रिकॉर्ड जीत के साथ पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे पासवान, 10 खास बातें

रामविलास पासवान (फाइल फोटो)
रामविलास पासवान (फाइल फोटो)

74 साल की उम्र में केद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का देहांत हो गया. उन्होंने सियासी जगत में रिकार्ड अंतर की जीत के साथ लोकसभा में प्रवेश किया था, लेकिन समय के साथ सियासी तौर पर वो उभरते गए. उन्हें ये अंदाज था कि कब किस बड़े दल के साथ गठजोड़ करना है

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 9, 2020, 10:58 AM IST
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केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का 74 साल की उम्र में बीमारी के बाद निधन हो गया. वो पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. उन्हें हृदय संबंधी दिक्कत थी. पासवान में राजनीतिक माहौल भांपने की गजब की काबिलियत थी. अपनी इसी काबिलियत के कारण वो सियासी हवा बखूबी पहचान लेते थे. यही वजह थी कि उन्होंने 06 प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया. लंबे समय तक केंद्र में मंत्री रहे.



रामविलास पासवान ने पिछले दिनों अपने बेटे चिराग पासवान को अपनी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी का अध्यक्ष बना दिया था. बिहार के चुनावों में चिराग ही पार्टी की कमान संभाले हुए हैं. अस्वस्थता के कारण राम विलास काफी समय से सार्वजनिक जीवन में लोगों से रू-ब-रू नहीं हो पा रहे थे. उनके बार में दस खास बातें-
रामविलास पासवान के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1960 के दशक में बिहार विधानसभा के सदस्य के तौर पर हुई और आपातकाल के बाद 1977 के लोकसभा चुनावों से वह तब सुर्खियों में आए, जब उन्होंने हाजीपुर सीट पर चार लाख मतों के रिकार्ड अंतर से जीत हासिल की.
1989 में जीत के बाद वह वीपी सिंह की कैबिनेट में पहली बार शामिल किए गए. उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया. एक दशक के भीतर ही वह एचडी देवगौडा और आईके गुजराल की सरकारों में रेल मंत्री बने.
1990 के दशक में जिस ‘जनता दल’ धड़े से पासवान जुड़े थे, उसने भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का साथ दिया. वह संचार मंत्री बनाए गए. बाद में अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में वह कोयला मंत्री बने.
बाबू जगजीवन राम के बाद बिहार में दलित नेता के तौर पर पहचान बनाने के लिए उन्होंने आगे चलकर अपनी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की स्थापना की. वह 2002 में गुजरात दंगे के बाद विरोध में राजग से बाहर निकल गए. कांग्रेस नीत संप्रग की ओर गए. दो साल बाद ही सत्ता में संप्रग के आने पर वह मनमोहन सिंह की सरकार में रसायन एवं उर्वरक मंत्री नियुक्त किए गए.
संप्रग-दो के कार्यकाल में कांग्रेस के साथ उनके रिश्तों में तब दूरी आ गयी. जब 2009 के लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की हार के बाद उन्हें मंत्री पद नहीं मिला. पासवान अपने गढ़ हाजीपुर में ही हार गए थे.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जदयू के अपने पाले में नहीं रहने पर पासवान का खुले दिल से स्वागत किया और बिहार में उन्हें लड़ने के लिए सात सीटें दी. लोजपा छह सीटों पर जीत गयी. पासवान, उनके बेटे चिराग और भाई रामचंद्र को भी जीत मिली.
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में खाद्य, जनवितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री के रूप में पासवान ने सरकार का तब भी खुलकर साथ दिया, जब उसे सामाजिक मुद्दों पर आलोचना का सामना करना पड़ा. जन वितरण प्रणाली में सुधार लाने के अलावा दाल और चीनी क्षेत्र में संकट का भी प्रभावी तरीके से उन्होंने समाधान किया.
वह हालिया लोकसभा चुनाव नहीं लड़े थे. उनके छोटे भाई और बिहार के मंत्री पशुपति कुमार पारस हाजीपुर से जीते. हालांकि वो इसके बाद राज्यसभा के जरिए संसद में पहुंचे. उन्हें सियासी मौसम का एक्सपर्ट भी माना जाता रहा है.
पासवान बिहार के खगरिया जिले के शाहरबन्नी गांव से हैं. वह एक अनुसूचित जाति परिवार के लिए पैदा हुए थे. उन्होंने दो शादियां की. 1960 के दशक में राजकुमारी देवी से शादी की. 2014 में उन्होंने खुलासा किया कि लोकसभा नामांकन पत्रों को चुनौती देने के बाद उन्होंने 1981 में उन्हें तलाक दे दिया था. उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से उषा और आशा दो बेटियां हैं.
1983 में, अमृतसर से एक एयरहोस्टेस और पंजाबी हिंदू रीना शर्मा से विवाह किया. उससे उन्हें एक बेटा और बेटी है. उनके बेटे चिराग पासवान एक अभिनेता से राजनेता बने हैं.
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