को सजा दिलवाना चाहती थी.

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काकोरी कांड में इस्तेमाल हुई पिस्तौल


काकारो कांड का एतिहासिक मुकदमा करीब 10 महीने तक चला. इस दौरान पूरे देश में इन क्रांतिकारियों की चर्चा थी. 1922 के चौरा चौरी कांड के बाद ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों का ये बड़ा कदम था. लोगों के मन में इस कांड में शामिल क्रांतिकारियों के प्रति अगाध श्रद्धा थी. अहिंसा के पथ पर चलने वाले बापू के समर्थकों में भी इनके लिए सदभावना थी.
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गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने के बाद क्रांतिकारियों से मिलने कांग्रेस के कई बड़े नेता पहुंचे. जवाहरलाल नेहरू ने भी जेल जाकर उनसे मुलाकात की थी. कहा जाता है कि नेहरू चाहते थे कि उनका मुकदमा मशहूर वकील गोविंद वल्लभ पंत लड़ें. लेकिन उनकी फीस अधिक होने की वजह से मुकदमा बीके चौधरी ने लड़ा.

लखनऊ की अदालत में 10 महीने चला मुकदमा, सरकार ने खर्च किए 10 लाख

लखनऊ की अदालत में काकोरी कांड का मुकदमा चला. ट्रेन डकैती में 4601 रुपए लूटे गए थे जबकि सरकार ने मुकदमा लड़ने में 10 लाख खर्च कर दिए. ये अपनेआप में हैरानी वाली बात थी. 6 अप्रैल 1927 को इस पर फैसला सुनाया गया. जज हेमिल्टन ने ब्रिटिश कानून व्यवस्था की धारा 121ए, 120 बी और 396 के तहत सजाएं सुनाई.

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काकोरी कांड के शहीद


क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई. इस कांड में शामिल दूसरे क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालेपानी की सजा हुई. मन्मथनात गुप्त को 14 साल की सजा सुनाई गई. बाकियों को 10, 7 और 5 साल की सजा हुई.

इस फैसले का जनता ने जोरदार विरोध किया. देश की जनता आंदोलन पर उतर आई. लेकिन ब्रिटिश सरकार ने कि संवेदना नहीं दिखाई. लखनऊ हाईकोर्ट ने भी नीचली अदालत का फैसला बरकरार रखा. इसके बाद 7 दिसंबर 1927 को सबसे पहले राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फांसी दी गई. 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई. फांसी के फंदे की ओर जाते हुए वो भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे लगाते रहे. ब्रिटिश साम्राज्य के विनाश की कामना के साथ वो फांसी के फंदे पर झूल गए.

जब चोरी चुपके अशफाक उल्ला खां के पार्थिव शरीर का दर्शन करने पहुंचे चंद्रशेखर आजाद

उनके पार्थिव शरीर को पूरे शहर में घुमाया गया. लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर फूल और इत्र बरसाए. इस कांड में शामिल तीसरे क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद में फांसी दी गई. अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद की जेल में फांसी दी गई. इतिहासकार बताते हैं कि अशफाक उल्ला खां का पार्थिव शरीर 19 दिसंबर को शाहजहांपुर लाया गया.

जिस ट्रेन से उनके पार्थिव शरीर को लाया जा रहा था वो बालामऊ रेलवे स्टेशन पर रूकी. वहां एक सूटबूट में अंग्रेज जैसा दिखने वाला शख्य आया और उसने कहा कि मैं शहीद ए आजम को देखना चाहता हूं. उस आदमी ने अशफाक उल्ला खां के पार्थिव शरीर के दर्शन किए और गायब हो गया. वो कोई और नहीं बल्कि चंद्रशेखर आजाद थे.

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चंद्रशेखर आजाद


ब्रिटिश सरकार अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें ढूंढ़ नहीं पाई थी. काफी बाद 27 फरवरी 1931 को उनका सामना ब्रिटिश पुलिस से हुआ. गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने खुद को गोली मार ली.

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First published: August 9, 2019, 12:39 PM IST
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