उपवास की घोषणा करने वाले राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के बारे में 10 खास बातें

हरिवंश नारायण सिंह एक पत्रकार के तौर पर हमेशा सादगी और सहजता के लिए जाने जाते थे.
हरिवंश नारायण सिंह एक पत्रकार के तौर पर हमेशा सादगी और सहजता के लिए जाने जाते थे.

राज्यसभा (Rajya Sabha) के उपसभापति (Deputy Chairman) हरिवंश नारायण सिंह (Harivansh Narayan Singh) चर्चाओं में हैं. 20 सितंबर को उच्च सदन में हुए हंगामे के बाद उन्होंने एक दिन का उपवास करने की घोषणा की है. सादगी और सहजता के लिए जाने जाने वाले हरिवंश के बारे में जानते हैं 10 खास बातें

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 22, 2020, 12:07 PM IST
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राज्यसभा में कृषि बिल पास कराने के लिए हुए हंगामे के बाद उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह व्यथित हैं. उन्होंने सभापति वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर कहा है कि जो कुछ हुआ, उससे वो दुखी हैं और एक दिन के उपवास पर बैठने जा रहे हैं. हरिवंश ने अपना करियर पत्रकार के रूप में शुरू किया था. फिर इसके बाद वो राज्यसभा में पहुंचे और उपसभापति चुने गए. सादगी और सहजता के लिए जाने वाले हरिवंश हमेशा से बुद्ध और गांधी को अपना आदर्श कहते आए हैं.

राज्यसभा में हुए हंगामे के बाद से वो लगातार चर्चाओं में हैं. मंगलवार को सुबह वो हंगामे और अशोभनीय व्यवहार के लिए राज्यसभा से निलंबित किए गए सांसदों के लिए चाय लेकर पहुंचे.

हाल ही में हरिवंश राजद के मनोज झा को हराकर दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए हैं.  हरिवंश को जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू ) ने 2014 में राज्यसभा में भेजा था. उसके बाद वो वर्ष 2018 में उपसभापति बने थे. इसके बाद उनकी सदस्यता का कार्यकाल अप्रैल 2020 में खत्म हो गया, जिससे ये उप सभापति का पद खाली हो गया. जेडीयू से वो दूसरी बार भी चुनकर राज्यसभा में भेजे गए.



harivansh narayan singh
हरिवंश ने राज्यसभा में पहुंचने से पहले एक पत्रकार के तौर पर लंबा करियर गुजारा है. वो झारखंड और बिहार से प्रकाशित होने वाले अखबार प्रभातखबर के मुख्य संपादक थे.

हरिवंश राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता में एक दमदार संपादक और पत्रकार के तौर पर पहचान बना चुके थे. उन्होंने अपना करियर 500 रुपये की नौकरी से शुरू किया था. अब देश की राजनीति में निश्चित तौर पर उन्होंने खास पहचान बना ली है. उनके बारे में 10 खास बातें.
वह बलिया के सिताब दियारा गांव में 30 जून 1956 को पैदा हुए. मूल रूप से वो कृषि पृष्ठभूमि के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं. गांव से उनका वास्ता लगातार बना रहा.
हरिवंश ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पढ़ाई की. फिर यहीं से पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया.
वर्ष 1974 में जब देशभर में जयप्रकाश नारायण समग्र आंदोलन के लिए अलख जगा रहे थे, तब वो भी इस आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया.
1977 में उन्होंने अपनी पहली नौकरी टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ 500 रुपये में शुरू की. इसके बाद उन्हें इसी मीडिया हाउस की मैगजीन धर्मयुग में मुंबई भेजा गया. धर्मयुग उन दिनों देश की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका थी. हरिवंश ने वहां पर 1981 तक काम किया.
1981 में उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया में सरकारी नौकरी शुरू की लेकिन ये उनको रास नहीं आई. चार साल ये नौकरी करने के बाद वो कोलकाता के अमृत बाजार पत्रिका अखबार का प्रकाशन करने वाले मीडिया हाउस से जुड़े, जो हिंदी में नई पत्रिका रविवार का प्रकाशन करने जा रहा था. यहां वो असिस्टेंट एडीटर के पद पर काम करने लगे.
1989 से उन्होंने रांची में प्रभात खबर अखबार के संपादक के तौर पर नई पारी शुरू की. इस अखबार को उन्होंने नया जीवन दिया. जब उन्होंने इस अखबार में अपना काम शुरू किया तो इसका सर्कुलेशन गिरकर महज 400 प्रतियों पर आ गया था लेकिन उसके बाद ये झारखंड का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचार पत्र बन गया.
हरिवंश का मीडिया करियर कुल मिलाकर 40 सालों का रहा. इस दौरान उन्होंने ग्रामीण पत्रकारिता को अगर पर्याप्त जगह दी तो चारा घोटाला को सबसे पहले उजागर करने वाला अखबार भी बने.
जेडीयू ने उन्हें 2014 में पहली बार राज्यसभा में भेजा, इसके बाद सियासत में उनकी नई पारी शुरू हुई. केवल 04 साल बाद जब राज्यसभा में पीजे कूरियन के बाद उपसभापति का पद खाली हुआ तो एनडीए ने उन्हें इसके लिए अपना उम्मीदवार बनाया. उन्होंने हरिप्रसाद को 125-105 से हराया. इस तरह वो राज्यसभा में 1952 के बाद तीसरे गैर कांग्रेसी उपसभापति बने.
हरिवंश ने कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ अतिरिक्त मीडिया सलाहकार के तौर पर काम किया. चंद्रशेखर की सरकार केवल 08 महीने ही चल पाई और उसके साथ ही उनकी ये पारी भी खत्म हो गई.
हरिवंश के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी हैं. दोनों विवाहित हैं.
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