अपने हों या पराये, कैसे सबका प्यार-सबका साथ पाते रहे अरुण जेटली

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 24, 2019, 1:34 PM IST
अपने हों या पराये, कैसे सबका प्यार-सबका साथ पाते रहे अरुण जेटली
न्यूज़18 क्रिएटिव.

चाहे अटल बिहारी सरकार (Vajpayee Govt) रही हो या मोदी सरकार (Modi Govt), जेटली का सम्मान और कद हमेशा खास रहा. भाजपा हो या दूसरी विरोधी पार्टियां, आड़े वक्त सबने जेटली (Arun Jaitley) को समर्थन देने में कसर नहीं छोड़ी. जानें जेटली का ये कैसा करिश्मा था.

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जब पांच साल पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) में इस बात को लेकर बहस जारी थी कि चुनावों में प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में किसका चेहरा चुना जाए, लालकृष्ण आडवाणी या नरेंद्र मोदी? तब आडवाणी और मोदी दोनों जिस व्यक्ति की राय का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, कहा जाता है वो अरुण जेटली (Arun Jaitley) थे. जेटली ने मोदी के पक्ष में राय ज़ाहिर की और आडवाणी के साथ भी उनके संबंध हमेशा अच्छे बने रहे. कभी अटल बिहारी वाजपेयी के खासों में गिने गए जेटली, पहली मोदी सरकार में बेहद ताकतवर बने रहे. यही नहीं, समय समय पर उन्हें व्यापक समर्थन मिलता रहा. जानिए कब कब और कैसे जेटली सबके चहेते बने रहे.

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अगर आपसे पूछा जाए कि पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री व भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया और जदयू नेता शरद यादव के बीच में कौन सा नाम है, जो कॉमन है. आप याददाश्त पर ज़ोर डालेंगे तो याद आएगा कि अरुण जेटली जब वकालत करते थे, तो इन तीनों के लिए वकील रह चुके थे. इसी तरह, आप याद करेंगे तो ये भी याद आएगा कि पेप्सी और कोक की गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच जेटली ही पुल बने थे. आइए, टटोलें कि आखिर जेटली सबसे अच्छे संबंध बनाए रखने में कैसे कामयाब रहे.

मोदी सरकार नहीं जेटली सरकार!

राजनीतिक गलियारों में 2014 के बाद ये चर्चा आम रही थी कि मोदी पीएम ज़रूर हैं, लेकिन असल में, सरकार जेटली चला रहे थे. वाजपेयी सरकार में जूनियर होने के बावजूद एक साल के भीतर कैबिनेट में जगह बनाने में सफल रहे जेटली पहली मोदी सरकार में रक्षा और वित्त दोनों मंत्रालय संभाल रहे थे. उस समय एक सर्वे में ये दावा भी किया गया था कि मोदी के बाद जेटली ही देश के दूसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति थे. इन तमाम कारणों से उस वक्त जेटली सरकार जुमला सियासी हलकों में बड़ा चर्चित था.

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चैप्टर मध्य प्रदेश
कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह लगातार दस साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे और उन्हें शिकस्त देने के लिए उमा भारती की लहर चली. कम लोग जानते हैं कि भारती को मप्र का सीएम बनाने के पीछे सबसे बड़े मददगार जेटली ही रहे थे. इसके बाद भारती की सीएम पद से विदाई हुई और एक अस्थिर दौर के बाद शिवराज सिंह चौहान 10 साल से ज़्यादा समय तक मप्र के सीएम रहे. चौहान के साथ भी जेटली की केमिस्ट्री बेहतरीन बनी रही.

दो नावों में साथ साथ
जेटली के बारे में ऐसा इसलिए कहा जाता रहा क्योंकि उन्होंने दो विरोधी विचारधाराओं के साथ गज़ब का सामंजस्य बना रखा था. इमरजेंसी के दौर के बाद वो भाजपा से जुड़े थे और उनकी सियासी शुरूआत अखिल ​भारतीय विद्यार्थी परिषद के दायित्व के साथ हुई थी. लेकिन, दूसरी पार्टियों और उनके नेताओं के साथ भी जेटली के संबंध मधुर रहे. इसी का नतीजा था कि जनता दल सरकार में वीपी सिंह ने जेटली को एएसजी यानी एडिशनल सॉलिसिटर जनरल का दायित्व सौंपा था.

