किस तरह रमाबाई रानडे ने महिलाओं के लिए खोले कई दरवाजे?

रमाबाई रानडे और उनके सम्मान में जारी टिकट.
रमाबाई रानडे और उनके सम्मान में जारी टिकट.

इंटरनेशनल बालिका दिवस (Girls' Day) और महिला दिवस (Women's Day) जैसे मौके आते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में अमर शख्सियतों की याद के लिए बहाना ज़रूरी नहीं. औरतों के हक (Women Rights) के लिए लड़ने वाली पहली महिला के बारे में जानिए.

  • News18India
  • Last Updated: October 12, 2020, 10:05 AM IST
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इस बार अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस (International Girl's Day) को 'माय वॉइस अवर ईक्वल फ्यूचर' थीम के साथ मनाया गया तो यूनिसेफ (Unicef) ने बालिकाओं व किशोरियों के बीच अपने अधिकारों को लेकर सजग होने की मुहिम चलाई. लड़कियों के लिए एक बेहतर दुनिया बनाने के इस लक्ष्य को अस्ल में दुनिया में जारी समानता आंदोलन (Equality Movement) का हिस्सा समझा गया. इस संदर्भ में एक रोचक सवाल यह पैदा होता है कि महिला आंदोलन (Women Protest) का इतिहास क्या है यानी महिला अधिकारों के लिए पहली भारतीय आंदोलनकारी (Women Activist) कौन थीं?

आपको ताज्जुब हो सकता है, यह जानकर कि महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई भारत 19वीं सदी में शुरू हो गई थी. रमाबाई रानडे महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली पहली आंदोलनकारी थीं. 1862 में जन्मी रानडे ने एक राजनीति आंदोलनकारी के साथ ही, समाजसेवी और शिक्षाविद के तौर पर भी पहचान बनाई. जानिए बालिका दिवस के बहाने रमाबाई रानडे को याद क्यों किया जाना चाहिए. महात्मा गांधी ने रमाबाई के निधन पर कहा था :

रमाबाई का गुज़र जाना राष्ट्रीय क्षति है... उन्होंने सेवा सदन को अपने मन और आत्मा से पाला पोसा. अपनी पूरी शक्ति इस लक्ष्य में झोंक दी. नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में सेवा सदन एक मिसाल बन गया और ऐसा कारनामा दूसरा नहीं है.




महिलाओं को आवाज़ देने वाली महिला!
मुंबई में 19वीं सदी में हिंदू महिला सोशल क्लब और लिटरेरी क्लब की शुरूआत करते हुए रमाबाई ने महिलाओं को भाषाएं सिखाने, सामान्य ज्ञान और जागरूकता देने के साथ ही सिलाई बुनाई और दस्तकारी के काम सिखाए. यही नहीं, महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर बोलने की कला भी रमाबाई ने सिखाई और उन्हें प्रेरणा व जोश भी दिया. रूढ़िवादी समाज के लाख विरोध के बावजूद रमाबाई ने समाजसेवा नहीं छोड़ी.

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रमाबाई रानडे ने पुणे में इस स्कूल की स्थापना 19वीं सदी में की थी.


महिलाओं के बेहतर जीवन के लिए अपना पूरा जीवन लगा देने वाली रमाबाई ने 1908 में बंबई और 1909 में पूना में सेवा सदन की स्थापना की थी. यह संस्था परेशान महिलाओं और समाज द्वारा तिरस्कृत या छोड़ी गई खासकर विधवाओं को समाज कल्याण के लिए नर्सिंग जैसी ट्रेनिंग देने के मकसद से बनाई गई थी. बाद में यहां मेडिकल कॉलेज जैसी स्थापनाएं भी हुईं.

1904 में जब भारत में पहली बार महिला कॉन्फ्रेंस हुई थी, तब रमाबाई ही उसकी प्रमुख थीं. पहली भारत महिला परिषद की स्थापना का श्रेय रखने वाली रमाबाई ने पुणे में लड़कियों के लिए स्कूल की स्थापना करवाई थी. भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया तक उनकी गूंज पहुंची थी जब वॉर कॉन्फ्रेंस में शामिल होकर उन्होंने गवर्नर के सामने भारतीय महिला अधिकारों को लेकर बातचीत की थी.

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फिजी और केन्या में भारतीय मज़ूदरों के अधिकारों को लेकर भी रमाबाई ने संघर्ष किया था. उनके जन्म शताब्दी वर्ष 1962 में एक डाक टिकट उनके सम्मान में जारी किया गया था. महिलाओं के प्रति पुरुषों और महिलाओं का नज़रिया बदलने और महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाने वाली रमाबाई को खुद कैसे प्रेरणा मिली? उनमें इतनी हिम्मत और यह नज़रिया कहां से आया?

पति ही गुरु थे, दोस्त और प्रेरणा
जी हां, महादेव गोविंद रानडे यानी जस्टिस रानडे की पत्नी थीं रमाबाई. अपने पति से 21 साल छोटी रमाबाई को जस्टिस रानडे ने पढ़ाने लिखाने की ठान ली थी. लड़कियों को स्कूल न भेजने और छुआछूत के दौर में अपने खानदान और आसपास की तमाम महिलाओं की नाराज़गी झेलते हुए अपने पति के इस मिशन को पूरा करने में रमाबाई को जो ताकत मिली, वह भी उनके पति की ही दी हुई थी.

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जस्टिस रानडे की कोशिशों से ही सिर्फ मराठी बोल पाने वाली रमाबाई ने अंग्रेज़ी और बांग्ला में महारत हासिल की. सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए पहला भाषण हालांकि रमाबाई को उनके पति ने लिखकर दिया था, लेकिन जल्द ही वह न सिर्फ कुशल वक्ता बनीं बल्कि दूसरी कमज़ोर महिलाओं तक को उन्होंने हक के लिए बोलना सिखाया. नतीजा यह हुआ था कि वह युवावस्था तक आते आते अपने पति जस्टिस रानडे की अच्छी दोस्त बन गई थीं.

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कांग्रेस ने अपने स्थापना पुरुष को इस तरह सोशल मीडिया पर याद किया था.


​जस्टिस रानडे के विचारों से पूरी तरह प्रभावित रमाबाई ने 1901 में पति के देहांत के बाद से उनके दिखाए रास्ते पर कदम बढ़ाए. रानडे के विचारों के अनुरूप रमाबाई ने समाज और महिलाओं के बेहतर कल के लिए कई जोखिम उठाकर हर संभव काम किया. महात्मा गांधी के शब्दों में :

प्रख्यात विद्वान रानडे की जीवन संगिनी के तौर पर रमाबाई अपने पति की सच्ची दोस्त थीं. एक हिंदू विधवा के तौर पर उन्होंने आदर्श कायम किया. अपने पति के गुज़रने के बाद उन्होंने पति के सेवा क्षेत्र को जीवन का लक्ष्य बनाया और उनकी दृष्टि के अनुसार महिला सशक्तिकरण के रास्ते बनाए.


धर्म पर जस्टिस रानडे के विचारों और व्याख्यानों के संग्रह को छपवाने वाली रमाबाई ने आत्मकथा भी लिखी थी. महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलनकारी की छवि को उकेरने के लिए रमाबाई के चरित्र पर एक मराठी टीवी सीरियल करीब 8 साल पहले पूरे महाराष्ट्र में खासा पसंद किया गया था.
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