खाकी से खादी... कितने पुलिस अफसर सियासत में कैसे आज़मा चुके हैं किस्मत?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) 2020 : गुप्तेश्वर पांडेय के जेडीयू (JDU) जॉइन करने के हंगामे के बीच क्या आपको पता है कि बिहार में पहले कितने आला पुलिस अफसर राजनीति में आ चुके हैं? बिहार ही क्या, देश में ये ट्रेंड कैसा रहा है?

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  • Last Updated: September 28, 2020, 7:51 PM IST
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बिहार चुनावों (Bihar Elections) से कुछ ही समय पहले राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) गुप्तेश्वर पांडेय (IPS Gupteshwar Pandey) के राजनीति में आने की घटना में महत्वपूर्ण यह है कि वो 28 फरवरी 2021 को रिटायर होने वाले थे, लेकिन रिटायरमेंट (Retirement) से पहले ही पद छोड़कर राजनीति (IPS into Politics) में आए हैं. हालांकि उनके चुनाव लड़ने के बारे में अभी स्थितियां साफ नहीं हुई हैं, लेकिन पांडेय के इस कदम से ये चर्चा ज़रूर चल पड़ी है कि पुलिस अफसर राजनीति में (Cops Turned Politicians) किस तरह आते रहे हैं और किस तरह राजनीति में उनका करियर रहा है.

12 सीटों से चुनाव लड़ने के ऑफर होने की बात कहने वाले गुप्तेश्वर पांडेय से पहले भी पुलिस के आला अफसरों का राजनीति में पदार्पण होता रहा है. ​पुडुचेरी की वर्तमान उप राज्यपाल किरण बेदी का नाम इस फेहरिस्त में सबसे ज़्यादा चर्चित माना जाता है. आइए आपको बताते हैं कि कैसे पुलिस अफसर राजनीति में आने के कारण चर्चित होते रहे हैं.

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डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने जेडीयू का दामन थामा.

बिहार में पुरानी है परंपरा
गुप्तेश्वर पांडेय से पहले भी ऐसा हुआ है, जब पूर्व डीजीपी सियासत के मैदान में उतरे. नालंदा से चुनाव लड़ने और हारने वाले पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा का नाम चर्चित रहा. सीवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ उलझने को लेकर सुर्खियों में रहे पूर्व डीजीपी डीपी ओझा भी सियासी अखाड़े में कूदे थे और बेगूसराय से सीपीआई(एमएल) के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था. हालांकि ओझा भी चुनावी राजनीति में नाकाम ही रहे.



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बिहार के ही अन्य पुलिस अफसरों के राजनीति में आने की बात करें तो 1987 बैच के IPS अफसर सुनील कुमार का नाम याद आता है, जो जदयू में शामिल हुए. खबरों की मानें तो पूर्व डीजीपी सुनील कुमार के भाई अनिल कुमार कांग्रेस के विधायक हैं. और क्या आपको 'गंगाजल' वाले पुलिस अफसर की याद है?

आंख फोड़वा कांड से राजनीति तक
1980 के दशक में बिहार के भागलपुर में पुलिसकर्मियों द्वारा आरोपियों की आंखें फोड़ दिए जाने की घटना को इतना कवरेज मिला था कि पुलिस की कड़ी आलोचना हुई थी. तब भागलपुर के एसपी रहे विष्णु दयाल राम के खिलाफ सीबीआई जांच भी हुई थी लेकिन उनके खिलाफ सबूत नहीं मिले थे. इस कांड पर आधारित चर्चित बॉलीवुड फिल्म गंगाजल भी बनी थी. बहरहाल, अब वही विष्णु दयाल राम झारखंड के पलामू से सांसद हैं.

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पुडुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी.


किरण बेदी के राजनीति में आने की कहानी
यह कहानी तकरीबन सभी जानते हैं कि पहले किरण बेदी ने आम आदमी पार्टी के साथ सियासी सफर शुरू किया था, लेकिन 2014 में उन्होंने भाजपा और नरेंद्र मोदी का खुलकर समर्थन किया. उसके बाद भाजपा ने दिल्ली चुनाव के दौरान बेदी को सीएम के दावेदार के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया. आम आदमी पार्टी के हाथों हारने के बाद बेदी का एक तरह से चुनावी राजनीति से सरोकार बहुत बचा नहीं.

