'राजनीति के जादूगर' अशोक गहलोत के बारे में 08 बातें, जो चुपचाप बडे़ 'खेल' कर देते हैं

'राजनीति के जादूगर' अशोक गहलोत के बारे में 08 बातें, जो चुपचाप बडे़ 'खेल' कर देते हैं
अशोक गहलोत ने अपने घर में बुलाई बैठक में ताकत का प्रदर्शन किया है (फाइल फोटो)

राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट के साथ अंदरूनी कलह ने अब बेशक गंभीर रूप धारण कर लिया हो और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने उन्हें खुलेआम चुनौती देते हुए विद्रोह कर दिया हो लेकिन लग रहा है कि इस पूरे प्रकरण में गहलोत वाकई राजनीति के जादूगर साबित होने जा रहे हैं.

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जो खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि अशोक गहलोत ने जो जयपुर में अपने घर पर कांग्रेस विधायकों की जो माीटिंग बुलाई थी, उसमें 107 में से 102 विधायक पहुंचे. गहलोत को राजस्थान की राजनीति का जादूगर कहा जाता है. वैसे उनका रिश्ता जादूगरी से इसलिए रहा भी है, क्योंकि उनके पिता का यही पेशा था.

दिसंबर 2018 में राजस्थान चुनावों में जीत के बाद वो फिर मुख्यमंत्री बने. सचिन पायलट राज्य सरकार में उप मुख्यमंत्री. हालांकि ये कहा गया कि सचिन इस पद के लिए तैयार नहीं थे लेकिन समीकरणों और ताकत में वो गहलोत से पीछे छूट गए. इसके बाद से दोनों के बीच लगातार उठापटक की खबरें आती रही हैं. अबकी बार जब सचिन ने खुला विद्रोह किया, तब फिर सबकी नजरें अशोक गहलोत पर हैं और लग रहा है कि वो फिर राजनीति के कुशल खिलाड़ी की तरह बाजी जीतने जा रहे हैं.

राजनीति गलियारों में गहलोत की 'जादूगरी' के कई किस्‍से चलते हैं. ऐसा ही एक किस्‍सा साल 2008 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा है. उस चुनाव में कांग्रेस को 200 में से 96 सीटें मिली थी. ऐसे में गहलोत ने बसपा के छह विधायकों को कांग्रेस में मिला लिया. यह सब मायावती की अनुमति के बिना हुआ था. ऐसे में बसपा के स्‍थानीय नेतृत्‍व ने विधायकों को अयोग्‍य करार देने की अपील की. इस पर राजस्‍थान में यह कहा गया कि, 'जादूगर ने फिर दिखाया कमाल. राजस्‍थान से हाथी हुआ गायब.' इसके बाद बड़े आराम से पांच साल तक सरकार चलाई. हालांकि सरकार का कार्यकाल पूरा होने से ठीक पहले इन छहों विधायकों पर फैसला गहलोत के विरोध में आया लेकिन तब त‍क उनका काम हो चुका था.




आइए जानते हैं राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बारे में 10 खास बातें -
अर्थशास्‍त्र से पोस्‍ट ग्रेजुएट गहलोत का जन्‍म 3 मई 1951 को जोधपुर में हुआ. उनके पिता लक्ष्‍मण सिंह गहलोत जादूगर थे. पिता से गहलोत ने भी जादूगरी के गुर सीखे. हालांकि, उन्‍होंने इसे पेशा नहीं बनाया लेकिन आगे चलकर उनके राजनीतिक दांवपेंच जादूगरी ही कहलाए
राजनीति में अशोक गहलोत ने कॉलेज के समय में कदम रखा. कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के साथ जुड़े और साल 1973 से 1979 की अवधि के बीच राजस्‍थान NSUI के अध्‍यक्ष रहे, साल 1979 से 1982 के बीच जोधपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष रहे.
1977 में 26 साल की उम्र में उन्‍होंने सरदारपुरा से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मांगी. उस समय कांग्रेस में संजय गांधी का दबदबा चलता था. उन्‍होंने ही गहलोत को उम्‍मीदवार बनाया. इस चुनाव के लिए उन्‍होंने बाइक बेची और उससे मिले पैसों से पूरा चुनाव लड़ा. एक करीबी दोस्‍त के सैलून को चुनाव कार्यालय बनाया. लेकिन विधायकी के लिए पहले टेस्‍ट में गहलोत नाकाम रहे. उन्‍होंने इस शिकस्‍त से हार नहीं मानी. तीन साल बाद 1980 में जोधपुर लोकसभा सीट से उन्‍हें टिकट मिला और वे सांसद बने. इसके बाद वे राजनीति की हरेक कसौटी पर खरे उतरते गए.
गहलोत की पहचान गांधीवादी नेता के रूप में होती है. लेकिन अपने विरोधियों को निपटाना भी गहलोत की एक पहचान है. राजनीति गलियारों के जानकार और गहलोत को करीब से जानने वालों का कहना है कि वे अपने विरोधियों की सभी बातें याद रखते हैं. वे कभी भी खुलकर नहीं बोलते हैं लेकिन चुपचाप अपना काम कर देते हैं.
राजस्‍थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के नेता किरोड़ी सिंह बैंसला ने एक बार उनके बारे में कहा था, 'गहलोत काफी सजग नेता हैं. इतने सजग कि उन्‍हें कोई दूध पिलाने की कोशिश करे तो वह उसका पहला घूंट किसी बिल्‍ली को पिलाए बिना खुद नहीं पिएंगे.'
]गहलोत काफी लो प्रोफाइल रहते हैं लेकिन कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटते. इसके कई उदाहरण हैं. जैसे- 2012 में आसाराम बापू को रेप के आरोप लगने पर गिरफ्तार करना हो या 2003 में विहिप के पूर्व तेजतर्रार नेता प्रवीण तोगड़िया को जेल में डालना.
अशोक गहलोत कांग्रेस की तीन अलग-अलग केंद्र सरकारों में मंत्री रहे. वे इंदिरा के साथ ही राजीव गांधी की कैबिनेट के भी सदस्‍य थे. बाद में नरसिम्‍हा राव सरकार में भी वे मंत्री बने. हालांकि, तांत्रिक चंद्रास्‍वामी से दूरी के चलते उन्‍हें नरसिम्‍हाराव सरकार से इस्‍तीफा देना पड़ा था. अब वे गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी यानी राहुल गांधी के साथ मिलकर सियासत के नए दांवपेंच चल रहे हैं.
गहलोत राजनीतिक विरोध के बावजूद भैरो सिंह शेखावत का खूब सम्‍मान करते हैं. शेखावत के निधन के बाद गहलोत हरेक बरसी पर उनको श्रद्धांजलि देने वाले सबसे पहले नेता होते हैं. कई बार तो बीजेपी नेताओं से पहले वे शेखावत को याद कर भगवा पार्टी को क्‍लीनबोल्‍ड कर देते हैं.
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