10 सबसे बड़े जन-आंदोलन, जिन्होंने बदल डाली देश की तस्वीर

किसान आंदोलन के तहत जमा हुए प्रदर्शनकारी.

किसान आंदोलन के तहत जमा हुए प्रदर्शनकारी.

पंजाब के किसानों (Farmers' Protests) और केंद्र सरकार के बीच चल रहे गतिरोध (Government vs Farmers) के बीच जानिए कि देश के वो 10 सबसे बड़े आंदोलन कौन से रहे हैं, जिनमें बगैर किसी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे के लोग भारी तादाद में सड़कों पर उतरे.

  • News18India
  • Last Updated: December 14, 2020, 10:30 AM IST
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भारत में विरोध प्रदर्शनों का लंबा इतिहास रहा है. आज़ादी से पहले (Pre-Independence India) देश के क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ बड़े आंदोलनों (Protests Against British) को अंजाम दिया था, जिसमें महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के स्वदेशी और सत्याग्रह जैसे आंदोलनों के साथ ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) और लाल-बाल-पाल जैसे कई नेताओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन तक शामिल रहे. इधर, आज़ादी के बाद सरकार के खिलाफ समय-समय पर बड़े विरोध प्रदर्शन (People's Movement) होते रहे. ऐसे 10 सबसे बड़े आंदोलनों के बारे में जानिए, जिनमें किसी सियासी पार्टी या खेमे का सीधा दखल नहीं था, बल्कि ये प्रेरित जनता के ही आंदोलन कहे जाते रहे.

1. जेपी आंदोलन : 1975
25 जून 1975 की मध्यरा​त्रि जब इंदिरा गांधी सरकार के कार्यकाल के दौरान इमरजेंसी लगा दी गई थी, तब देश भर के छात्र आंदोलित हुए थे. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में खासकर उत्तर भारत में हज़ारों और लाखों की संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे थे. हज़ारों छात्रों को जेल में ठूंसा गया था और बाद में इस आंदोलन से देश के कई अहम नेता स्थापित हुए.

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2. साइलेंट वैली आंदोलन : 1973


केरल के पलक्कड़ ज़िले में स्थित सदाबहार घाटी और जंगल को बचाने के लिए कई एक्टिविस्टों और लोगों ने इकट्ठा होकर आंदोलन शुरू किया था. यह एक बिजली परियोजना के विरोध में किया गया आंदोलन था, जो इतना तेज़ हुआ था कि प्रोजेक्ट को वहां लगाया नहीं जा सका, लेकिन खास बात यह है कि अब भी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ है. यानी न तो आंदोलन पूरी तरह बंद है और न ही प्रोजेक्ट की मंशा.

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इंदिरा गांधी की सरकार को गिराने का श्रेय जेपी आंदोलन को दिया जाता रहा.


3. चिपको आंदोलन : 1973
जंगल के पेड़ों को बचाने के लिए गांधीवादी विचारधारा पर आधारित इस आंदोलन को बहुत तेज़ी से देश भर का समर्थन मिला था. तब उत्तर प्रदेश के उत्तरी हिस्से में सुंदरलाल बहुगुणा और चांदनी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में यह आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें महिलाओं पेड़ों से चिपक जाती थीं और उन्हें काटने नहीं देती थीं.

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4. नामान्तर आंदोलन : 1978
महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िल में स्थित मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी के नाम को बदलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए 16 सालों तक आंदोलन किया गया. साल 1994 में यह आंदोलन तब सफल हुआ जब यूनिवर्सिटी का नाम डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी किया गया. दलितों के इस सालों लंबे आंदोलन में कई जानें गईं, अत्याचार हुए और यहां तक कि कई बार बस्तियां जलाए जाने तक की घटनाएं हुईं.