अन्य राज्यों में 'खाकी से खादी' के चर्चित चेहरे
इनके अलावा, सीआरपीएफ में एडीजी और झारखंड में डीजीपी रह चुके 1984 बैच के IPS अफसर डीके पांडेय ने भी भाजपा का दामन थामा था. खबरों की मानें तो मणिपुर में डीजीपी रहे 1976 बैच के IPS रहे युमनाम जयकुमार सिंह रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आए थे और वीरेन सिंह सरकार में डिप्टी सीएम तक बने थे. फिलहाल वह एनपीपी के विधायक हैं, लेकिन सरकार के खिलाफ बगावत कांड के चलते उन्हें पार्टी से बर्खास्त किया जा चुका है.

इसी फेहरिस्त में ओडिशा के डीजीपी रहे, प्रकाश मिश्रा का नाम है, जिन्हें विजिलेंस के आरोप में पद से हटाया गया था. रिटायरमेंट के बाद मिश्रा भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन सफल नहीं हुए. हरियाणा के डीजीपी रहे विकास नारायण राय 1977 बैच के IPS अफसर थे, जो 2014 में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए थे.

दक्षिण भारत में आर नटराज, एएक्स एलेग्जेंडर, एजी मौर्या जैसे नाम उल्लेखनीय रहे, जो पुलिस सेवा से राजनीति में सक्रिय हुए. वहीं, राजस्थान में, सवाई सिंह चौधरी, मदन मेघवाल और ​हरिप्रसाद शर्मा जैसे नामों को इस सिलसिले में याद किया जाता है.

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बेंंगलुरु के सिंघम कहे जाने वाले के अन्नमलई ने बीजेपी जॉइन की.


बेंगलुरु के 'सिंघम' ने थामा भाजपा का दामन
दक्षिण बेंगलुरु में डिप्टी कमिश्नर रह चुके IPS अफसर अन्नमलई कुप्पुस्वामी ने पिछले महीने ही दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में पार्टी का दामन थामा. अन्नमलई इसलिए प्रमुख नाम बने क्योंकि उन्होंने राजनीति में आने के लिए पुलिस सेवा को बहुत कम उम्र में ​ही अलविदा कह दिया था. बेंगलुरु में अपराधियों पर शिंकजा कसने के एक्शनों के लिए उन्हें 'सिंघम' कहा जाता रहा था.

सियासत में कैसे आते रहे हैं IPS?
पश्चिम बंगाल की सरकार में मंत्री बने यूएन बिस्वास की बात हो या फिर केंद्र सरकार में रहे नमो नारायण मीणा की, पुलिस के आला अफसरों का सियासत में आना और सियासत में रहना आसान नहीं रहा है. 2014 के चुनावों के दौरान कर्नाटक के बेंगलूरु से कांग्रेस के टिकट पर पूर्व IPS केसी राममूर्ति ने चुनाव लड़ा था. उसी समय, झारखंड में सीनियर अफसर अमिताभ चौधरी ने सियासत में हाथ आज़मान के लिए वॉलंटरी रिटायरमेंट लिया था.

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अरुण ओरांव से लेकर एचटी सांगलियान की बात हो या मिज़ोरम के ललदुहॉमा की, साफ दिखता है कि पुलिस अफसर राजनीति में ​करियर तलाशते रहे हैं. मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह के बारे में भी तकरीबन सभी जानते हैं कि कैसे वो नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री भी रहे. देश में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक के लगभग सभी राज्यों में ऐसा होता रहा है और पुलिस सेवा के कुछ चेहरे केंद्र की राजनीति तक चर्चित रहे हैं.

जब 15 गवर्नर थे पूर्व नौकरशाह
कुछ ही साल पहले जब भारी सरकारी मशीनरी तब्दीली हुई थी, तब 15 राज्यपाल पूर्व अधिकारी बने थे, जिनमें से 8 आईपीएस थे. अश्विनी कुमार, निखिल कुमार, एमके नारायणन, ईएसएल नरसिम्हन, रंजीत शेखर, बीएल जोशी, भारत वीर वांचू और गुरबचन जगत सभी पुलिस की विभिन्न संस्थाओं में आला अफसर रहे थे, जिन्हें अलग अलग राज्यों में राज्यपाल के पद सौंपे गए थे.

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पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे.


सुशील कुमार शिंदे को मत भूलिए
देश के पूर्व गृह मंत्री रहे चुके और सुशील कुमार शिंदे इस विषय में एक कामयाब नाम है. शोलापुर में सत्र अदालत में नाजिर के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले शिंदे महाराष्ट्र पुलिस में कॉंस्टेबल के पद पर भर्ती हुए थे. बाद में प्रमोशन से वह सब इंस्पेक्टर बने और फिर सीआईडी में छह साल तक उन्होंने सेवाएं दीं. इसके बाद शिंदे राजनीति में आए और कामयाब होते चले गए.
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