भारत के दो पड़ोसी चीन की गुंडागर्दी से खफा, सीमाओं पर कैसी चालें चल रहा है चीन?

भारत के दो पड़ोसी चीन की गुंडागर्दी से खफा, सीमाओं पर कैसी चालें चल रहा है चीन?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. फाइल फोटो.

जब ऐसे जुमले गूंजते हैं कि 'म्यांमार अब चीन की जेब में नहीं हैं, और नहीं रहेगा', तो व्यापक तौर पर अर्थ समझे जाने चाहिए. Pakistan जिस तरह भारत में Terrorism फैला रहा है, उसी तरह म्यांमार में चीन क्यों और कैसे इस तरह के हथकंडे अपना रहा है? ये भी जानें कि भूटान के साथ भी चीन के Border Disputes क्यों तनावग्रस्त हैं.

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भारत के साथ सीमा विवाद (Indo-China Border Dispute) में उलझकर लद्दाख में LAC पर तनाव (Border Tension) पैदा करने वाले चीन की गुंडागर्दी के और सबूत भी सामने आ रहे हैं. भारत के दो सहयोगी पड़ोसी देशों ने भी चीन के साथ सीमाओं पर गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं. म्यांमार और भूटान एक तरफ भारत के पुराने साथी देश (Indian Neighbors) रहे हैं, तो चीन यहां भी विस्तारवाद (Expansionism) की महत्वाकांक्षा दर्शाने से नहीं चू​क रहा है और छोटे व कमज़ोर देशों के सामने दबंगई दिखाने में लगा है.

पहले म्यांमार की बात करें, तो हाल में म्यांमार ने रूसी मीडिया के सामने आधिकारिक तौर पर चीन का नाम लिये बगैर कहा कि 'एक विदेशी ताकत' उसकी ज़मीन पर विद्रोह और आतंक भड़काने के लिए साज़िश कर रही है. अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार इस ताकत का अर्थ चीन ही मान रहे हैं. चीन पर म्यांमार ने किस तरह के आरोप लगाए हैं? साथ ही जानें कि इससे भारत का क्या लेना देना है और भूटान भी क्यों चीन के रवैये से परेशान है.

'आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है चीन'
म्यांमार सेना (Tatmadaw) के प्रवक्ता के हवाले से खबरों में कहा गया है कि म्यांमार में आतंकवादी संगठन घोषित अरकान आर्मी के पीछे कथित तौर पर चीन का हाथ है. प्रवक्ता ने दावा किया कि 2019 में रखाइन राज्य में जो माइन हमले हुए, उनमें अरकान आर्मी ने काफी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया. वहीं, म्यांमार की शांति व सुरक्षा संस्था ने खुलासा किया कि आतंकी संगठन के ज़्यादातर ​ह​थियार 'मेड इन चाइना' पाए गए.
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म्यांमार में आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप चीन पर हैं. फाइल फोटो.


हथियार चीनी हैं और महंगे भी
म्यांमार मिलिट्री ने हाल में, यह भी खुलासा किया कि नवंबर 2019 में Ta’ang National Liberation Army (TNLA) नामक विद्रोही संगठन से बरामद ज़्यादातर ​हथियार भी चीन निर्मित पाए गए थे. सेना के मुताबिक इनकी कीमतें भी बहुत ज़्यादा थीं जिससे साफ है कि TNLA को चीन हथियार मुहैया करवा रहा है. इन हथियारों में एंटी एयरक्राफ्ट लॉंचर तक शामिल थे. म्यांमार को शक है कि चीन के युन्नान राज्य के साथ इन संगठनों के आर्थिक संबंध हैं और भ्रष्टाचार या ब्लैक मार्केट के ज़रिये हथियार पहुंच रहे हैं.

आखिर क्या है चीन की चाल?
म्यांमार के विद्रोही संगठनों को उकसाने और पनपने देने के पीछे चीन की रणनीति अस्ल में, बेल्ट और रोड प्रोजेक्टों को लेकर मानी जा रही है. चीन म्यांमार के साथ इकोनॉमिक कॉरिडोर को मज़बूत करना चाहता है. इससे चीन को बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में एक तरह का वर्चस्व मिल सकता है, जो भारत पर दबदबा बनाने में कारगर साबित होगा. दूसरी तरफ, आतंकियों को मदद कर चीन म्यांमार सरकार पर दबाव बनाने के साथ ही, म्यांमार की ज़मीन से दूसरे देशों को दूर रखना चाह रहा है.

