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कौन थे "चंदामामा शंकर", जिन्होंने पीढ़ियों के बचपन को दिए कहानियों के रंग

चित्रकार शंकर और उनका रचा यादगार चित्र विक्रम बेताल.
चित्रकार शंकर और उनका रचा यादगार चित्र विक्रम बेताल.

चंदामामा (Chanamama Magazine) की लोकप्रियता का आलम यह था कि अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) तक इसके फैन रहे. इस पत्रिका की जो तस्वीरें बच्चों की जिज्ञासा और कल्पना को पंख दिया करती थीं, उनके कलाकार केसी शंकर (KC Shankar) की कहानी भी कम रोचक नहीं है.

  • News18India
  • Last Updated: October 1, 2020, 8:15 AM IST
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देश की कई पीढ़ियों का बचपन यानी 1990 के दशक के आखिर तक का बचपन कुछ पत्रिकाओं (Children Literature) और कॉमिक्स (Comics) के साथ गुज़रता रहा. इन्हीं में से एक बेहद चर्चित पत्रिका थी चंदामामा और इसके इलस्ट्रेटर थे केसी शिवशंकरन (KC ShivaShankaran), जिन्हें शोहरत के बाद प्यार से 'चंदामामा शंकर' नाम से पुकारा जाने लगा था. देश के बेहतरीन चित्रकारों में शुमार रहे शंकर ने चेन्नई (Chennai) में बीते 29 सितंबर को 96 साल की उम्र में आखिरी सांस ली, तो देश भर से उन लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि (RIP Shankar) दी, जिनके बचपन की यादों में वो ज़िंदा रहेंगे.

करथोलुवु चंद्रशेखरन शिवशंकरन को अक्सर केसी शंकर या चंदामामा शंकर के रूप में ही जाना गया क्योंकि चंदामामा पत्रिका को पहचान दिलाने वाले नामों में उनका योगदान न भुलाने लायक रहा. विक्रम बेताल जैसे पात्रों को अपने आइकॉनिक चित्रों से अमर बना देने वाले शंकर, चंदामामा की शुरूआती टीम के आखिरी सदस्य थे, जो हाल में नहीं रहे यानी चंदामामा की स्थापना के पीछे जितने कलाकार थे, अब कोई नहीं है.

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13 भाषाओं में छपने वाली चंदामामा पत्रिका का कुल सर्कुलेशन एक समय 9 लाख कॉपी का था.

इतिहास के पेपर में बनाते थे चित्र
तमिलनाडु के इरोड के एक गांव में 1924 में जन्मे शंकर को बचपन से ही चित्रकारी का शौक था. यहां तक कि वो इतिहास की परीक्षा में ऐतिहासिक पात्रों के चित्र बना देते थे. 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद अपने टीचर की प्रेरणा से उन्होंने चेन्नई के फाइन आर्ट्स कॉलेज में दाखिला लिया था और यहां मिली ट्रेनिंग के बाद एक चित्रकार के तौर पर उनकी यात्रा शुरू हुई थी.

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शंकर के कुछ मशहूर चित्र
1947 में चंदामामा नाम से एक बाल पत्रिका लॉंच हुई थी, जो 1990 के दशक तक एक दर्जन से ज़्यादा भाषाओं में छपने लगी थी. 1952 में इस पत्रिका के साथ बतौर चित्रकार जुड़े शंकर पत्रिका बंद होने तक यानी 2012 तक इसके अभिन्न अंग रहे. इन 60 सालों में हज़ारों तस्वीरें शंकर ने चंदामामा के लिए बनाईं. इनमें से विक्रम बेताल सबसे ज़्यादा पसंद की गई सीरीज़ में रही.

इसके अलावा, रामायण और महाभारत की कहानियों को भी चित्र शृंखला के तौर पर शंकर ने उकेरकर यादगार काम किया था. पौराणिक कथाओं से लेकर सुपरहीरो और आधुनिक समय की बाल कथाओं और पात्रों को शंकर ने अपनी कूची से उकेरकर हर वक्त के पाठकों का प्यार और सम्मान हासिल किया.

