कर्नाटक: क्यों फंसा है इस्तीफे का पेच, क्या होते हैं स्पीकर के अधिकार

कर्नाटक का राजनीतिक संकट बरकरार है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद स्पीकर मंगलवार तक इस्तीफे को स्वीकार या अस्वीकार करने पर कोई फैसला नहीं ले सकते हैं. सवाल है कि इस्तीफे को लेकर स्पीकर के पास क्या अधिकार होते हैं और इस बारे में रूलबुक क्या कहता है.

News18Hindi
Updated: July 13, 2019, 3:04 PM IST
कर्नाटक: क्यों फंसा है इस्तीफे का पेच, क्या होते हैं स्पीकर के अधिकार
कर्नाटक के स्पीकर के आर रमेश मंगलवार तक कोई फैसला नहीं ले सकते
News18Hindi
Updated: July 13, 2019, 3:04 PM IST
कर्नाटक के राजनीतिक संकट में वहां के स्पीकर की भूमिका बड़ी हो गई है. इस अनिश्चितता की हालत में एक स्पीकर से अपेक्षा की जाती है कि वो निष्पक्ष होकर फैसला लें. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार तक के लिए स्पीकर से यथास्थिति बनाए रखने को कहा है. उधर कर्नाटक के सीएम एचडी कुमारस्वामी ने विधानसभा में बहुमत साबित करने का दावा कर एक अलग राजनीतिक दांव चल दिया है. कांग्रेस, जेडीएस और बीजेपी अपने-अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में लगे हैं. इस पूरे राजनीतिक संकट के बीच सवाल उठता है कि इस तरह के राजनीतिक संकट में एक स्पीकर को किस तरह से फैसला लेना चाहिए? स्पीकर के पास कितने अधिकार होते हैं? स्पीकर की जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और अधिकारों पर रूलबुक क्या कहता है?

कांग्रेस-जेडीएस के 16 विधायकों के इस्तीफे पर स्पीकर केआर रमेश की पहली प्रतिक्रिया थी कि ‘कोई भी आकर इस्तीफा दे सकता है. लेकिन मैं तुरंत इस्तीफा स्वीकार नहीं कर सकता. मुझे जांच करनी होगी. मैं रूलबुक के मुताबिक फैसले लूंगा. मुझे फैसले तक पहुंचने से पहले मामले को समझना होगा. सभी सदस्य व्यक्तिगत तौर पर जनता द्वारा चुने गए हैं. मैं कोई गलती नहीं करना चाहता ताकि भविष्य में मेरे ऊपर कोई आरोप नहीं लगे. ’ अब सवाल है कि स्पीकर का रूलबुक क्या कहता है?



क्या कहता है स्पीकर का रूलबुक

कर्नाटक विधानसभा की प्रक्रिया के नियम 202 (1) के तहत अगर कोई विधायक अपने पद से इस्तीफा देना चाहता है तो वो अपने हाथ से लिखकर इसकी जानकारी स्पीकर को देगा. इसके लिए उसे एक फॉर्म भी भरना होगा. और इस्तीफे की कोई वजह नहीं बताना होगा. इसके बाद ये एक त्याग पत्र के प्रारूप में लिया जाएगा. जिसमें आधिकारिक तौर पर लिखा होगा कि मैं हाउस से अपना त्यागपत्र सौंपता हूं जो फलां तारीख से मानी जाए...

karnataka political crisis speaker ramesh kumar rights according to rulebook and constitution congress jds mla resignation hd kumaraswamy yeddyurappa
कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस के बागी विधायक इस्तीफा देने जाते हुए


रूलबुक में साफ तौर पर लिखा है कि त्यागपत्र के प्रारूप में किसी तरह की हेरफेर न हो. अगर कोई विधायक अपने त्यागपत्र में कोई वजह या कोई न बताए जाने योग्य बात लिखे तो स्पीकर अपने विवेक से ऐसे शब्दों और वाक्यों को निकाल दे और उसे हाउस में न पढ़ा जाए.

इसी नियम से संबंधित एक उपनियम 202 (2) कहता है कि अगर कोई सदस्य स्पीकर के सामने मौजूद होकर निर्धारित प्रारूप के मुताबिक स्वैच्छिक और वास्तविक तौर पर अपना इस्तीफा देता है और स्पीकर को इस संबंध में पहले से जानकारी नहीं होती है. ऐसी स्थिति में अगर स्पीकर को लगे तो वो तुरंत इस्तीफा स्वीकार कर सकते हैं.
Loading...

