तमिलनाडु मॉडल की तरह कांग्रेस-जेडीएस बागियों को सबक सिखाना चाहती है

तमिलनाडु में 2017 में 18 विधायकों ने AIADMK से बगावत कर दी थी. दिनाकरण की अगुआई में उन विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था. कर्नाटक में इसी तरह का राजनीतिक खेल चल रहा है

News18Hindi
Updated: July 11, 2019, 5:11 PM IST
तमिलनाडु मॉडल की तरह कांग्रेस-जेडीएस बागियों को सबक सिखाना चाहती है
कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार खतरे में है
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Updated: July 11, 2019, 5:11 PM IST
कर्नाटक की सियासत में तमाम रंग आ जा रहे हैं. मिनट-मिनट में राजनीतिक हालात बदल जा रहे हैं. कांग्रेस-जेडीएस के बागी विधायक अपना इस्तीफा स्वीकार किए जाने को लेकर अड़े हैं. तो स्पीकर किसी भी तरह से मामले को कुछ दिनों के लिए टालने के मूड में हैं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब शाम 6 बजे बागी विधायकों से मिलना उनके लिए जरूरी हो गया है.

शुक्रवार से विधानसभा का मानसून सेशन शुरू हो रहा है. कर्नाटक विधानसभा की सदस्य संख्या 224 है. बहुमत के लिए चाहिए 113. अगर इस्तीफा मंजूर नहीं किया जाता है तो कांग्रेस-जेडीएस के पास 116 की संख्या है. कांग्रेस के 78 विधायक हैं और जेडीएस के 37, एक बीएसपी का विधायक साथ है. अगर स्पीकर को भी वोट करने की नौबत आती है तो सरकार के पास 117 का आंकड़ा होगा.



क्या होगा अगर मंजूर होगा इस्तीफा 

अगर 16 विधायकों का इस्तीफा मंजूर कर लिया जाता है तो असेंबली की सदस्य संख्या 208 रह जाएगी. बहुमत का आंकड़ा 105 का हो जाएगा और सरकार के पास 100 की सदस्य संख्या ही होगी. बीजेपी के 105 विधायक हैं दो निर्दलीयों को मिला दें तो आंकड़ा 107 का हो जाता है.

कांग्रेस-जेडीएस की सरकार अपने बागी विधायकों को सबक सिखाना चाहती है. इस्तीफा स्वीकार नहीं किए जाने की स्थिति में सदस्य संख्या 224 ही रहेगी. इस स्थिति में अगर विश्वास मत या अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जाता है तो कांग्रेस और जेडीएस अपने विधायको को व्हीप जारी कर सकती है. विधायकों पर एक तरह से दवाब होगा. अगर बागी विधायक सरकार के खिलाफ जाते हैं तो एंटी-डिफेक्शन लॉ के तहत उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है. तमिलनाडु में इसी तरह से 2017 में विधायकों की सदस्यता गई थी.

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तमिलनाडु में ऐसी ही राजनीतिक उठापटक हुई थी
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2017 में तमिलनाडु में ऐसी ही राजनीतिक उठापटक हुई थी. उस वक्त एआईएडीएमके के 18 विधायकों ने बगावत कर दी. पार्टी के पूर्व नेता रहे टीटीवी दिनाकरण की अगुआई में इन विधायकों ने इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे की वजह से सरकार अल्पमत में आ गई. लेकिन तमिलनाडु के स्पीकर पी धनपाल ने उन्हें दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य करार दे दिया. अयोग्य करार दिए गए विधायकों ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली. विधायक सुप्रीम कोर्ट भी गए लेकिन स्पीकर के फैसले को बरकरार रखा गया. इसके बाद उन सीटों पर उपचुनाव हुए.

18 विधायकों के अयोग्य करार दिए जाने के बाद तमिलनाडु विधानसभा की सदस्य संख्या 233 (जयललिता के निधन की वजह से एक सीट खाली थी) से घटकर 215 पर आ गई. बहुमत का जादुई आंकड़ा 108 का हो गया. उस वक्त डीएमके के पास 89 विधायक थे, जबकि कांग्रेस के 8 और आईयूएमएमएल का एक विधायक. इस गठबंधन के पास कुल 98 विधायक हो गए.

वहीं दिनाकरण के साथ एआईएडीएमके के बागी विधायकों की संख्या 21 होने का दावा कर रहे थे. इन सभी की मिलाकर कुल संख्या 119 की हो जाती है. इस गुट का राजनीतिक समीकरण ये था कि 234 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 117 का है और उनके पास 119 विधायकों का समर्थन है. लेकिन स्पीकर के 18 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दिए जाने की वजह से मामला उलट गया. एआईएडीएमके की सरकार बची रह गई. क्योंकि उनके पास उस वक्त भी 114 विधायकों का समर्थन था.
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