कर्नाटक : दल बदल कानून जिसके बाद रिज़ॉर्ट मालिकों की हुई चांदी..

कर्नाटक : दल बदल कानून जिसके बाद रिज़ॉर्ट मालिकों की हुई चांदी..
मौका देखकर दल बदलने वाले नेताओं पर शिकंजा कसने के लिए बना दल बदल कानून

कर्नाटक चुनाव 2018 के नतीजों के बाद शुरू हुए ड्रामे में येदुरप्पा को सीएम बना तो दिया गया है लेकिन बीजेपी, कांग्रेस-जेडीएस विधायकों को खींचने की कोशिश में जुटी है. ऐसे में कांग्रेस द्वारा दल बदल कानून का हवाला दिया जा रहा है. आइए जानते हैं क्या कहता है दल बदल कानून.

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कर्नाटक चुनावों के नतीजे आ भी गए और शायद नहीं भी आए. जनता ने तो अपना फैसला सुना दिया लेकिन राजनीतिक पार्टियां इस फैसले की अपने अपने तरीके से व्याख्या करके इसे अपने पक्ष में ला रही हैं. जहां इस चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी (105 विधायक जिसमें एक निर्दलीय है), वहीं कांग्रेस के पास 78 और जेडीएस के पास 38 विधायक हैं. ऐसे में बीजेपी ने सबसे पहले राज्यपाल के पास के पहुंचकर सरकार बनाने की पेशकश कर डाली – यह कहते हुए कि वह सबसे बड़ी पार्टी है. कांग्रेस और जेडीएस ने इसे यह कहते हुए असंवैधानिक बताया कि इन दोनों पार्टियों के पास मिलकर बहुमत है. राज्यपाल ने भी येदूरप्पा को 15 दिन में बहुमत साबित करने का वक्त देकर शपथ दिलवाने का काम कर दिया.

अब 15 दिन में बीजेपी को 7 विधायकों का इंतज़ाम करना है ताकि 112 के अंक के साथ वह बहुमत साबित कर सके. यह सात विधायक कांग्रेस और जेडीएस से लाने की कोशिश की जा रही है. पार्टी में दरार आने से रोकने के लिए कांग्रेस ने बेंगलुरू के पास एक रिज़ोर्ट की शरण ली है. बुधवार को कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने कहा कि अहम पार्टी मीटिंग से पहले सभी विधायकों को रिज़ोर्ट में ले जाया जा रहा है. वहीं विधायकों के लिए चाहकर भी ऐसा करना मुश्किल है कि क्योंकि कहा जा रहा है कि ऐसा करने पर दल बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता खत्म नहीं हो जाएगी.

16 मई को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर देर रात तक चली ऐतिहासिक सुनवाई में कांग्रेस ने कहा कि अगर उनकी या जेडीएस की पार्टी से नेता बीजेपी में शामिल होते हैं तो यह दल बदल माना जाएगा. ऐसे में केंद्र सरकार ने दलील दी कि दल बदल कानून जो सांसदों या विधायकों को पार्टी बदलने से रोकता है, वह कर्नाटक के नव निर्वाचित सदस्यों पर तब तक लागू नहीं होता, जब तक कि वह शपथ नहीं ले लेते. हालांकि कोर्ट ने इस दलील को बेतुका बताते हुए इस खुले आम सौदा करने के लिए दिया गया न्यौता करार दिया.



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बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने बेंगलुरू के पास इस रिजो़र्ट में विधायकों को ठहराया है

इस पूरे मसले में सबकी नज़र दल बदल कानून पर है जिसके तहत निर्वाचित सदस्यों का विशेष परिस्थितियों में अपनी पार्टी को छोड़ देने का मतलब सदस्यता रद्द हो जाना है. आइए समझें -

  • भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को दल बदल विरोधी कानून कहा जाता है.

  • इसे 1985 में 52वें संशोधन के साथ संविधान में शामिल किया गया था.

  • दल बदल कानून की जरूरत तब महसूस हुई जब राजनीतिक लाभ के लिए लगातार सदस्यों को बगैर सोचे समझे दल की अदला बदली करते हुए देखा जाने लगा.

  • अवसरवादिता और राजनीतिक अस्थिरता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी, साथ ही जनादेश की अनदेखी भी होने लगी.

