क्या है भारत चीन के बीच सीमा विवाद? LAC से जुड़े अहम सवालों के जवाब

क्या है भारत चीन के बीच सीमा विवाद? LAC से जुड़े अहम सवालों के जवाब
पूर्वी लद्दाख के पास चीनी वायुसेना के विमानों की उड़ान को लेकर भी भारत और चीन बातचीत कर रहे हैं.

अरुणाचल (Arunachal Pradesh) के Tawang की बात हो या लद्दाख (Laddakh) के Aksai China की, करीब साढ़े तीन हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा (Line of Actual Control) पर कई जगह भारत और चीन के बीच समय-समय पर विवादों की स्थिति रही है. 8 ​बिंदुओं में जानिए कि इस बारे में इतिहास क्या कहता है और दोनों देशों का नज़रिया क्या रहा.

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चूंकि पिछले कुछ समय से भारत और चीन (India & China) के बीच सीमा पर तनाव बना हुआ है. दोनों देशों की सेनाएं सीमा पर मुस्तैद हो चुकी हैं. वहीं, अमेरिका (USA) ने चीन को सलाह दी है कि ताकत के बजाय वह कूटनीति से काम ले, तो भारत ने कहा है कि वह झुकेगा नहीं और चीन से बातचीत (India China Dialogue) लगातार जारी है. ऐसे में समझना चाहिए कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद (Border Issue) क्या है, वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी क्या है और असह​मति कहां है.

1) क्या है लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल?
3488 किमी लंबी इस रेखा के दोनों तरफ क्रमश: भारत और चीन के नियंत्रण वाले इलाके हैं. भारत एलएसी को इतनी लंबाई की मानता रहा है लेकिन चीन केवल 2 हज़ार किमी की ऐसी किसी रेखा को तवज्जो देता है. 1962 के युद्ध के बाद की स्थिति को एलएसी के रूप में समझा जाता है, जो तीन हिस्सों में बंटी है. अरुणाचल और सिक्किम वाला पूर्वी हिस्सा, उत्तराखंड और हिमाचल वाला मध्य भाग और लद्दाख वाला पश्चिमी भाग.

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2) कहां है भारत चीन की असहमति?


पूर्वी हिस्से में एलएसी और 1914 के मैक्मैहॉन या मैकमोहन रेखा के संबंध में ज़मीनी स्थितियों को लेकर विवाद कम ही हैं लेकिन अरुणाचल खासकर तवांग क्षेत्र पर चीन अक्सर अपना हक जमाता रहा है और कब्ज़े का इरादा रखता रहा है. इसी तरह, बाराहोती मैदानों के भूभाग को लेकर एलएसी के मध्य भाग में विवाद की स्थिति रही है.


इसके बावजूद, बड़ा विवाद पश्चिमी हिस्से यानी लद्दाख वाले इलाके में रहा है. चीन अपने पूर्व प्रधानमंत्री झाउ एनलाई के 1950 के दशक के दौरान जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्रों को आधार बनाकर विवाद खड़ा करता रहा है. 1962 के युद्ध के बाद चीन का दावा रहा कि वह 1959 में एलएसी से 20 किमी पीछे चला गया था. 2017 में डोकलाम विवाद के समय भी चीन ने भारत के सामने यही दलील रखते हुए 1959 की एलएसी स्थिति बहाल रखे जाने पर ज़ोर दिया था.

3) भारत ने एलएसी कब मंज़ूर की?
साल 1991 में जब चीनी प्रधानमंत्री ली ​पेंग भारत दौरे पर आए, तब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के साथ एलएसी को लेकर बातचीत की थी. श्याम सरन ने अपनी किताब 'इंडिया सीज़ द वर्ल्ड' में लिखा कि राव और पेंग इस पर सहमत हुए कि सीमाओं पर शांति रहे. इसके बाद 1993 में जब राव ने बीजिंग यात्रा की तब भारत ने औपचारिक तौर पर एलएसी के कॉंसेप्ट को मंज़ूरी देते हुए सीमा पर शांति बरकरार रखने संबंधी एग्रीमेंट किया.

