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कभी आईएएस सेलेक्शन को ठुकराने वाले सिब्बल कैसे साधते हैं वकालत और सियासत

ग्रुप 23 नेताओं में सबसे मुखर कपिल सिब्बल ने कांग्रेस छोड़ी जरूर लेकिन ये भी साफ कर दिया कि वो बीजेपी में नहीं जाने वाले.

ग्रुप 23 नेताओं में सबसे मुखर कपिल सिब्बल ने कांग्रेस छोड़ी जरूर लेकिन ये भी साफ कर दिया कि वो बीजेपी में नहीं जाने वाले.

कपिल सिब्बल का सियासी सफर 31 साल पुराना है. वह कांग्रेस में जरूर रहे लेकिन दूसरी पार्टियों के क्षेत्रीय क्षत्रपों से उनकी नजदीकियों ने भी उनकी सियासी पारी को खूब संवारा. लालू से लेकर मुलायम और अब अखिलेश उनके राज्यसभा में जाने के लिए मददगार बनते रहे हैं. देश के सबसे महंगे वकीलों में एक सिब्बल बहुत आराम से वकालत और सियासत के बीच संतुलन साधते हैं.

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31 सालों के सफर के बाद कपिल सिब्बल ने कांग्रेस को छोड़ दिया है. 16 मई को उन्होंने अपना इस्तीफा कांग्रेस को भेज दिया था. 25 मई को उन्होंने समाजवादी पार्टी के सपोर्ट से राज्य सभा का नामांकन किया. फिलहाल वो राज्यसभा में ही हैं लेकिन उनका कार्यकाल खत्म हो रहा था. पिछले दो साल से वह कांग्रेस के असंतुष्ट ग्रुप 23 के सबसे मुखर नेता थे, जिन्होंने खुलेआम गांधी परिवार को चुनौती देते हुए उन्हें नेतृत्व से हटने को कहा था. माना जा रहा था कि पिछले करीब एक साल से वो कांग्रेस छोड़ने की अपनी रणनीति पर काम कर रहे थे. शायद इस समय पार्टी छोड़ना कोई यूं ही उठाया गया कदम नहीं है बल्कि वर्ष 2024 में  होने वाले लोकसभा चुनाव के लिहाज से भी योजनाबद्ध कदम माना जा रहा है.

उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते हैं कि उनकी पैनी बुद्धि और तेज दिमाग का कोई सानी नहीं है. खुद कांग्रेस भी एक जमाने में उनकी चतुराई और कानूनी सूझबूझ की कायल रही. उन्हें मनमोहन सिंह सरकार के जमाने में जो भूमिका दी गई, वो उन्होंने बखूबी निभाई. यूपीए के शासनकाल में वो कई बार सरकार के संकटमोचक बने.

कपिल सिब्बल 1991 में कांग्रेस में आए. वो तब देश के शीर्ष और महंगे वकीलों में थे और आज भी हैं. उनका विद्रोही तेवर और उखड़ जाने की आदत तब भी और अब भी. कांग्रेस में आने के 09 साल बाद ही उन्होंने कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी की लीडरशिप पर हमला बोल दिया था. तब उन्होंने खुलेआम कहा था कि सोनिया के सलाहकार पार्टी को डुबोने में लगे हैं. तब भी उन्होंने पार्टी दिग्गजों को खुद के अंदर झांकने और पार्टी के अंदर खुली बहस की मांग कर डाली थी.

जी23 के सबसे मुखर नेताओं में थे
अब भी करीब दो-तीन सालों से कांग्रेस की मौजूदा डांवाडोल स्थिति में वो उस ग्रुप 23 के करीब अगुवा और सबसे मुखर सदस्य थे, जो कांग्रेस के अंदर असंतुष्टों का ऐसा गुट था, जो लगातार गांधी परिवार और आलाकमान के खिलाफ आवाज बुलंद करके आंतरिक लोकतंत्र की मांग कर रहा था. इसमें सिब्बल सबसे मुखर माने जा रहे थे जिन्होंने गांधी परिवार को किनारे होकर पार्टी का नेतृत्व किन्हीं और हाथों में देने की बात की थी.

