पुण्यतिथि : इस आर्मी चीफ ने मौत से चुकाई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत

पुण्यतिथि : इस आर्मी चीफ ने मौत से चुकाई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत
न्यूज़18 ग्राफिक्स

पुण्यतिथि 10 अगस्त 1986 - 1984 के सिख दंगे (Sikh Riots) पंजाब की याददाश्त में ज़ख्मों की तरह दर्ज हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या भी उसी ऑपरेशन ब्लू स्टार का ही एक बदला थी, जिसे भारतीय सेना (Indian Army) के सबसे सम्मानित अफसरों में शुमार जनरल वैद्य ने न केवल प्लान किया था बल्कि अमली जामा भी पहनाया था.

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  • Last Updated: August 10, 2020, 1:58 PM IST
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"पूर्व जनरल अरुण श्रीधर वैद्य को चूंकि धमकियां मिल चुकी थीं इसलिए हमने सावधानियां बरती थीं, लेकिन हमने जो कदम उठाए, आखिरकार वो नाकाफी ही साबित हुए." - जेबी मिसर, पूर्व पुलिस कमिश्नर, पुणे

ऑपरेशन ब्लू स्टार. 3 से 8 जून 1984 के बीच पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना ने कथित आतंकी जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उसके साथियों के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन को अंजाम दिया था. असल में, उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अमृत​सर स्थित हरमंदिर साहिब परिसर पर पूरा नियंत्रण चाहती थीं, जहां 1980 से ही भिंडरांवाले ने अपना हेडक्वार्टर बना लिया था.

भिंडरांवाले के कब्ज़े से हरमिंदर साहिब परिसर को छुड़ाने के लिए गांधी ने पहले सेना के लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा से गोल्डन टेंपल को खाली कराने के बारे में बात की, लेकिन सिन्हा ने गांधी को सलाह दी कि सिखों के धार्मिक स्थान पर हिंसा करना ठीक नहीं होगा. तब, गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल अरुण श्रीधर वैद्य को इस काम की कमान सौंपी. ले.ज. सुंदरजी के साथ मिलकर वैद्य ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना बनाई और उसे अंजाम दिया.



सिखों के विश्व प्रसिद्ध मंदिर यानी गोल्डन टेंपल के अंदर पांच-छह दिनों तक गोलीबारी चलती रही और आखिरकार भिंडरांवाले की मौत हुई. उसके कई साथियों को मंदिर से ज़िंदा भी पकड़ा गया और ऑपरेशन कामयाब हुआ. इस जीत का सेहरा वैद्य के सिर बंधा, लेकिन इसकी कीमत चुकानी बाकी थी. भिंडरांवाले के समर्थकों के निशाने पर राजनीति और सेना के जो लोग थे, उनमें वैद्य का नाम भी शुमार था. वैद्य को जान के खतरे का अंदाज़ा भी था.
दो युद्धों में अपनी भूमिका निभाने के बाद मैं खतरे से भाग नहीं सकता. अगर कोई ​गोली ही मेरी नियति है, तो जिस पर मेरा नाम लिखा है, वो गोली मुझ तक आएगी ही.


हालांकि वैद्य का नाम लिखी गोलियां आने में कुछ वक्त लगा. 1984 में ब्लू स्टार की कामयाबी के बाद वैद्य को सम्मान मिलने का सिलसिला जारी रहा और उनकी गिनती सेना के सबसे सम्मानित अफसरों व सेना प्रमुखों में होने लगी. जनवरी 1986 में रिटायरमेंट के बाद पुणे में बनवाए बंगले में वैद्य सपरिवार शिफ्ट हो गए. इसके छह महीने बाद वो तीन गोलियां उन तक पहुंची, जिन पर उनका नाम लिखा था.

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पूर्व सेना प्रमुख जनरल अरुण श्रीधर वैद्य.


10 अगस्त 1986 को राजेंद्रसिंहजी मार्ग स्थित बाज़ार से अपनी कार में वैद्य घर लौट रहे थे, तभी मोटरसाइकिलों और स्कूटरों पर कुछ हथियारबंद हमलावरों ने कार के आसपास घेरा बनाकर फायरिंग की. दो गोलियां वैद्य के सिर में लगीं और एक कंधे पर. अस्पताल पहुंचने पर उन्हें मृत घोषित किया गया. इस हमले में वैद्य की पत्नी भानुमती और उनके सुरक्षा गार्ड को भी गोलियां लगीं.

इस हत्याकांड से सिर्फ मुंबई और पूना में ही सिखों के खिलाफ हिंसा नहीं भड़की बल्कि देश के कई हिस्सों में तनाव की स्थिति बनी. वैद्य को सेना के सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई जिसमें आला अफसरान के साथ कई दिग्गज नेता शामिल थे. वैद्य को मरणोपरांत पद्मविभूषण से भी नवाज़ा गया. वहीं, खालिस्तान कमांडो फोर्स ने ज़िम्मेदारी लेकर कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार लीड करने की वजह से वैद्य पर हमला किया गया.

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इस हमले की यादें कई बार ताज़ा होती रहीं. हमले के दोषी हरजिंदर सिंह उर्फ जिंदा और सुखदेव सिंह उर्फ सुक्खा को 1989 में मौत की सज़ा सुनाई गई और 1992 में फांसी दी गई. इसके कई साल बाद एक पंजाबी फिल्म बनी 'जिंदा और सुक्खा', जो विवादों में घिर गई और 2015 में भारत के बाहर ही रिलीज़ हो सकी. वैद्य अपनी सोच, समझ, इरादों और पराक्रम को लेकर बेहद स्पष्ट रहे. देश के 13वें आर्मी प्रमुख वैद्य के बारे में कुछ तथ्यों से पहले उनके इन शब्दों पर गौर फरमाएं :

दुश्मन चाहे विदेशी हो या घर के भीतर, मुझे उसके खिलाफ हथियार उठाने में कोई फर्क महसूस नहीं होता. जो अपने बंधु नागरिकों, अपने ही संविधान और अपनी ही वैधानिक सरकार के खिलाफ हथियार उठाता है, उसे दुश्मन मानने में कोई संकोच नहीं और उसे सख्त सज़ा मिलनी ही चाहिए.


* वैद्य को 1945 में आर्मर्ड कोर में कमीशन किया गया था और उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध में भाग लिया था.
* 1965 के भारत पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त देने के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था.
* 1971 में फिर भारत पाक युद्ध में ​ब्रिगेडियर के तौर पर शरीक रहे वैद्य ने जिस साहस और कौशल का परिचय दिया, उसके लिए उन्हें दूसरी बार महावीर चक्र मिला.
* 13 जुलाई 1983 को वैद्य 13वें आर्मी प्रमुख बने. रिटायर होने से पहले उन्होंने सेना में 40 साल से ज़्यादा समय की सेवा दी.

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खालिस्तान समर्थक आंतकियों के खिलाफ 1984 में स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भारी हिंसा हुई थी.


यह भी एक उल्लेखनीय बात है कि वैद्य की हत्या के दोषियों जिंदा और सुक्खा ने अदालत में कबूल किया था कि वैद्य को गोलियां उन्होंने मारीं लेकिन खुद को निर्दोष भी कहा था. दोनों का तर्क था कि 'वैद्य ने ऐसा गुनाह किया था, जिसकी सज़ा सिर्फ मौत ही थी.'
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