विकिलीक्स बवाल के बाद भी रहे महफूज़
जेटली का नाम विकिलीक्स विवादों में तब आया था जब एक राजनयिक के बयान के आधार पर कहा गया था कि जेटली ने भाजपा के 'हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद' को अवसरवादी करार दिया था. इस बयान ने ज़रा देर में ही विवाद का रूप ले लिया था और कई लोगों ने तात्कालिक टिप्पणी कर जेटली को कठघरे में खड़ा किया था. यहां तक कि संघ ने भी जेटली पर आंखें तरेरी थीं. इसके बावजूद जेटली का भाजपा से कोई बाल बांका नहीं कर सका. कुछ ही समय में जेटली के साथ ही भाजपा खड़ी दिखाई दी और कहा गया कि जेटली के नाम से जारी किया गया यह बयान मनगढ़ंत था.

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जब दिग्विजय ने किया बचाव
ये बात बहुत पुरानी नहीं ​है, जब अरविंद केजरीवाल ने अपना सियासी सफर शुरू करने के दौरान जेटली पर हमला बोला था. आम आदमी पार्टी नेता ने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में रहते हुए जेटली पर अनियमितताओं के आरोप लगाए थे. लेकिन, उस वक्त केजरीवाल को भी जेटली के कद का अंदाज़ा नहीं था, जो जल्द ही हुआ. पहले तो कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने जेटली पर उंगली उठाई लेकिन बाद में, उन्होंने कहा कि केजरीवाल अगर सबूत दे सकते हैं तो दें, वरना आरोप लगाने से बचें. इसके साथ ही, इस मामले में वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर और विराट कोहली जैसे दिग्गज क्रिकेटर भी जेटली के बचाव में आए थे और आखिरकार मोदी ने भी जेटली का पूरा साथ दिया था.

तो क्या था सबके साथ का राज़
जेटली उन गिने चुने नेताओं में शुमार रहे हैं, जिन्हें समर्थकों और विरोधियों का बराबर साथ या समर्थन मिलता रहा. जिन समाचार चैनलों को भाजपा का विरोधी भी माना जाता रहा, उनमें से भी कई ने मौके पर जेटली के समर्थन में कवरेज दिया. सियासी हलकों में कहा जाता था कि सोनिया गांधी का मीडिया मैनेजमेंट बेहद ज़बरदस्त था. मीडिया ने शायद ही कभी सोनिया गांधी के खिलाफ कोई मुहिम छेड़ी हो. लेकिन, अगर आप गौर करें तो यही बात जेटली के लिए भी कही जा सकती है.

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एक बार अरुण शौरी ने मज़ाक में कहा था 'जेटली सिर्फ 6 लोगों के जननेता हैं'. यह कटाक्ष चुनिंदा मीडिया समूह मालिकों के साथ जेटली के संबंधों को लेकर था. लेकिन सिर्फ मीडिया ही नहीं, बल्कि जीवन में व्यवहार के बल पर जेटली ने लोगों के साथ मज़बूत संबंध बनाए थे. वो भी इतने मज़बूत कि कठिन समय पर हमेशा ये संबंध जेटली के काम आए. केजरीवाल के आरोपों के बाद ट्विटर पर जब उनके खिलाफ हैशटैग भी चले तो किसी अंजाम तक नहीं पहुंच सके और उनके समर्थन में छिड़ी सोशल मीडिया मुहिम भारी पड़ी.

जेटली ने अपने व्यक्तित्व के बूते लोगों के साथ जिस तरह का नेटवर्क बनाया था, उसकी बदौलत उन्हें हमेशा सबका साथ, सबका प्यार और सबका विश्वास हासिल हुआ था. अब उन्हें अच्छा नेटवर्कर कहा जाए या मैनेजमेंट मास्टर, यह उनके व्यवहार का करिश्मा ही था कि वह सबके चहेते बने रहे.

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First published: August 24, 2019, 1:34 PM IST
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