जी23 में आवाज उठाने वाले कांग्रेसी नेता एक-एक करके पार्टी ने निकल रहे हैं, इसमें अब सिब्बल का नाम भी जुड़ गया है. लेकिन खास बात ये है कि जहां दूसरे कांग्रेसी पार्टी छोड़ते समय कांग्रेस के खिलाफ जमकर भड़ास निकालते हैं, उसके विपरीत सिब्बल ने इस पार्टी के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा. वो ऐसे किसी भी कमेंट से बच रहे हैं. (Image- ANI)

हालांकि ये बात अलग है कि जी23 में आवाज उठाने वाले कांग्रेसी नेता एक-एक करके पार्टी ने निकल रहे हैं, इसमें अब सिब्बल का नाम भी जुड़ गया है. हालांकि माना जा रहा है कि जी23 सदस्यों के साथ काफी चर्चा करने के बाद सिब्बल ने उनकी सहमति से ही कांग्रेस छोड़ने की रणनीति बनाई है ताकि वर्ष 2024 के चुनाव में बीजेपी के खिलाफ वो मजबूत विपक्ष को साथ ला सकें.

क्या राहुल से उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे
वैसे कहा जाता है कि राहुल गांधी ने उनके रिश्ते कभी अच्छे नहीं थे. जब तक अहमद पटेल जिंदा थे, तब तक वो उनके जरिए पार्टी हाईकमान तक अपनी बात पहुंचाते थे. अहमद वो शख्स थे जो ना केवल सोनिया के करीब थे बल्कि पार्टी में उनके सबसे विश्वासपात्र भी लेकिन उसके बाद केवल सिब्बल ने ही नहीं बल्कि पार्टी के तमाम सीनियर लीडर्स ने खुद ऐसी स्थिति में पाया, जहां उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.

चिंतन शिविर में नहीं गए थे
हालांकि उनके कांग्रेस छोड़ने को दूसरे नेताओं से अलग बताया जा रहा है. वो राजस्थान में हुए चिंतन शिविर में नहीं गए. इस्तीफे से पहले सोनिया से मुलाकात की और उन्हें इस्तीफा सौंप दिया. ये भी तय है कि जी23 में वो चाहे जितना मुखर रहे हों लेकिन कांग्रेस छोड़ने के बाद इस पार्टी की जमकर आलोचना करने वाले नेता भी वो नहीं रहेंगे. उनके बयान से साफ जाहिर है कि वो बीजेपी से दूरी बनाए रखेंगे.

बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आया था परिवार
सिब्बल का परिवार भी बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आया. परिवार जालंधर में बस गया. वहीं से सिब्बल ने ग्रेजुएशन किया. 60 के दशक के बीच वह दिल्ली आ गए.  दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की पढ़ाई की. साथ ही इतिहास में एमए भी किया. पढ़ाई में बहुत मेघावी स्टूडेंट्स में थे.  वर्ष 1973में उन्होंने संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास की. उनका इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज में सेलेक्शन हो गया लेकिन वो उसमें गए नहीं बल्कि इसकी बजाए एलएलएम की पढ़ाई के लिए हार्वर्ड चले गए.

देश के शीर्ष और महंगे वकील के रूप में पहचान
वहां से लौटने के बाद सीनियर वकील के तौर पर दिल्ली में उन्होंने अपनी प्रैक्टिस शुरू की. इसे पेशे में जल्दी ही उनकी पहचान एक तेजतर्रार और पैने दिमाग के वकील के रूप में होने लगी. इसके बाद वो 1995 से 2002 के बीच तीन बार सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बने. 1989-90 में सरकार के लिए सालिसिटर जनरल का भी काम किया. वो हमेशा ऐसे वकील रहे, जिनके पास हाईप्रोफाइल केस आए और उन्होंने इसे बखूबी लड़ा. 73 साल के हो चुके कपिल सिब्बल आज भी देश के चुनिंदा सबसे महंगे वकीलों में हैं.

जब राजनीति में नहीं थे तब भी आला नेताओं से नजदीकियां
बेशक कई केसों में उन्हें सफलता नहीं मिली. कई में वह हारे भी लेकिन आज भी माना जाता है कि अगर कोई केस वह हाथ में लेते हैं तो उसमें वादी की जीत की गुंजाइश ज्यादा होती है. राजनीति में आने से पहले से ही वो राजनीतिज्ञों के मुकदमे लड़ने लगे थे. आला नेताओं और देश की राजनीति में मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों से उनकी नजदीकियां थीं. ये करीबियां ही उन्हें राजनीति में लेकर आईं.

मनमोहन सिंह की सरकार में पहले कार्यकाल में वह स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री बने तो दूसरे कार्यकाल में ताकतवर कैबिनेट मिनिस्टर.