बैलगाड़ी के दो में से 'एक बैल' थे शंकर
द हिंदू को दिए इंटरव्यू में शंकर ने याद करते हुए कहा था कि नागी रेड्डी अक्सर कहा करते थे कि चंदामामा की बैलगाड़ी अपने गांव तक नहीं पहुंच पाएगी अगर चित्रा और शंकर, उसके दो बैलों में से एक का भी साथ छूट जाएगा. चित्रा कौन थीं? जब शंकर ने चंदामामा पत्रिका को 1952 में जॉइन किया था, तब, उससे पहले और उसके कुछ समय बाद तक चित्रा ही पत्रिका की चित्रकारी विंग की प्रमुख थीं. चित्रा के 1979 में गुज़र जाने पर रेड्डी ने यह बात कही थी.

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चंदामामा की शुरूआत की कहानी
एक ज़माने में देश भर के बच्चों की पहली पसंद बनी इस पत्रिका को दक्षिण के फिल्मकार बी नागी रेड्डी और चक्रपाणि ने मिलकर शुरू किया था. देखते ही देखते यह पत्रिका खासी लोकप्रिय हो गई थी. उधर, चित्रकारी की डिग्री और ट्रेनिंग के बाद शंकर ने कलईमागल पत्रिका के साथ चित्रकारी की यात्रा शुरू की थी, लेकिन बाद में उन्होंने चंदामामा की टीम का हिस्सा बने. यह पत्रिका बंद हो जाने के बाद यानी पिछले करीब 8 सालों से शंकर रामकृष्ण विजयम मैगज़ीन से जुड़े रहे.



वेतन से जुड़ा रोचक किस्सा
कलईमागल पत्रिका में शंकर 150 रुपये प्रतिमाह पाते थे, लेकिन यह वेतन एक बड़े परिवार को चलाने के लिए काफी नहीं था. इसलिए उन्होंने चंदामामा के साथ जुड़ना तय किया था. द हिंदू को दिए इंटरव्यू में शंकर ने बताया था कि रेड्डी ने उनकी प्रतिभा को देखकर उन्हें 250 रुपये प्रतिमाह पर नियुक्ति दी थी, लेकिन उस वक्त प्रमुख चित्रकार चित्रा को भी यही वेतन मिलता था इसलिए सैलरी स्लिप और कागज़ों पर शंकर का वेतन 300 रुपये लिखा जाता था.

हैंडराइटिंग से मिला टीचरों का प्यार
शंकर को स्कूल में दाखिला सीधे पांचवी क्लास में अपनी सुंदर हैंडराइटिंग की वजह से मिल गया था. यादें सुनाते हुए शंकर ने बताया था कि हाई स्कूल तक ऐसा रहा कि टीचर उनसे नोटिस बोर्ड पर रोज़ के विचार आदि लिखवाया करते थे. यही नहीं, चित्रकारी की उनकी प्रतिभा टीचरों को दंग करती रही. अपने अद्भुत और अनूठे ब्रश प्रयोगों से शंकर ने अपने टीचर और मशहूर चित्रकार डीपी रॉय चौधरी को भी दंग कर दिया था, जिन्होंने उन्होंने सीधे कॉलेज के सेकंड इयर में उन्हें दाखिला दिलवा दिया था.

शंकर की यादें हमेशा बनी रहेंगी ​क्योंकि एक से ज़्यादा पीढ़ियों के कई बच्चों की महत्वाकांक्षा तक यही रही कि वो एक दिन शंकर जैसी महारत के साथ चित्र बना सकें. जैसा खुद शंकर ने कहा था अपने टीचर की बात मानते हुए उन्होंने 'अच्छा ही किया कि बीए या एमए नहीं किया'.
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