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केबीसी सवाल : दो महावीर चक्र से सम्मानित जगमोहन नाथ की अनसुनी कहानी

भारतीय वायुसेना अफसर रहे जगमोहन नाथ.

भारतीय वायुसेना अफसर रहे जगमोहन नाथ.

पराक्रम की मिसाल रहे वायुसेना अफसर (IAF Officer) की रोमांचक कहानी में दुश्मन के छक्के छुड़ाने के कारनामे भरे पड़े हैं. भारत चीन युद्ध (India-China War) रहा हो या भारत पाकिस्तान युद्ध, (Indo-Pak War) एयर फोर्स के इस 'प्रोफेसर' ने जान की परवाह कभी नहीं की.

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    एक नहीं, दो बार महावीर चक्र (Mahavir Chakra) अपने नाम करने वाले जगमोहन नाथ के बारे में आप क्या और कितना जानते हैं? लोकप्रिय टीवी गेम शो कौन बनेगा करोड़पति (Kaun Banega Crorepati) में भारत चीन युद्ध से जुड़ा एक अहम सवाल पूछा गया - '1962 के चीन युद्ध के लिए भारतीय वायु सेना को प्रदान किया गया इकलौता महावीर चक्र किस वायु सेना अफसर (IAF Officer) को दिया गया था?' इस प्रश्न का सही उत्तर जगमोहन नाथ है. और कहानी इस सवाल के भीतर छुपी हुई है क्यों नाथ को महावीर चक्र से नवाज़ा गया था?

    आपको बता दें कि परमवीर चक्र के बाद भारतीय सेना में दूसरा सबसे बड़ा शौर्य सम्मान महावीर चक्र ही है. लगातार दो युद्धों में यह सम्मान अपने नाम करने वाले नाथ के पराक्रम की कहानी अपने आप में भारतीय जवानों के साहस का इतिहास बयान करती है. जबकि भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव जारी है, तो आपको उस अफसर की कहानी रोमांचक लग सकती है, जिसने जान की परवाह किए बगैर देश के लिए फर्ज़ निभाया था.

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    'चीनी आसानी से कर सकते थे शूट'
    1962 के ऐतिहासिक युद्ध के समय जब 80 हज़ार चीनी सैनिकों के मुकाबले भारत के करीब 20 हज़ार सैनिक कठिन स्थितियों में जूझ रहे थे, तब भारत के सामने यह चुनौती थी कि दुश्मन के इलाकों में उसकी पोज़ीशनों को समझा जा सके. खतरा यह भी था कि कहीं चीनी सैनिक कलकत्ता जैसे किसी भारतीय शहर की तरफ आक्रमण के लिए कोई रणनीति न बना रहे हों.

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    केबीसी में सोमवार रात पूछा गया यह सवाल.


    अक्साई चिन और तिब्बत के क्षेत्रों में चीनी फौजों की पोज़ीशन और लेाकेशनों को समझने के लिए चुनौती भरा काम था​ कि विमान में लगे कैमरों के ज़रिये एक टोही मिशन को अंजाम दिया जाए. इस मिशन के लिए तब स्क्वाड्रन लीडर नाथ को ज़िम्मेदारी दी गई. इस टोही​ मिशन में जान की परवाह किए बगैर दुश्मन के इलाके में घुसकर उसकी तमाम सूचनाएं नाथ लेकर आए.

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    एक इंटरव्यू में नाथ ने अपना वो जोखिम भरा अनुभव सुनाते हुए कहा था कि उस वक्त चीनी उन्हें साफ तौर पर देख सकते थे और उनके विमान को मार गिरा सकते थे क्योंकि तस्वीरें लेने के लिए विमान को बहुत नीचे और धीमी रफ्तार से उड़ाने का जोखिम लेना ही पड़ा था. इस साहस और पराक्रम के लिए नाथ को युद्ध के बाद महावीर चक्र से नवाज़ा गया था.

    तीन साल बाद दोहराई गई कहानी
    1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी तो इस बार भी वायु सेना के लिए टोही मिशन की ज़िम्मेदारी अनुभवी नाथ को सौंपी गई. अपने इंग्लिश इलेक्ट्रा ​कैनबरा विमान को लेकर एक बार फिर नाथ दुश्मन के इलाके में उड़ान भरते रहे. उस समय 12000 फीट पर उड़ना ज़रूरी था ताकि रडार की पकड़ से बचा जा सके, लेकिन सूचनाएं बारीकी से जुटाने के लिए फिर जोखिम लेना ही था.

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    अपने विमान को पाकिस्तानी सेना के हमलों से किसी तरह बचाकर उड़ाते हुए नाथ ने तस्वीरें लीं. इस दौरान कई बार बाल बाल बचने की सूरत पेश आती रही. उनके विमान के पीछे दुश्मन के चार विमान पड़े और उनकी जान सांसत में थी, लेकिन नाथ चतुराई और हुनर से विमान को भारतीय सीमा तक लाने में सफल रहे. इस खतरनाक और सीक्रेट मिशन को अंजाम देने के लिए नाथ को फिर महावीर चक्र से नवाज़ा गया था.

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    वायु सेना ने शुरूआती युद्धों में सीमित संसाधनों के बीच पराक्रम का प्रदर्शन किया था.


    डॉक्टरों के खानदान में 'प्रोफेसर' थे नाथ!
    जी हां. यह एक दिलचस्प कहानी है. ब्रिटिश इंडिया के पंजाब में जन्मे जगमोहन नाथ का परिवार बंटवारे के बाद भारत शिफ्ट हुआ था. नाथ के परिवार में कई सदस्य डॉक्टर थे, लेकिन हवाई जहाज़ उड़ाने के शौक ने नाथ को सेना की तरफ मोड़ा. 1948 में उन्हें कोयंबटूर में वायु सेना के कॉलेज में दाखिला मिला और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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    कॉलेज में जल्द ही गुप्त और टोही ऑपरेशनों की उड़ान में महारत हासिल कर लेने के बाद उन्होंने भारत के लिए इतिहास रचा. वायु सेना के लिए बेहद सीक्रेट मिशनों को अंजाम देने वाले नाथ उस वक्त सीधे एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह को रिपोर्ट करते थे. नाथ की कुशलता को देखते हुए सिंह ने उन्हें सीक्रेट कोडनेम 'प्रोफेसर' दिया था.

    दो युद्धों में मिसाल कायम करने के बाद साल 1969 में नाथ वायुसेना से रिटायर हो गए और विमान उड़ाने का शौक बरकरार था इसलिए उन्होंने एयर इंडिया में कमर्शियल पायलट के तौर पर लंबा समय बिताया.

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