  • इस कानून के तहत कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे/  यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे/ कोई निर्दलीय, चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए/ यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वाइन कर ले तो उसकी सदस्यता जाएगी

  • 1985 में कानून बनने के बाद भी जब अदला बदली पर बहुत ज्यादा शिकंजा नहीं कस पाया तब इसमें संशोधन किए गए. इसके तहत 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे असंवैधानिक करार दिया जाएगा.

  • इसके अलावा इसी संशोधन में धारा 3 को भी खत्म कर दिया गया जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. अब ऐसा कुछ करने के लिए दो तिहाई सदस्यों की रज़ामंदी की जरूरत होगी.

  • यही अहम प्रावधान कर्नाटक की मौजूदा स्थिति पर भी फिट बैठता है, जो सदन में किसी भी पार्टी के दो तिहाई से कम विधायकों को तोड़ने से रोकता है. यही वजह है कि जब जब चुनाव के बाद इस तरह की स्थिति बनती है तो रिज़ोर्ट मालिकों की चांदी हो जाती है. पार्टी के सदस्यों को तोड़ा न जा सके इसलिए उन्हें एक साथ रखने के लिए शहर के बाहर किसी रिज़ोर्ट की शरण ली जाती है.

  • हालांकि पिछले महीने ही कानून आयोग ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ करवाए जाने को लेकर एक ड्राफ्ट पेपर तैयार किया था. इसके तहत दी गई सिफारिशों में कहा गया कि त्रिशंकु संसद या विधानसभा के मामले में गतिरोध को रोकने के लिए दल बदल कानून की कड़ाई को 'अपवाद के तौर पर हटाया' जा सकता है. लेकिन ध्यान रहे अभी तक यह सिर्फ सिफारिश है.

  • इसके अलावा चुनाव आयोग भी इस कानून को लेकर अपनी भूमिका में स्पष्टता चाहता है. इसके अलावा यह मांग भी उठी है कि ऐसे हालात में स्पीकर या अध्यक्ष की राय की समीक्षा भी ठीक से की जानी चाहिए. और तो और स्वेच्छा से दल छोड़ने के अर्थ की भी ठीक से व्याख्या की जाए. क्योंकि इस कानून का इस्तेमाल सदस्य को अपनी बात रखने से रोकने और 'पार्टी ही सर्वोच्च है' कि भावना को सही ठहराने के उद्देश्य से भी किया जा सकता है.


जहां तक कर्नाटक की बात है तो दल बदल कानून के तहत किसी भी सदस्य का चयनित होने के बाद दूसरी बारी में शामिल होना उसे भारी पड़ सकता है. ऐसे में जानकारों के मुताबिक बीजेपी को दिए गए 15 दिन के समय में क्या किया जा सकता है. न्यूज़ 18 हिन्दी के संवाददाता ओमप्रकाश कुशवाहा ने इस बारे में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार से बातचीत की.

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जेडीएस के कुमारस्वामी का आरोप है कि बीजेपी उनके विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रही है


कुमार के मुताबिक "सदन में बहुमत के लिए वोटिंग से पहले जेडीएस और कांग्रेस व्हिप तो जरूर जारी करेंगी. व्हिप जारी होने के बाद कोई भी विधायक अपनी पार्टी के खिलाफ वोट नहीं कर सकता. उसकी सदस्यता चली जाएगी. लेकिन यदि वह गैरहाजिर हो जाएं तो व्हिप लागू नहीं होगा. मुझे लगता कि कुछ विधायकों को गैरहाजिर करवाने का विकल्प ही अपनाया जाएगा. इससे बहुमत का आंकड़ा बदल जाएगा और बीजेपी आसानी से फ्लोर टेस्ट पास कर लेगी."

क्या कांग्रेस या फिर जेडीएस के विधायक दल बदल का खतरा मोल लेंगे. कुमार के मुताबिक "दलबदल अवैधानिक है लेकिन यदि सदस्य नई पार्टी बना लें तो उसे वैध माना जाएगा. लेकिन इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी. ज्यादा विधायकों की जरूरत होगी, ऐसा करना आसान नहीं होगा."

तो देखते हैं दल बदल कानून के सहारे कांग्रेस और जेडीएस क्या अपनी नाव बचा पाएंगे या फिर इस कानून की खामियों का इस्तेमाल करके बीजेपी की नैया पार लग पाएगी.
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