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चीन की उकसावे की कार्रवाइयों के पीछे क्यों है उसकी '05 अंगुलियों' की रणनीति

चीन की उकसावे की कार्रवाइयों के पीछे क्यों है उसकी '05 अंगुलियों' की रणनीति

चीन ने हाल में फिर भारत के खिलाफ कुछ उकसाने वाली कार्रवाइयां की हैं. (shutterstock)

चीन ने हाल में फिर भारत के खिलाफ कुछ उकसाने वाली कार्रवाइयां की हैं. (shutterstock)

हाल में चीन ने भारत के खिलाफ कई उकसाने वाली कार्रवाइयां फिर की हैं. अरुणाचल के कई स्थानों के नाम उसने चाइनीज भाषा में रखे हैं तो उस पर फिर अपना दावा जताया है. पैगोंग झील पर वो पुल बना रहा है. गलवान में उसने 05 सितारों वाला लाल झंडा फहराया. आखिर चीन क्यों लगातार भारत के खिलाफ इस तरह की उकसाने वाली हरकतें करता रहता है. क्या है चीन की फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत रणनीति (Five fingers of Tibetan strategy), जिससे अलर्ट रहने की जरूरत है.

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चीन ने पिछले कुछ समय में फिर भारत के खिलाफ उकसावे की कार्रवाइयां की हैं. पिछले कुछ समय से चीन लगातार आक्रामक तेवर दिखाता रहा है. अगर वो पैगोंग लेक पर सामरिक दृष्टि से बेहद अहम पुल बनाने में लगा है तो गलवान में 05 सितारों वाला अपना झंडा फहराया. केवल यही नहीं बल्कि अरुणाचल में उसने कई स्थानों के नाम चीनी भाषा में बदलकर फिर दावा किया कि ये इलाका उसका है. हाल में जब कुछ सांसद धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार के एक कार्यक्रम में शामिल हुए तो चीन के दूतावास ने आपत्ति जताने वाले पत्र भेजे. अक्सर कहा जाता है कि चीन लगातार भारत के खिलाफ अपनी 05 अंगुलियों की रणनीति को अमल में लाने में लगा हुआ है.

निर्वासित तिब्बती नेताओं ने भी भारत को चीन की उस रणनीति से आगाह किया है, जिसे वह “फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत स्ट्रैटजी” कहता आया है. आखिर क्या है ये रणनीति, जिसकी ओर कदम बढ़ाने या जिस पर अमल करने की कोशिश चीन पिछले 80 सालों से करता रहा है. वैसे ये रणनीति बहुत खतरनाक है और ये जाहिर करती है कि चीन के मंसूबे भारत के पांच इलाकों को लेकर कतई ठीक नहीं रहे हैं.

ये 1940 का दशक था. लाल क्रांति के बाद चीन में माओ सर्वोच्च नेता के तौर पर उभर चुके थे. वो हमेशा एक खास रणनीति के बारे में खुलेआम बात करते थे. वो खुलेआम कहते थे कि हमें वो दाहिना हाथ हासिल करना है, जो कभी हमारा रहा है. माओ हमेशा से ये मानते आए थे कि तिब्बत और उससे लगे हुए इलाके किसी जमाने में वृहद चीनी साम्राज्य का अंग थे, जिसे हमें किसी तरह से हासिल करना है.

50 के दशक से पड़ोसी इलाकों पर अधिकार का दावा
अगर हम चीन के अब तक के दौर पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि चीन ने 50 के दशक से अपने पड़ोसियों के बहुत सारे इलाकों पर अपना अधिकार जताना शुरू किया और उस पर दावा जताया. हैरानी ये है चीन ने पड़ोसी देश मंगोलिया के बड़े इलाके पर अपना दावा कर दिया. जबकि ऐतिहासिक तथ्य ये बताते हैं कि एक जमाने में एशिया का सबसे बड़ा साम्राज्य मंगोलिया था. जिसका हिस्सा चीन भी था और जिसका हिस्सा तिब्बत भी था. तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा.

माओ जेदॉन्ग खुलेआम 1940 के दशक में ऐलान कर चुके थे कि हमें फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत पर कब्जा करना है

तिब्बत को दाहिनी हथेली और इन्हें मानता है 05 अंगुलियां 
अब हम आपको चीन की उस रणनीति का खुलासा करते हैं, जिसे वो लंबे समय से फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत स्ट्रैटजी कहता आया है. माओ के अनुसार इसमें तिब्बत वो दाहिनी हथेली थी, जो चीन का हिस्सा होनी चाहिए थी. साथ ही दाहिनी हथेली से जुड़ी अंगुलियां मानी गईं- सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, भूटान, नेपाल औऱ लद्दाख.

तिब्बत पर चुप्पी अब भारी पड़ रही है
1959 में चीन ने अपनी सेनाएं भेजकर दाहिनी हथेली यानी तिब्बत पर कब्जा कर लिया. तब दुनिया ने किसी भी देश ने या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई. किसी ने उसका विरोध नहीं किया. भारत ने विरोध जरूर किया लेकिन बहुत कमजोर तरीके से. यहां तक एक शांतिप्रिय राष्ट्र तिब्बत पर जबरदस्ती कब्जे का मामला संयुक्त राष्ट्र में भी नहीं उठा.

अगर तभी चीन को तिब्बत पर कब्जा करने से रोका जाता तो वो यहां तक बढ़ ही नहीं पाता और एक बड़े भू-भाग पर अपना दावा नहीं जता पाता. तब भारत ने केवल इतना जरूर किया कि उसने तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु और शासक दलाई लामा को देश में शरण दी. वो बड़े पैमाने पर अपने समर्थकों के साथ भारत पहुंचे थे. इतने सालों बाद भी तिब्बती यहां पर शरणार्थी बने हुए हैं.