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5. नर्मदा बचाओ आंदोलन : 1985
आदिवासियों, किसानों, पर्यावरण प्रेमियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एकजुट इकाइयां इस सालों लंबे आंदोलन से जुड़ती चली गईं. समय समय पर इस आंदोलन से कई सेलिब्रिटी जुड़ते रहे. नर्मदा नदी पर कई बांधों के विरोध में इस आंदोलन के तहत कई बार भूख हड़ताल और हज़ारों की संख्या में मार्च होते रहे. इस आंदोलन के चलते ही सरकारों को बांधों का काम रोककर पहले पुनर्वास संबंधी काम करने पड़े थे.

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साल 2011 में अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला था.


6. जन लोकपाल बिल : 2011
5 अप्रैल 2011 को भ्रष्टाचार के विरोध में एक्टिविस्ट अन्ना हज़ारे ने दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की. पूरा देश हज़ारे के साथ जुड़ा और अंजाम यह हुआ कि शरद पवार समेत कुछ और केंद्रीय मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था. टाइम मैगज़ीन ने इस आंदोलन को 2011 की 10 सबसे बड़ी घटनाओं में शुमार किया तो इसे भारत के लोकतंत्र के लिए बेहद अहम मोड़ माना गया.

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7. निर्भया आंदोलन : 2012-13
दिल्ली में एक गैंग रेप की घटना के विरोध में हज़ारो लोग सड़कों पर उतरे और महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाए जाने के साथ ही गैंग रेप के दोषियों को सख्त सज़ा दिलाने के लिए आंदोलन को देश भर से समर्थन मिला. इस आंदोलन के चलते ही कानूनों और व्यवस्थाओं में कई तरह के बदलाव हुए और साथ ही दिल्ली की सरकार को भी बड़ा झटका लगा.

8. एफटीआईआई आंदोलन : 2015
केंद्र सरकार ने जब पुणे स्थित फिल्म एंड टेलिविज़न इंस्टिट्यूट के चेयरमैन के तौर पर भाजपा से जुड़े रहे अभिनेता गजेंद्र चौहान को नियुक्त कर दिया था, तब संस्था के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए थे. इस आंदोलन की खास बात यह थी कि इसे देश भर के छात्रों का समर्थन मिला था और आंदोलन के तहत छात्रों ने 150 दिनों तक भूख हड़ताल की थी. यही नहीं, इस आंदोलन के समर्थन में देश के कई नामचीन लोगों ने प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान वापस किए थे.

9. एंटी सीएए प्रदर्शन : 2019-20
नागरिकता संशोधन कानून पास किए जाने के विरोध में महिलाएं और छात्र हज़ारों की संख्या में आंदोलित हुए. दिल्ली में शाहीन बाग में महीनों तक महिलाएं विरोध प्रदर्शन करती रहीं. सुप्रीम कोर्ट का दखल भी आंदोलनकारियों को हटाने में सक्षम नहीं हो सका था. एनआरसी का मुद्दा भी इस आंदोलन में जुड़ा था और दिल्ली ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में यह आंदोलन फैला था.

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2019-20 में सीएए के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे.


10. किसान आंदोलन : 2020
मौजूदा समय में पिछले कुछ हफ्तों से किसान केंद्र सरकार के नए कृषि सुधान कानूनों के खिलाफ लामबंद हुए हैं. दिल्ली के सीमाई हिस्सों में हज़ारों की तादाद में पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. आंसू गैस और वॉटर कैनन के प्रयोग किसानों पर नाकाम हो चुके हैं और किसान कानून वापस लेने की ज़िद पर अड़े हैं. यह आंदोलन भी फैल रहा है और इसे देश के अन्य राज्यों समेत विदेशों से भी बड़ा समर्थन मिल रहा है.

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इनके अलावा, तमिलनाडु में 2017 में जल्लीकट्टू पारंपरिक खेल पर बैन के खिलाफ 2 लाख लोग सड़कों पर आ गए थे. एक छात्रा के साथ हुए दुर्व्यहार की जांच को लेकर जादवपुर यूनिवर्सिटी में विरोध प्रदर्शन, इमिग्रेशन को लेकर असम में और आरक्षण को लेकर देश के कई हिस्सों में अलग अलग समय पर होते रहे आंदोलन भी याद करने लायक रहे हैं.
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