पहली बार बिहार से पहुंचे थे राज्यसभा में
1998 में वो बिहार कोटे से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर राज्यसभा में पहुंचे. हालांकि इसमें लालू ने उनकी मदद की. चारा केस में वह लालू के वकील भी थे. कहा जाता है कि लालू के असर के चलते ही कांग्रेस ने उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजने का फैसला किया. हालांकि इससे पहले 1997 में उन्होंने दिल्ली में पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन तब वह दक्षिण दिल्ली सीट पर सुषमा स्वराज से हार गए थे.

चांदनी चौक से जीते दो लोकसभा चुनाव, ताकतवर मंत्री बने
इसके बाद वर्ष 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में वह चांदनी चौक से विजयी रहे. मनमोहन सिंह की सरकार के दोनों टर्म में मंत्री बने. पहले वह 2004 में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री बने. लेकिन 2009 तक उनका कद बढ़ चुका था. उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. साथ ही खासा अहम मानव संसाधन मंत्रालय भी दिया गया.

इसके बाद उन्हें कम्युनिकेशन और इंफारमेशन टैक्नॉलॉजी का विभाग भी साथ में दिया गया. हालांकि 2012 में उन्हें फिर एचआरडी मिनिस्ट की जगह कानून मंत्री बनाया गया. वह ताकतवर मंत्री थे. हालांकि कई बार विवादों में घिरे और उन पर एरोगेंसी का आरोप भी लगा. लेकिन ये सही है कि कई बार वह सरकार के संकटमोचक बनकर सामने गाए.

2016 में फिर राज्यसभा पहुंचे
वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी केंद्र में जीतकर और उन्होंने सरकार बनाई, उसके बाद कांग्रेस कमजोर होने लगी. हालांकि वर्ष 2016 में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा जाने के लिए टिकट दिया. हालांकि तब भी समाजवादी पार्टी ने उन्हें सपोर्ट किया था.

अब इंडीपेंडेंट उम्मीदवार के तौर पर नामांकन
25 मई को राज्यसभा में उनका कार्यकाल खत्म हो चुका है. इस बीच उन्होंने समाजवादी पार्टी के समर्थन से इंडीपेंडेंट उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए नामांकन किया है. इस बार उन्हें ये टिकट समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश से नजदीकियों के कारण मिला है. ये भी कयास हैं कि आजम खान की पैरवी पर अखिलेश समाजवादी पार्टी के कोटे से उन्हें राज्यसभा भेज रहे हैं.

कैसे अखिलेश के नजदीक आए
हालांकि अखिलेश से सिब्बल की नजदीकियां तब से ज्यादा बढ़ी हैं जब 2017 में उन्होंने अखिलेश और मुलायम के बीच पार्टी में चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आय़ोग में अखिलेश को रिप्रेजेंट किया था. उसके बाद पार्टी और चिन्ह दोनों अखिलेश के पास आ गया था.

कांग्रेस छोड़ते समय नहीं की पार्टी की आलोचना 
पिछले दो तीन सालों से वह कांग्रेस में असंतुष्ट वर्ग में शामिल हो गए थे. गुलाम नबी आजाद, भूपिंदर हुडा, शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे नेताओं के साथ वह ग्रुप23 के मुखर नेताओं में थे. इस ग्रुप के कई नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. अब कपिल ने भी वही किया. शायद उन्हें अंदाज था कि अगर वो पार्टी नहीं छोड़ेंगे तो समाजवादी पार्टी उन्हें राज्यसभा जाने के लिए समर्थन भी नहीं देगी. दूसरा कांग्रेस छोड़कर अगले चुनाव से पहले वो अपनी सियासी संभावनाएं भी देखेंगे लेकिन उनका कांग्रेस छोड़ना उन नेताओं जैसा नहीं है, जो इससे पहले पार्टी की आलोचना करते हुए इसे छोड़कर आमतौर पर बीजेपी में चले गए.

सिब्बल ने पार्टी छोड़ी जरूर लेकिन कांग्रेस के खिलाफ इस मौके पर एक शब्द नहीं कहा, शायद वह कहेंगे भी नहीं. क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनकी सियासत का पड़ाव बीजेपी नहीं है, जिसे वह जाहिर भी कर चुके हैं लिहाजा आगे के रास्तों में उन्हें कांग्रेस की जरूरत पड़ सकती है.

Tags: Congress, Kapil sibal, Kapil sibbal, Rajya sabha, Samajwadi party

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