कौन हैं वो पुजारी सत्येंद्र दास, जो 28 सालों से अयोध्या में कर रहे हैं रामलला की पूजा

कौन हैं वो पुजारी सत्येंद्र दास, जो 28 सालों से अयोध्या में कर रहे हैं रामलला की पूजा
तीन दशकों से रामलला के प्रधान पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास.

आचार्य सत्येंद्र दास (Satyendra Das) टीचर थे; राम जन्मभूमि (Ram Janmbhumi) आंदोलन से जुड़े धार्मिक नेताओं के बीच उनकी पहुंच थी; धार्मिक संगठनों और भाजपा (BJP) नेताओं के बीच भी संपर्क व संबंध थे; 1992 में उन्हें प्रधान पुजारी नियु​क्त किया गया था; दास बाबरी विध्वंस कांड के वक्त किस भूमिका में थे? रामलला के मुख्य पुजारी के बारे में रोचक फैक्ट्स.

  • News18India
  • Last Updated: August 10, 2020, 4:58 PM IST
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बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) के भीतर 1949 में रामलला की प्रतिमा स्थापित कर दी गई थी और तभी से अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि (Ram Janma Bhoomi) का यह क्षेत्र विवादास्पद था. हालांकि 1992 तक किसी बड़ी हिंसा की स्थिति नहीं बनी थी. कोर्ट और प्रशासन की व्यवस्था के हिसाब से एक पुजारी (Priest) रामलला की पूजा अर्चना के लिए नियुक्त रहा. 1992 में बाबरी विध्वंस (Babri Masjid Demolition) से करीब नौ महीने पहले से पुजारी के तौर पर आचार्य सत्येंद्र दास (Acharya Satyendra Das) रामलला की पूजा करते रहे हैं.

पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने विवादास्पद रहे इस केस में फैसला सुनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया, तबसे दास के पुजारी के तौर पर बने रहने पर सवालिया निशान लगा. बहरहाल, अब जब भव्य राम मंदिर (Ram Mandir) के निर्माण के लिए शिलान्यास हो चुका है, तो जानिए कि रामलला के प्रधान पुजारी सत्येंद्र दास को कैसे नियुक्ति मिली थी... कितना वेतन मिलता रहा और यह भी कि यहां प्रधान पुजारी से पहले वह क्या कर रहे थे.





पूजा करते वक्त लगता था कि मंदिर बनेगा
मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भारी सुरक्षा और प्रतिबंधों के बीच लंबे समय तक नियमित रूप से रामलला की पूजा करते हुए उन्हें हमेशा लगता था कि यहां एक न ​एक दिन भव्य मंदिर ज़रूर बनेगा. 5 मार्च 1992 को विवादित स्थल के रिसीवर ने उन्हें पुजारी के तौर पर यहां नियुक्त किया था, तबसे नियमित रूप से दास रामलला की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं.

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राम मंदिर के प्रस्तावित डिज़ाइन का अवलोकन करते आचार्य सत्येंद्र दास.


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कितना रहा दास का वेतन?
1992 में ​जब नियुक्ति हुई थी, तब आचार्य सत्येंद्र दास का वेतन 100 रुपये महीने था. लेकिन पिछले कुछ सालों से इस वेतन में बढ़ोत्तरी का सिलसिा शुरू हुआ. साल 2018 तक केवल 12 हजार मासिक मानदेय उन्हें मिलता था, जबकि 2019 में रिसीवर व अयोध्या के कमिश्नर के निर्देश के बाद यह वेतन 13 हजार रुपये कर दिया गया. दास के मुताबिक उनके घर का खर्च शिक्षक की नौकरी के वेतन से चलता रहा.

टीचर कैसे नियुक्त हुआ था पुजारी?
आचार्य सत्येंद्र दास के रामलला विवादित स्थल के पुजारी बनने की घटना इतिहास के कुछ पन्नों से भी धूल हटाती है. 1992 में रामलला के पुजारी महंत लालदास थे. उस समय तक रिसीवर को रिटायर्ड जज को रिपोर्ट करना होता था. फरवरी 1992 में जब रिसीवर का निधन हुआ, तब राम जन्मभूमि के विवादित स्थल की ज़िम्मेदारियां जिला प्रशासन के पास गईं और तब महंत लालदास को ​हटाए जाने की चर्चाएं थीं.