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भारत और चीन के बीच बड़ा विवाद पश्चिमी हिस्से यानी लद्दाख वाले इलाके में रहा है. (फाइल फोटो)


यह ध्यान रखने की बात है कि इस समय भी यही तय हुआ कि 1962 की स्थिति ही एलएसी को तय कर रही थी, न कि 1959 की. इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि जहां विवाद थे, उन जगहों को लेकर दोनों देश एक साझा वर्किंग ग्रुप के माध्यम से सीमा विवाद को हल करने के पक्ष में आए थे.

4) इसका मतलब एलएसी सीमा पर दावे की रेखा है?
भारत की तरफ से ऐसा नहीं रहा. सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा जारी नक्शे पर भारत की जो सीमा दिखती है, भारत ने उसी को अपने इलाके की रेखा कहा है, जिसमें अक्साई चीन और गिलगिट बा​ल्टिस्तान का क्षेत्र शामिल है. वहीं, चीन के लिए यह दावे की रेखा रही है. चीन तवांग सहित पूरे अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहकर उस पर अपना दावा करता रहा है.

5) तवांग के बदले अक्साई चिन का सौदा
एक और रिपोर्ट की मानें तो साल 2017 में चीन के पूर्व विशेष प्रतिनिधि दाई बिंग्गुओ (Dai Bingguo) ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यदि भारत तवांग (Tawang) क्षेत्र को चीन को सौंपने के लिए राजी होगा तो चीन अक्साई चीन (Aksai China) में अपने कब्जे का हिस्सा भारत को देगा. भारत सीमा विवाद को सुलझाने के लिए किसी कीमत पर तवांग क्षेत्र को चीन को नहीं सौंपेगा क्योंकि यह क्षेत्र भारत की पूर्ण संप्रभुता वाला क्षेत्र है. चीन पहले भी तीन बार सीमा विवाद को लेकर इस तरह के प्रस्ताव रख चुका है और भारत हर बार ठुकरा चुका है.

6) क्यों तवांग पर ललचाता रहा है चीन?
1914 में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच जो समझौता हुआ था, उसके मुताबिक तवांग और दक्षिणी अरुणाचल भी भारत का हिस्सा था. लेकिन, 1962 के युद्ध में चीनी सेना तवांग तक पहुंच गई थी. हालांकि ​परिस्थितियां अनुकूल न होने के कारण वहां से उस समय चीनी सेना को लौटना पड़ा. भौगोलिक दृष्टि से तवांग की सामरिक स्थिति बेहद अहम है इसलिए चीन हमेशा इस इलाके पर नज़र रखता रहा है.

तवांग भारत की पूर्ण संप्रभुता वाला क्षेत्र है इसलिए भारत इसे कभी छोड़ना नहीं चाहेगा. (फाइल फोटो)


7) और लद्दाख में क्या विवाद है?
ब्रिटिश राज के दौरान मैक्मैहॉन लाइन तय हुई थी और तब अक्साई चीन लद्दाख का क्षेत्र माना गया था, जो जम्मू और कश्मीर की राजशाही की सीमा में रहा. हालांकि 1914 में भी सीमा समझौते में पूर्वी क्षेत्र तो ठीक तरह से तय हुआ था लेकिन लद्दाख वाला पश्चिमी हिस्सा नहीं. भारत अक्साई चीन पर कभी दावा छोड़ने को तैयार नहीं हुआ और चीन इस हिस्से को कब्ज़ाने का कोई मौका छोड़ने पर तैयार नहीं हुआ.

8) नक्शे में सीमाएं कैसे तय हुईं?
भारत और चीन सीमा विवाद के बारे में एजी नूरानी की किताब कहती है कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1948 और 1950 में दो श्वेत पत्र जारी किए थे, जिनमें विवादित भूभाग को 'सीमा अपरिभाषित' करार दिया गया था. लेकिन, 1954 में नेहरू ने आदेश जारी करते हुए सीमाओं को नक्शे में बगैर किसी टिप्पणी के प्रकाशित करने को कहा और इसे सर्वव्यापी कर देने की बात कही. तबसे अब तक वही नक्शे प्रचलित तौर पर इस्तेमाल होते रहे हैं और माना जाता है कि यही नक्शे 1962 के युद्ध की एक वजह भी रहे थे.



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First published: June 2, 2020, 6:33 PM IST
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