भारत ने जिसे कभी नहीं माना, क्या है चीन की वो '1959 LAC थ्योरी?

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चीन जब सीमा विवाद (Border Dispute) में फंसता है तो पुराना राग अलापने लगता है. चीन ने यही पैंतरा डोकलाम विवाद (Doklam Issue) के समय भी अपनाया था. चीन फिर वही 1959 की एलएसी (Line of Actual Control) का कार्ड खेल रहा है. हर बार की तरह भारत विरोध में है.

  • News18India
  • Last Updated: September 30, 2020, 12:08 PM IST
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61 साल पहले चीनी प्रमुख (Chinese Premier) झाउ एनलाई (Zhou Enlai) ने भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) को चिट्ठी में लिखकर जिस एलएसी (LAC) का ज़िक्र किया था, चीन ने अब भी उसे ही भारत और चीन के बीच मान्य सीमा कहा है. यह वही बरसों पुराना राग है, जो चीन बार बार अलापता रहा है और भारत हर बार विरोध करता रहा है. लद्दाख (Ladakh) में पिछले 4 महीनों से चल रहे तनाव (Border Tension) के बाद शांति बहाली के लिए भारत और चीन के बीच चल रही वार्ताओं (Sino-Indian Talks) में फिर एक बार एलएसी की 1959 वाली स्थिति केंद्र में आ गई है.

चीन अपने पूर्व प्रधानमंत्री झाउ एनलाई के 1950 के दशक के दौरान जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्रों को आधार बनाकर विवाद खड़ा करता रहा है. 1962 के युद्ध के बाद चीन का दावा रहा कि वह 1959 में एलएसी से 20 किमी पीछे चला गया था. 2017 में डोकलाम विवाद के समय भी चीन ने भारत के सामने यही दलील रखते हुए 1959 की एलएसी स्थिति बहाल रखे जाने पर ज़ोर दिया था.

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चीन ने फिर जिसका हवाला दिया है और भारत ने जिसे मानने से फिर इनकार किया है, 1959 में एनलाई के पत्र में लिखित एलएसी की वो स्थिति क्या रही थी? इसके बारे में जानने से पहले आप ये जानिए कि इस बारे में नेहरू और एनलाई के बीच किस तरह का पत्र व्यवहार हुआ था.
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भारत चीन सीमा से जुड़ा ऐतिहासिक नक्शा.


नेहरू ने नकारा था एनलाई का दावा
7 नवंबर 1959 के पत्र में एनलाई ने नेहरू को लिखा था कि LAC उसे ही माना जाए जो पूर्व में मैक्मैहॉन लाइन है और पश्चिम में दोनों देश जहां वास्तविक नियंत्रण की प्रैक्टिस कर रहे हैं. 1962 में युद्ध के दौरान नेहरू ने इस दावे को खारिज करते हुए फिर कहा था कि चीन के दावों के हिसाब से LAC को मान लेना और इस हिसाब से 20 किलोमीटर पीछे हटना निरर्थक है.

नेहरू ने साफ कहा था कि चीन ने आक्रामकता और हिंसा के दम पर LAC को परिभाषित करने की कोशिश की है. पहले आप 40 से 60 किलोमीटर तक सीमा में घुस आएं और फिर कहें कि दोनों देश 20 किलोमीटर पीछे हटेंगे और उसे LAC माना जाएगा, तो यह कोई तार्किक बात नहीं बल्कि बेवकूफ बनाने की साजिश है. इसके बावजूद एनलाई 7 नवंबर 1959 को सेनाओं की स्थिति के मुताबिक ही LAC को मानने की बात दोहराते रहे.

एनलाई का दिल्ली दौरा
लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल शब्द का पहली बार इस्तेमाल करने वाले एनलाई 1960 में नई दिल्ली के ऐतिहासिक दौरे पर आए थे. उन्होंने यहां सीमा पर शांति की बात कहते हुए छह सूत्री प्रस्ताव रखा था, जिसमें 1959 के पत्र की बात दोहराई थी और सीमा को उसी स्थिति में मान्यता देने की बात कही थी. फिर 1962 में जब नेहरू ने एनलाई के इस दावे को मानने से इनकार किया तो एनलाई ने जवाब दिया था -

भारत और चीन की सीमा पर 7 नवंबर 1959 को जो स्थिति थी, वही LAC है. पूर्व में मैक्मैहॉन लाइन और पश्चिम व मध्य में वह पारंपरिक सीमा रेखा LAC मानी जाएगी, जिसे चीन सीमा के रूप में मान्यता देता है.


इस बयान का सीधा मतलब यही था कि चीन अपनी मनमानी पर तब भी उतारू था. जैसा कि विशेषज्ञ चीन की विस्तारवादी सोच को लेकर कहते रहे हैं कि चीन पहले किसी सीमा पर दावा प्रस्तुत करता है, फिर बार बार कई अंतर्राष्ट्रीय एवं आपसी मंचों पर उसे दोहराता रहता है. इससे वह सीमा या भूभाग विवादित होता दिखने लगता है और फिर विवाद सुलझाने के लिए चीन प्रस्ताव और समझौते के लिए बातचीत करता है. इस तरह वह सीमाओं पर कब्ज़ा करता रहा है.

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चीन के ताज़ा बयान का मतलब?
भारत के साथ सीमा पर तनाव की स्थिति में उलझे चीन ने फिर वही 1959 वाली स्थिति का बयान दिया है, जिसे विशेषज्ञ साज़िश करार दे रहे हैं. भूटान में राजनयिक रह चुके गौतम बंबावले के हवाले से द प्रिंट की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह का स्टैंड लेकर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भारतीय सीमा का बड़ा हिस्सा हथियाकर भारतीय ज़मीन पर अपने सैन्य मोर्चे बनाने का मंसूबा रखती है.

भारत और चीन के बीच LAC को लेकर रहे पूरे विवाद को आप इस लिंक पर विस्तार से पढ़ सकते हैं.

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LAC पर भारत का रुख क्या रहा?
साल 1991 में जब चीनी प्रधानमंत्री ली ​पेंग भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के साथ एलएसी को लेकर बातचीत की थी. इसके बाद 1993 में जब राव ने बीजिंग यात्रा की तब भारत ने औपचारिक तौर पर एलएसी के कॉंसेप्ट को मंज़ूरी देते हुए सीमा पर शांति बरकरार रखने संबंधी एग्रीमेंट किया.

यह ध्यान देने की बात है कि इस समय भी यही तय हुआ कि 1962 की स्थिति ही एलएसी को तय कर रही थी, न कि 1959 की. तब इस बारे में जिन बिंदुओं पर विवाद थे, उन्हें लेकर दोनों देश एक साझा वर्किंग ग्रुप के माध्यम से सीमा विवाद को हल करने के पक्ष में आए थे. लेकिन चीन फिर वादाखिलाफी करता हुआ साफ नज़र आ रहा है. लेकिन भारत लगातार चीन की इस 1959 थ्योरी को नकारता रहा है और इस बार भी पुरज़ोर ढंग से चीन के स्टैंड के विरोध में है.
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