एक अन्य इंटरव्यू में दास ने बताया था कि उस समय भाजपा सांसद विनय कटियार और विश्व हिंदू परिषद के कुछ नेताओं के साथ उनके अच्छे संबंध थे. सबने मिलकर उनका नाम तय किया, जिसमें विहिप के तत्कालीन प्रमुख अशोक सिंघल की सहमति भी थी. इस ​तरह उनकी नियुक्ति हो गई जबकि वह साथ में संस्कृत कॉलेज में अध्यापन भी कर रहे थे. दास को नियुक्ति के साथ ही 4 सहयोगी पुजारियों को नियुक्त करने का अधिकार भी दिया गया.

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काफी दिलचस्प था सत्येंद्र दास का अतीत
बचपन में दास अपने पिता के साथ अयोध्या आया करते थे और अभिराम दास जी से मिला करते थे. ये अभिराम दास वही थे, जो 1949 में विवादित स्थल पर रामलला की प्रतिमा स्थापित करने वाले बैरागियों में शामिल थे. सत्येंद्र दास इनसे प्रेरित होकर साधु बनना चाहते थे और पढ़ाई के भी इच्छुक थे. उनके पिता ने उनकी इस इच्छा को सम्मान दिया तो दास ने घर छोड़कर 1958 में अयोध्या का रुख किया.

सत्येंद्र दास के परिवार में एक भाई और एक बहन थी, जिनसे नाता बना रहा. खुद दास मौकों पर परिवार से मिलने जाते रहे जबकि उनके भाई व अन्य परिजन भी उनसे मिलने आते जाते रहे. 1975 में दास ने आचार्य की डिग्री हासिल की और 1976 में वह संस्कृत के अध्यापक हो गए.

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न्यूज़18 से बातचीत करते हुए आचार्य सत्येंद्र दास.


बाबरी विध्वंस के समय दास की भूमिका
आचार्य सत्येंद्र दास की नियुक्ति चूंकि मार्च 1992 में हो चुकी थी यानी 6 दिसंबर 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस कांड के समय वह वहीं थे. उस घटना के समय रामलला के प्रधान पुजारी क्या कर रहे थे? यह सवाल स्वाभाविक है. एक साक्षात्कार में दास ने बताया था कि बाबरी विध्वंस कांड की सुबह जब नारों का शोर उठा और भीड़ विवादित स्थल की तरफ बढ़ने लगी, तब वह रामलला के पास ही थे.

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भीड़ ने जब विवादित ढांचे को तोड़ने की शुरूआत की थी तब आचार्य सत्येंद्र दास रामलला की प्रतिमा के पास ही थे और प्रतिमा की रक्षा करने में लगे थे. बकौल दास वह प्रतिमा को उठाकर एक तरफ को चले गए थे ताकि रामलला को कोई नुकसान न पहुंचे...

संघ और विहिप से भिड़ चुके हैं दास
पिछले 28 सालों से रामलला की पूजा अर्चना कर रहे प्रधान पुजारी खुद बता चुके हैं कि विहिप के नेताओं ने जब प्रतिबंध के बावजूद पूजा की थी और चाहा था कि दास इस बात पर परदा डाल दें, तब प्रेस के सामने दास ने सच बोला था. तबसे विहिप की आंखों की किरकिरी रहे. दूसरी तरफ, दास खुद कह चुके हैं कि उन्होंने प्रधान पुजारी होते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कठपुतली या मुखौटे की तरह काम करने से मना​ किया था.

सच कहूं, मैंने रामलला की लंबी सेवा करके सब कुछ पा लिया है और पूजा की पूंजी यही है कि भव्य राममंदिर का निर्माण जल्द शुरू होने जा रहा है... अगर ट्रस्‍ट में स्थान मिला और मुझसे पूजा के लिए कहा गया, तो मैं प्रस्तुत रहूंगा. वैसे रामलला के दर्शन व उनकी आराधना तो पुजारी न रहकर भी जारी रहेगी.


इसके साथ ही दास कह चुके हैं कि तमाम कारणों से उनके विरोधी बहुत रहे, लेकिन चूंकि प्रधान पुजारी की नियुक्ति में अदालत का दखल स्पष्ट रहा है इसलिए पुजारी को अदालत की मंज़ूरी के बगैर हटाया भी नहीं जा सकता. लेकिन अब राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए नया ट्रस्ट बनने के बाद ट्रस्ट तय करेगा कि रामलला की पूजा अर्चना के लिए प्रधान पुजारी व अन्य पुजारियों की व्यवस्था क्या होगी.
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