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क्यों जापान में गणेश जी की मू्र्ति लकड़ी के बक्से में छिपाकर रखी जाती है?

क्यों जापान में गणेश जी की मू्र्ति लकड़ी के बक्से में छिपाकर रखी जाती है?

रिसर्च करने वालों का मानना है कि जापान में आठवीं सदी के दौरान गणेश को माना जाने लगा (Photo-pixabay)

रिसर्च करने वालों का मानना है कि जापान में आठवीं सदी के दौरान गणेश को माना जाने लगा (Photo-pixabay)

तांत्रिक बुद्धिज्म में गणेश (lord Ganesha in Tantric Buddhism) जी को एक स्त्री हाथी से लिपटा हुआ दिखाया जाता है. इसे वहां कामुक माना जाता है और मूर्ति मंदिरों में सामने नहीं रखी जाती.

    जापान के टोक्यो (Tokyo in Japan) में लकड़ी के बहुत सारे बौद्ध मंदिरों (Buddhist monastery) के बीच कई हजार-हजार साल पुराने मंदिर भी हैं. इन्हीं में से एक मंदिर में जिस देवता की मूर्ति रखी हुई है, वो हिंदुओं के गणेश देवता से काफी मिलती-जुलती है. Matsuchiyama Shoten नामक इस मंदिर में रखी मूर्ति असल में गणेश जी का ही जापानी वर्जन है, जिसे तंत्र-मंत्र को मानने वाले बौद्ध पूजते हैं. आठवीं सदी में बने इस मंदिर के देवता के बारे में माना जाता है कि ये भारत के उड़ीसा से आए हैं.

    धर्म पर रिसर्च करने वालों का मानना है कि जापान में पहली बार आठवीं सदी के दौरान गणेश को माना जाने लगा. ये मानने वाले बौद्ध लोग ही थे, जो मंत्र बुद्धिज्म (Shingon) पर यकीन करते थे. ये बौद्ध धर्म की ऐसी शाखा है, जिसके अनुयायी तांत्रिक शक्तियों की पूजा करते हैं. उड़ीसा में बुद्ध को मानने वाले कुछ तांत्रिकों की चीनी व्यापारियों और सैलानियों से मुलाकात के बाद मंत्र बुद्धिज्म चीन पहुंचा. कुछ सालों बाद वहां एक जापानी रिसर्चर कुकई पहुंचा, जो बौद्ध धर्म की इस नई शाखा को जानना चाहता था. चीन में लगभग 10 साल तक रहने के बाद कुकई वापस अपने देश लौटा और इस तरह से जापान में तंत्र बुद्धिज्म की नींव पड़ी.

    तांत्रिक बुद्धिज्म में गणेश जी को एक स्त्री हाथी से लिपटा हुआ दिखाया जाता है (Photo-facebook)


    जापान में गणेश (केंगिटेन) को मानने वालों की संख्या बढ़ती चली गई. इन्हें एक शक्तिशाली भगवान के तौर पर देखा जाता था और इनकी पूजा भी खास तरीके से शुद्ध रहते हुए तंत्र-मंत्र के सहारे होती थी. इसका जिक्र क्लासिकल गोल्डन एज (794-1185 CE) के दौरान मिलता है. अब बौद्ध धर्म को मानने वाले जापान में गणेश जी के कई मंदिर मिलते हैं. लाइव हिस्ट्री के मुताबिक यहां कुल 250 गणेश मंदिर हैं लेकिन इन्हें जापान में अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है जैसे केंगिटेन, शोटेन, गनबाची (गणपति) और बिनायकातेन (विनायक).

    तांत्रिक बुद्धिज्म में गणेश जी को एक स्त्री हाथी से लिपटा हुआ दिखाया जाता है. इसे शक्ति कहा जाता है. ये पुरुष और स्त्री के मेल से पैदा हुई ऊर्जा का प्रतीक है. हालांकि कुछ कामुक लगने के कारण गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर मंदिरों में सामने नहीं दिखती है. ये लकड़ी के सजे हुए बक्से में होती है, जिसकी रोज पूजा करते हैं. केवल किसी खास मौके पर मूर्ति बाहर निकाली जाती है और उसकी पूजा सबके सामने होती है.

    जापान के व्यापारी भी इस गणेश की काफी पूजा करते हैं (Photo-pixabay)


    दिलचस्प बात ये है कि भारत के गणेश से जापानी केंगिटेन काफी कुल मिलता-जुलता है. इसे भी मुश्किलें दूर करने वाला भगवान माना जाता है और काम शुरू करने से पहले तांत्रिक बौद्ध इसकी पूजा करते हैं. जापान के व्यापारी भी इस गणेश की काफी पूजा करते हैं.

    जापान का सबसे बड़ा गणेश मंदिर माउंट इकोमा पर Hōzan-ji नाम से है. ये दक्षिणी हिस्से में ओसाका शहर के बाहर बसा हुआ है. 17वीं सदी में बने इस मंदिर के बारे में काफी कहानियां कही जाती हैं और स्थानीय लोगों से लेकर पूरे जापान में इसकी काफी मान्यता है. खासकर यहां के व्यापारी इसे काफी मानते हैं. इच्छा पूरी होने पर यहां काफी दान-दक्षिणा भी की जाती है, जिसमें मुख्य तौर पर जापानी मुद्रा होती है. इसके अलावा आभूषण भी दिए जाते हैं. यही वजह है कि ये मंदिर जापान से सबसे अमीर मंदिरों में से एक है. दुकानों में भी भारत की तर्ज पर दो हाथियों की आपस में गुंथी हुई मूर्ति मिलती है, ताकि लोग घर में मूर्ति पूजा कर सकें.

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    Tags: Buddh Mahotsav, Eco Friendly Ganesha, Ganesh Chaturthi, Ganesh Chaturthi History, Japan, Religion

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