आसान भाषा में जानिए क्या है हमारे संविधान का आर्टिकल 15

आसान भाषा में जानिए क्या है हमारे संविधान का आर्टिकल 15
आर्टिकल 15 फिल्म पोस्टर.

सोशल मैसेज के मकसद से बनाई गई आयुष्मान खुराना स्टारर फिल्म आर्टिकल 15 रिलीज़ हुई है. मूवी रिव्यू या फिल्म देखने से पहले आपके लिए ये जानना फायदेमंद और दिलचस्प होगा कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 क्या है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 28, 2019, 12:13 PM IST
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भारत के संविधान में समानता का अधिकार हर देशवासी का मूलभूत अधिकार है. इस अधिकार को लेकर संविधान के तीसरे भाग में चर्चा की गई है जिसमें आर्टिकल 15 का उल्लेख है. मोटे तौर पर देखा जाए तो यह आर्टिकल देश के हर नागरिक के साथ समान व्यवहार किए जाने की वकालत करता है और व्यवस्था देता है, लेकिन दूसरी तरफ, यही आर्टिकल तंत्र को यह ताकत भी देता है कि किस तरह से आरक्षण या विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं.

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आज यानी शुक्रवार को बॉलीवुड​ फिल्म आर्टिकल 15 रिलीज़ हो रही है और इस फिल्म की कहानी बदायूं गैंग रेप केस को लेकर बुनी गई है, जिसमें समानता के अधिकार का मुद्दा उठाया गया है. अनुभव सिन्हा निर्देशित और आयुष्मान खुराना अभिनीत इस फिल्म को आप देखने जाएं, या इसके रिव्यू पढ़ें, इससे पहले आसान भाषा में जान लीजिए कि आर्टिकल 15 अस्ल में है क्या.



ये हैं आर्टिकल 15 के प्रावधान
भारतीय संविधान के आर्टिकल 15 (1) और (2) में व्यवस्था है कि देश के किसी भी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा. ये दोनों अनुच्छेद व्यवस्था बनाते हैं कि दुकानों, होटलों, रेस्तरां, मनोरंजन स्थलों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर देश के नागरिक भेदभाव के शिकार न हों. जनता के उपयोग के लिए घोषित या राज्य द्वारा फंड किए गए किसी भी स्थान पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.

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आर्टिकल 15 (3) में संविधान सुरक्षा के लिहाज़ से भेदभाव के लिए गुंजाइश देता है. उदाहरण के तौर पर, इस अनुच्छेद में उल्लेख है कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के मद्देनज़र राज्य विशेष प्रावधान कर सकता है.

आर्टिकल 15 (4) राज्य को यह गुंजाइश और अधिकार देता है कि अनुसूचित जाति या जनजाति जैसे समाज के पिछड़े तबके के हित या उत्थान के लिए विशेष व्यवस्थाएं या प्रावधान किए जा सकते हैं.

आर्टिकल 15 (5) में देश में आरक्षण को लेकर एक विशेष व्यवस्था दी गई है, जिसके तहत शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन को लेकर आरक्षण जायज़ ठहराया गया है. सरकार की मदद से चलने वाले या गैरसरकारी शैक्षणिक संस्थान दोनों इस दायरे में आते हैं. इस व्यवस्था से केवल अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक संस्थान जैसे मदरसे ही बाहर हैं.

कुल मिलाकर संविधान के इस अनुच्छेद में समानता और आरक्षण की एक मिली जुली व्यवस्था बनाई गई है, जिसके आधार पर देश के कायदे कानून बनते हैं.

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