स्पीकर के पास इस्तीफा अस्वीकार करने का भी है अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले पिछले शनिवार को जब कांग्रेस और जेडीएस के 13 विधायक स्पीकर को इस्तीफा सौंपने गए तो स्पीकर अपना ऑफिस से बाहर निकल चुके थे. विधायकों ने उनके ऑफिस में अपना इस्तीफा छोड़ा दिया और बाद में राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा देने का फैसला बताया. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब विधायक स्पीकर से मुलाकात करके अपना इस्तीफा दे चुके हैं. लेकिन इस्तीफे को स्वीकार करने पर फैसला नहीं लिया गया है.

रूलबुक में उपनियम 202 (3) के मुताबिक अगर स्पीकर को पोस्ट के जरिए या किसी और तरीके से किसी सदस्य का इस्तीफा मिलता है तो वो पहले जांच करेंगे कि वो स्वैच्छिक और वास्तविक तौर पर दिया गया इस्तीफा है या नहीं. जांच के लिए वो विधानसभा सचिवालय या किसी दूसरी एजेंसी की मदद ले सकते हैं. अगर स्पीकर को जांच के बाद लगता है कि इस्तीफा स्वैच्छिक और वास्तविक नहीं है तो वो इस्तीफे को अस्वीकार कर सकते हैं.

 karnataka political crisis speaker ramesh kumar rights according to rulebook and constitution congress jds mla resignation hd kumaraswamy yeddyurappa
कांग्रेस-जेडीएस के बागी विधायक


भारतीय संविधान के 33वें संशोधन में इस्तीफे को लेकर निर्देश दिए गए

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 101 (3) में इस बारे में पहले स्पष्ट निर्देश नहीं थे. पहले व्यवस्था थी कि अगर सचिवालय के प्रिजाइडिंग ऑफिसर को इस्तीफा मिल जाता है तो उसे स्वीकार माना जाएगा. इस्तीफे के स्वीकार करने की प्रक्रिया के बारे में संविधान के 33वें संशोधन में व्यवस्था की गई. 1974 में हुए 33वें संशोधन में इस बात की जांच करने की व्यवस्था की गई कि कहीं इस्तीफा जबरदस्ती तो नहीं दिलवाया जा रहा है.

इस्तीफे का एक पेचीदा मामला 1999 में सामने आया था. भोपाल से बीजेपी सांसद सुशील चंद्र वर्मा ने 15 फरवरी 1999 को अपना इस्तीफा लोकसभा स्पीकर को लिखित तौर पर भेज दिया. इस्तीफा भेजने के बाद भी सुशील चंद्र वर्मा लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेते रहे और उनकी उपस्थिति रजिस्टर पर उनकी मौजूदगी भी दर्ज होती रही. 26 फरवरी 1999 को उन्होंने वोटिंग में हिस्सा भी ले लिया. इसके बाद स्पीकर ने उन्हें तलब किया और उनके इस्तीफे की बाबत पूछताछ की. वर्मा ने 19 फरवरी 1999 को स्पीकर को लिखित तौर पर सूचना दी कि जिस वजह से वो इस्तीफा दे रहे थे वो सुलझा ली गई है. इसके बाद स्पीकर ने उनका इस्तीफा रद्द कर दिया.

संविधान की 10वीं अनुसूची में ये व्यवस्था है कि अगर लोकसभा या विधानसभा का कोई सदस्य स्वैच्छिक तौर पर जिस पार्टी के टिकट से वो जीतकर आया है, उसकी सदस्यता छोड़ना चाहता हो तो उसकी लोकसभा या विधानसभा की सदस्यता रद्द की जाए.

ये भी पढ़ें: कर्नाटक संकट: क्या जब चाहे पद से इस्तीफा दे सकते हैं विधायक? जानें कायदे-कानून

 वो कांग्रेसी अध्यक्ष जिन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के इशारों पर चलने से मना कर दिया

तमिलनाडु मॉडल की तरह कांग्रेस-जेडीएस बागियों को सबक सिखाना चाहती है
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...