करगिल की जिस चोटी पर हुई थी विक्रम बत्रा की शहादत, 20वीं बरसी पर वहीं पहुंचा उनका भाई

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की याद में बीस साल बाद जम्मू-कश्मीर रायफल के उनके साथी उसी बत्रा टॉप पर पहुंचे हैं, जहां पर विक्रम बत्रा शहीद हुए थे.

News18Hindi
Updated: July 7, 2019, 3:24 PM IST
करगिल की जिस चोटी पर हुई थी विक्रम बत्रा की शहादत, 20वीं बरसी पर वहीं पहुंचा उनका भाई
शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की याद में बीस साल बाद जम्मू-कश्मीर रायफल के अफसर उसी बत्रा टॉप पर पहुंचे हैं
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Updated: July 7, 2019, 3:24 PM IST
कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन विक्रम बत्रा की आज 20वीं पुण्यतिथि है. आज ही के दिन विक्रम बत्रा ने देश की रक्षा करते हुए बलिदान दिया था. शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की याद में बीस साल बाद जम्मू-कश्मीर रायफल के उनके साथी उसी बत्रा टॉप पर पहुंचे हैं, जहां पर विक्रम बत्रा शहीद हुए थे. भारत ने 20 साल पहले यह चोटी पाकिस्तान से वापस हासिल की थी. बाद में इस चोटी का नाम बत्रा टॉप इसलिए रख दिया गया क्योंकि इसी चोटी पर जीत हासिल करते वक्त विक्रम बत्रा शहीद हो गए थे.

विक्रम बत्रा की याद में उनके साथी उसी चोटी पर पहुंचे हैं
बत्रा टॉप पर 14 कोर के कमांडर ले. जनरल जोशी भी पहुंचे. जनरल जोशी 20 साल पहले विक्रम बत्रा के कमांडिग ऑफिसर थे. इस मौके पर कैप्टन विक्रम बत्रा के भाई विशाल बत्रा भी पहुंचे. विकास बत्रा, विक्रम बत्रा के जुड़वा भाई हैं.

कारगिल हीरो विक्रम बत्रा की आज 20वीं पुण्यतिथि है


बता दें कि कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए विक्रम बत्रा ने कहा था कि आखिरी चोटी पर तिरंगा फहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा. 9 सितंबर 1974 को हिमाचल के पालमपुर में विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था. साल 1997 में उन्होंने सेना को ज्वाइन किया और महज दो साल के अंदर वो कैप्टन बन गए. कारगिल के दौरान पांच सबसे महत्वपूर्ण प्वाइंट जीतने में उन्होंने खास भूमिका निभाई थी. उन्होंने कारगिल का पोस्टर ब्वॉय भी कहा जाता था.

जिसे दोस्त और दुश्मन दोनों 'शेरशाह' के नाम से पुकारते थे

उनके पराक्रम और कुशाग्रता का अंदाज़ा इससे लगाइए कि तत्कालीन आर्मी चीफ दीपक चोपड़ा ने उनके बारे में कहा था कि अगर वो जिंदा वापस लौटते तो सबसे कम उम्र के आर्मी चीफ बनते. 6 दिसंबर 1997 में उन्हें सोपोर में 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में तैनाती मिली. 1999 में उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग हासिल की. 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल भेजा गया. इस दौरान युद्ध शुरू हो चुका था. हम्प और राकी नाब इलाके को जीतने के बाद उन्हें प्रमोट कर कैप्टन बना दिया गया.
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विक्रम बत्रा को दोस्त और दुश्मन दोनों शेरशाह के नाम से पुकारते थे


शुरुआत सफलता के बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्वपूर्ण प्वाइंट 5140 चोटी को दुश्मनों से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन बत्रा को मिला. कठिन लड़ाई के बावजूद विक्रम बत्रा ने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह 3 बजकर 30 मिनट पर साथियों समेत अपने कब्जे में ले लिया.

घायल साथी की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी

5140 चोटी जीतने के बाद कैप्टन को 4875 चोटी पर कब्जे की जिम्मेदारी दी गई. 7 जुलाई 1999 को एक जख्मी ऑफिसर को बचाते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद हो गए थे. जान की परवाह किए बगैर उन्होंने लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा. जब ऑपरेशन भी अंतिम समय पर था, तो कैप्टन अपने घायल साथी लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए लपके. लेकिन इस दौरान दुश्मन की गोली सीधे बत्रा के सीने में जा धंसी.

विक्रम बत्रा को उनके दोस्त और दुश्मन दोनों 'शेरशाह' के नाम से पुकारते थे. लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते वक्त बत्रा ने कहा था, ‘तुम हटो, तुम्हारे बीवी और बच्चे हैं.' भारत सरकार ने विक्रम बत्रा के अद्मय शौर्य और पराक्रम को देखते हुए मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा.

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First published: July 7, 2019, 2:40 PM IST
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