जानिए, सिखों के लिए आखिर इतना खास क्यों है करतारपुर साहिब?

करतारपुर कॉरीडोर सिखों के लिए सबसे पवित्र जगहों में से एक है. करतारपुर साहिब सिखों के प्रथम गुरु, गुरुनानक देव जी का निवास स्‍थान था.

News18Hindi
Updated: November 26, 2018, 3:55 PM IST
जानिए, सिखों के लिए आखिर इतना खास क्यों है करतारपुर साहिब?
गुरुद्वारा करतारपुर साहिब (फाइल फोटो)
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Updated: November 26, 2018, 3:55 PM IST
गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती के मौके पर एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गुरदासपुर जिले के डेरा बाबा नानक से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक करतारपुर गलियारे की इमारत और विकास को मंजूरी दे दी. केंद्र की मंजूरी के बाद अब दिल्ली-करतारपुर रास्ते का निर्माण करवाया जाएगा. ये विकास कार्य पाकिस्तान से लगी सीमा तक करवाया जाएगा.

केंद्र के इस फैसले से भारतीय तीर्थ यात्रियों को पाकिस्तान में रावी नदी के तट पर गुरुद्वारा करतारपुर साहिब जाने की सुविधा मिल सकेगी. इससे भारतीय तीर्थ यात्री पूरे साल पाकिस्तान में स्थित इस गुरुद्वारे की यात्रा कर सकेंगे.

क्यों इतना खास है करतारपुर साहिब?
करतारपुर कॉरीडोर सिखों के लिए सबसे पवित्र जगहों में से एक है. करतारपुर साहिब सिखों के प्रथम गुरु, गुरुनानक देव जी का निवास स्‍थान था. गुरू नानक ने अपनी जिंदगी के आखिरी 17 साल 5 महीने 9 दिन यहीं गुजारे थे. उनका सारा परिवार यहीं आकर बस गया था. उनके माता-पिता और उनका देहांत भी यहीं पर हुआ था. इस लिहाज से यह पवित्र स्थल सिखों के मन से जुड़ा धार्मिक स्थान है.

बाद में उनकी याद में यहां पर एक गुरुद्वारा बनाया गया. इसे ही करतारपुर साहिब के नाम से जाना जाता है. यह पाकिस्‍तान के नारोवाल जिले में है जो पंजाब मे आता है. यह जगह लाहौर से 120 किलोमीटर दूर है. जहां पर आज गुरुद्वारा है.

गुरुनानक ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और यहां खेती कर उन्होंने 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का फलसफा दिया था. इतिहास के अनुसार गुरुनानक देव की तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी इसी स्थान पर सौंपी गई थी. जिन्हें दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है और आखिर में गुरुनानक देव ने यहीं पर समाधि ली थी.

यह गुरुद्वारा रावी नदी के पास है और डेरा साहिब रेलवे स्‍टेशन से इसकी दूरी चार किलोमीटर है. यह गुरुद्वारा भारत-पाकिस्‍तान सीमा से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर है. गुरुद्वारे भारत की तरफ से साफ नजर आता है. पाकिस्‍तानी अथॉरिटीज इस बात का ध्‍यान रखती हैं कि इसके आसपास घास न जमा हो पाए और वह समय-समय पर इसकी कटाई-छटाई करते रहते हैं ताकि इसे देखा जा सके.
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दूरबीन से किए जाते हैं दर्शन
भारतीय सीमा की तरफ बसे श्रद्धालु सीमा पर खड़े होकर ही इसका दर्शन करते हैं. मई 2017 में अमेरिका स्थित एक एनजीओ इकोसिख ने गुरुद्वारे के आसपास 100 एकड़ की जमीन पर जंगल का प्रस्‍ताव भी दिया था. पटियाला के महाराजा ने दी रकम गुरुद्वारे की वर्तमान बिल्डिंग करीब 1,35,600 रुपए की लागत से तैयार हुई थी. इस रकम को पटियाला के महाराज सरदार भूपिंदर सिंह की ओर से दान में दिया गया था. बाद में साल 1995 में पाकिस्‍तान की सरकार ने इसकी मरम्‍मत कराई थी और साल 2004 में यह काम पूरा हो सका.

लेकिन कई बार इसके करीब स्थित रावी नदी इसकी देखभाल में कई मुश्किलें भी पैदा करती है. साल 2000 में पाकिस्‍तान ने भारत से आने वाले सिख श्रद्धालुओं को बॉर्डर पर एक पुल बनाकर वीजा फ्री एंट्री देने का फैसला किया था. साल 2017 में भारत की संसदीय समिति ने कहा कि आपसी संबंध इतने बिगड़ चुके हैं कि किसी भी तरह का कॉरीडोर संभव नहीं है.

लेकिन अब गृह मंत्रालय ने बयान में कहा कि इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रोद्यौगिकी मंत्रालय पाकिस्तान में स्थित करतारपुर साहिब को देखने के लिए श्रद्धालुओं के लिए एक हाई पावर दूरबीन लगाएगा, जबकि रेल मंत्रालय एक ट्रेन चलाएगा जो सिख गुरू से संबंधित स्थानों से गुजरेगी.

सिद्धू के पाकिस्तान जाने के बाद हुई थी चर्चा
करतारपुर साहिब का मुद्दा पंजाब सरकार में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के एक दावे के बाद चर्चा में आ गया था. उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने उनसे कहा है कि पाकिस्तान करतारपुर साहिब गालियारा खोल सकता है.

दरअसल, सिद्धू अपने दोस्त क्रिकेटर से सियासत में आए इमरान खान के प्रधानमंत्री पद पर शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने के लिए अगस्त में पाकिस्तान गए थे और वतन लौटने पर उन्होंने उक्त दावा किया था.

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