पहली अंगुली यानी सिक्किम 
अब पांच अंगुलियों की बात करते हैं. पांच अंगुलियों में सिक्किम का भारत में 1975 में विलय हो गया. हालांकि तब चीन ने इस पर खासा विरोध जाहिर किया था. लेकिन उसकी चल नहीं पाई. तब से सिक्किम भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है. लेकिन इससे जुड़ी सीमा पर चीन की फौजें हमेशा घुसपैठ की कोशिश करती हैं या जमावड़ा बनाए रखती हैं.

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सिक्किम का भारत में विलय हो चुका है लेकिन चीन लगातार वहां घुसपैठ करता रहा है

दूसरी अंगुली अरुणाचल, जहां लगातार गड़बड़ी करता है चीन
दूसरी अंगुली है अरुणाचल प्रदेश. वर्ष 1962 में जब भारत-चीन का युद्ध हुआ तो चीन की फौजें इस इलाके में काफी अंदर तक घुस आईं थीं. अब अरुणाचल के एक बड़े भाग पर चीन का कब्जा है. इस इलाके को नेफा भी कहा जाता है. चीन इसे अपना मानता है. उसका दावा है कि ऐतिहासिक तौर पर ये उसका इलाका है. हालांकि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं. हाल में भी उसने अरुणाचल के 15 स्थानों के नए नामों की सूची चीनी, तिब्बती और रोमन भाषा में जारी करते हुए उन्हें अपना बताया है. वो इसे नेफा कहता है.

हद तो ये है कि अरुणाचल प्रदेश पर चीन रह-रहकर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करता है. जब भी वहां कोई भारतीय नेता जाता है, तब वो उस पर आधिकारिक तौर पर विरोध जाहिर करता है. अरुणाचल के लोगों के पास भारतीय पासपोर्ट हैं लेकिन चीन इसे भी नहीं मानता. अक्सर वो अरुणाचल प्रदेश से चीन जाने वाले लोगों को वीजा नहीं देता. अरुणाचल के पास भी सामरिक महत्व की जगहों पर चीनी सेनाएं डटी रहती हैं.

तीसरी अंगुली है नेपाल, जो अब चीन की गोदी में बैठ चुका है
तीसरी अंगुली है नेपाल. एक जमाने में नेपाल ये दावा करता रहता था कि चीन उसका सबसे बड़ा दुश्मन देश है, क्योंकि जिस तरह उसने तिब्बत पर कब्जा किया है, उससे वो बहुत आहत है. हालांकि नेपाल के एक बड़े इलाके पर हमेशा से चीन ने दावा जताया है. तब चीन के डर से बचने के लिए नेपाल ने भारत को सैन्य मदद तक करने की गुहार लगाई थी.

नेपाल एक जमाने में डरा रहता था कि कहीं तिब्बत के बाद चीन उसके देश पर कब्जा ना कर ले. अब वो खुद जाकर चीन की गोदी में बैठ चुका है

भारत पिछले 70 सालों से नेपाल को लगातार हर तरह की मदद भी करता रहा था लेकिन अब नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार चीन की गोदी में बैठकर भारत को अपना दुश्मन बताने लगी है. हालांकि नेपाल को ये अंदाज नहीं है कि चीन जिस फाइव फिंगर की रणनीति पर गंभीरता से कदम बढ़ाता रहा है, उसमें अब सबसे बड़ा खतरा उस पर ही मंडरा रहा है.

चौथी अंगुली भूटान को फुसलाने की भरपूर कोशिश
चौथी अंगुली भूटान है. भारत के पूर्वी छोर पर बसा भूटान शांतिप्रिय और सुंदर देश है. चीन लंबे समय से उस पर अपना दावा जताता रहा है. ये उसकी फाइव फिंगर्स स्ट्रैटजी में आता है यानी उसे भूटान पर एक ना एक दिन कब्जा करना ही है.

भूटान और भारत के बीच सैन्य संधि है. भारत इस संधि के तहत पूरी तरह भूटान को सैन्य मदद करता है. भारतीय सेनाएं उसकी सुरक्षा का काम करती हैं. हालांकि लंबे अर्से से चीन इस छोटे से देश के सामने आकर्षक विदेशी निवेश और मदद का चारा फेंकता रहा है. भूटान ने भी पिछले दिनों उससे महत्वपूर्ण संधि की है.

India-China Tension

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा तक चीन घुस आय़ा है और वहां से पीछे हटने को राजी नहीं

पांचवीं अंगुली लद्दाख, जहां हमेशा होती है घुसपैठ 
पांचवीं अंगुली लद्दाख है, जिस पर चीन की नजर सबसे ज्यादा रहती है. यहां वो पिछले कुछ सालों में लगातार घुसपैठ करता रहा है. हमारे बहुत से इलाकों पर उसने कब्जा भी कर लिया है. एक जमाने में समूचा अक्साई चिन भारत में था, जिसे चीन हथिया चुका है. अब वो उस गलवान घाटी पर आगे आकर सेनाएं लेकर बैठा हुआ है, जिस पर आज तक उसका कब्जा नहीं था. अब उसने खुले तौर पर गलवान घाटी पर दावा जता दिया है.

लिहाजा आप समझ गए होंगे कि चीन की ये खतरनाक रणनीति क्या है. जिसके लिए चीन हमेशा से कदम बढ़ाता रहा है. भारत को इस समझते हुए अपने इन संवेदनशील क्षेत्रों की पुख्ता सुरक्षा की जरूरत है.

Tags: Arunachal pradesh, China, China india, China vs india, India china border dispute, Tibet

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