म्यांमार के अंदरूनी मामलों में चीन देता रहा दखल
ताज़ा आरोपों से पहले भी म्यांमार ने चीन पर उसके अंदरूनी मामलात में दखलंदाज़ी करने के आरोप लगाए हैं. 2016-2017 में रोहिंग्या मुसलमानों के संकट के समय म्यांमार की छवि दुनिया भर में खराब हुई थी. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो तब म्यांमार को चीन पर काफी निर्भर होना पड़ा था. हालांकि इससे पहले भी 1990 के दशक तक भी चीन का दबाव म्यांमार पर काफी बढ़ चुका था.

एक तरफ, चीन न केवल म्यांमार में आंतक भड़काने में लगा है, दूसरी तरफ चीन खुद को शरीफ साबित करने के लिए म्यांमार और विद्रोही संगठनों के बीच मध्यस्थता कराने का नाटक भी करता है.

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एशिया के कई देशों के साथ चीन सीमा विवादों में उलझा हुआ है. तस्वीर (ChinaIQ) ब्लॉग से साभार.


डर के आधार पर बने संबंध कितने मुनासिब?
म्यांमार और चीन के बीच संबंधों का आधार ही म्यांमार का डर रहा है. 1950 के दशक के बाद से ही म्यांमार को डर था कि चीन उसकी ज़मीनों पर अतिक्रमण या कब्ज़ा न करे और उस पर हमले न करे इसलिए म्यांमार ने चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों के लिए Pauk-Phaw कॉंसेप्ट दिया, जिसका मतलब था ​कि दोनों देश 'दो बदन एक जान' की तरह रहें. ओआरएफ की स्टडी की मानें तो चीन ने आतंकी संगठनों को पोसने की नीति 1970 के दशक में भी जारी रखी.

इसी अध्ययन में कहा गया है कि 2011 में जब म्यांमार में लोकतांत्रिक ढांचे के लिए राजनीतिक सुधार हुए, तब भी म्यांमार और चीन के संबंधों में काफी कठिन समय आया. हालांकि चीन ने म्यांमार के लोकतंत्रीकरण का स्वागत करने का दिखावा किया लेकिन अमेरिका से म्यांमार की बढ़ती नज़दीकी से चीन के तेवर बदले.

चीन म्यांमार के झमेले में भारत का कनेक्शन
जिस तरह पाकिस्तान को भारत की ज़मीन पर आतंकवाद फैलाने का दोषी माना जाता है, उसी तरह चीन को म्यांमार का. खबरों की मानें तो म्यांमार की सीमाओं पर चीन 23000 की बड़ी आर्मी को हथियार, ट्रेनिंग और वित्तीय सहायता दे रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि म्यांमार की सीमाओं पर चीन की मदद से जो आतंक फलता फूलता है, वह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में ULFA और NSCN(K) उग्रवादी संगठनों का मददगार साबित होता है.

भारत के एक और पड़ोसी की सीमा पर चीन की नज़र
अब बात भूटान की. ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी की हालिया मीटिंग में चीन ने पूर्वी भूटान के ट्रैशियांग ज़िले में एक वन्यजीव अभयारण्य बनाए जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह ज़मीन चीन और भूटान के बीच विवादित सीमा पर है. वहीं, भूटान ने चीन के इस बयान को खारिज करते हुए कहा कि चीन के साथ जिन जगहों को लेकर बात चल रही है, यह अभयारण्य उनमें से किसी स्थान पर नहीं बन रहा और यह भूटान का पूरी तरह अंदरूनी और राष्ट्रीय मामला है.

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भूटान ने चीनी दावे को नकारते हुए कहा कि सैंक्चुरी बनाना उसका अंदरूनी मामला है.


यहां भी चीन के विस्तारवाद की चाल
चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि चीन और भूटान के बीच सीमाएं कभी परिभाषित नहीं रहीं लेकिन नया विवाद कोई नहीं है. एचटी द्वारा जारी चीन के इस बयान में यह भी कहा गया है कि भूटान और चीन के बीच सीमा विवाद के बीच किसी तीसरे को नहीं आना चाहिए... यह साफ तौर पर भारत को चेतावनी है.

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आपको यह भी जानना चाहिए कि चीन कैसे 'वूल्फ वॉरियर' जैसी विदेश नीति अपना रहा है. विस्तारवाद की महत्वाकांक्षा रखने वाले चीन ने न केवल भारत के साथ सीमाओं पर तनाव बना रखा है बल्कि हांगकांग, ताईवान, वियतनाम, जापान, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, ऑस्ट्रेलिया और अब भूटान के साथ भी वह सीमा विवादों को लेकर तनाव पैदा कर रहा है.
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