भारत का पत्ता काटकर ईरान का सगा कैसे हुआ चीन, भारत के लिए क्या मायने?

भारत का पत्ता काटकर ईरान का सगा कैसे हुआ चीन, भारत के लिए क्या मायने?
पीएम नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी.

एक तीर से दो निशाने करते हुए China ने Iran से भारत और अमेरिका (India and USA) के रणनीतिक इरादों का गला तकरीबन घोंट दिया है. बात सिर्फ व्यापारिक समझौते की नहीं है, बल्कि बड़े स्तर पर यह चीन की अमेरिका से टकराने और भारत को धक्का पहुंचाने की बड़ी चाल है जो Middle East के कई समीकरण बदलने वाली साबित हो सकती है.

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चार साल पहले Chabahar Port और रेल नेटवर्क को लेकर भारत के साथ ईरान (India-Iran Deal) ने जो डील की थी, अब वह एक तरह से मटियामेट हो गई और ईरान इस प्रोजेक्ट पर भारत के बगैर आगे बढ़ेगा. दूसरी खबर ये आई कि चीन ने ईरान के ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में 400 अरब डॉलर की डील (China-Iran Deal) के ज़रिये न केवल Middle East के अहम देश में जड़ें जमा ली हैं, बल्कि वहां से भारत का पत्ता साफ करने में भूमिका निभाई है.

ये मामूली नहीं बल्कि अहमियत वाले समाचार हैं क्योंकि इससे भारत और चीन के बीच बने हुए तनाव (India-China Tension) में चीन के खाते में एक और बढ़त साफ जाती है. दूसरे, ये भी कि इससे मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थितियों में भारी बदलाव होंगे और इनसे भारत के बजाय चीन को फायदा मिलेगा. कैसे और क्यों? तमाम पहलुओं को ठीक से समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है.

चार साल के संबंध कैसे गए गड्ढे में?
मीडिया में कहा गया कि ईरान ने चाबहार से अफगानिस्तान बॉर्डर से सटे ज़ेहेदान के बीच लंबी रेल लाइन के प्रोजेक्ट पर भारतीय सरकार की फंडिंग में हो रही लेटलतीफी के चलते अकेले ही आगे बढ़ने का मन बना लिया है. इस खबर के आते ही कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने मोदी सरकार की नीतियों को कठघरे में भी खड़ा किया और सवाल पूछे.
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भारत और ईरान के बीच चार साल पहले चाबहार समझौता हुआ था.


चाबहार प्रोजेक्ट पर क्यों हुई देर?
रिपोर्टों की मानें तो भारत ने अमेरिका के साथ दोस्ती निभाने के लिए ईरान को नज़रअंदाज़ किया. इसी साल जनवरी में भारत यात्रा पर आए ईरानी विदेश मंत्री ने कहा था कि चाबहार डील के चलते 2018 में अमेरिका ने भारत की तुलना में ईरान के साथ सौतेला व्यवहार किया था. दूसरी तरफ, अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों के नाजुक दौर के कारण यूरापीय और चीनी सप्लायरों ने भी हाथ खींचे थे. इससे ईरान को प्रोजेक्ट के लिए सामान नहीं मिल रहा था.

इसके बाद, भारत में नागरिकता संशोधन कानून और फिर दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों को लेकर बने हालात पर ईरान ने आपत्तिजनक प्रतिक्रिया दर्ज कराई थी. इससे भी भारत की नाराज़गी ज़ाहिर हुई थी. कुल मिलाकर भारत ने चाबहार प्रोजेक्ट में ईरान की मदद को प्राथमिकता देने में कोताही बरती.

क्यों अहम थी भारत के लिए ये डील?
चार साल पहले भारत और ईरान ने 628 किमी की इस रेल लाइन के लिए समझौता किया था. चाबहार पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से महज़ 72 किलोमीटर की दूरी पर है. यह बहुत ही संवेदनशील और रणनीतिक महत्व की लोकेशन है क्योंकि पाक के ग्वादर पोर्ट पर एक तरह से चीन ने अपना प्रभुत्व जमा लिया है. यानी समुद्र से लेकर कश्मीर की सीमा तक पाकिस्तानी सीमाओं पर चीन का वर्चस्व पहले से है.

ऐसे में चाबहार को रणनीतिक तौर पर अपने निवेश से भारत अपने प्रभुत्व की जगह बना सकता था. लेकिन चीन ने ईरान के साथ एक बड़ी डील करते हुए ऐसी चाल खेली कि ईरान और भारत की यह डील खटाई में चली गई.

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Galwan Valley Face-Off के बाद भारत और चीन के बीच बनी तनाव की स्थिति में ईरान का चीन के साथ खड़े नज़र आना चिंता का विषय है.


चीन की डील के मायने?
ईरान ने चीन के साथ जो समझौता किया है, उसके तहत कहा जा रहा है कि चीन 400 अरब डॉलर का निवेश ईरान के अहम सेक्टरों में करेगा और इसके बदले में ईरान अगले 25 सालों के लिए चीन को तेल 'बेहद सस्ती कीमतों' पर मुहैया कराएगा. बात सिर्फ इतनी नहीं है यानी यह सिर्फ व्यापारिक समझौता नहीं दिखता. अमेरिका ने शक जताया है कि इस समझौते से ईरान में चीन अपने मिलिट्री बेस बना सकता है. यानी मध्य पूर्व की राजनीति और रणनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव हो सकते हैं.

चीन ने एक बहुत बड़ी डील के तौर पर लुभावना प्रस्ताव ईरान के सामने 2016 में रखा था, जिसे पिछले कुछ हफ्तों में ही ईरान ने अंतिम रूप देकर मंज़ूर किया है. इसके तहत ईरान में संयुक्त सैन्य अभ्यास के अलावा हवाई अड्डों, रेल लाइनों और सब वे तक कई क्षेत्रों में चीन निवेश कर मदद करेगा. इसके ​साथ ही, ईरान में 5जी नेटवर्क के साथ चीन यहां संचार सेक्टर में भी दखल देगा.

चीन ने लगाए एक तीर से दो निशाने
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालते ही ईरान के साथ सख्त रवैया अपनाना शुरू ​कर दिया था, जब न्यूक्लियर डील को रद्द कर दिया गया था. साथ ही अमेरिका ने समय समय पर ईरान की फंडिंग को बाधित किया. कोविड 19 के दौर में जब ईरान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई थी, ऐसे में अमेरिकी फंडिंग के बाधित होने से ईरान को निवेश का नया रास्ता खोजना ही था. चीन ने मौके का फायदा उठाकर एक तीर से अमेरिका और भारत दोनों को निशाना बना लिया.

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ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से खिंचाव जारी है.


मध्य पूर्व : अब किस करवट बैठेगा ऊंट?
कई दशकों से मध्य पूर्व में अमेरिकी सेनाओं का वर्चस्व रहा है और यहां की राजनीति एक तरह से अमेरिका की मुट्ठी में रही है लेकिन अब एनवायटी की रिपोर्ट के मुताबिक इस मैदान में चीन के रूप में नया खिलाड़ी आएगा. चीन मध्य पूर्व के पोर्ट्स पर जिस तरह वर्चस्व जमा रहा है, माना जा रहा है कि वो इन्हें अपने मिलिट्री बेस के तौर पर विकसित करेगा ही.

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हॉरमूज़ की खाड़ी दुनिया भर में अहम समुद्री चेकपॉइंट है और फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार कही जाती है. चीन ने ईरान के पोर्ट को लेकर जो प्रस्ताव रखा है उसमें जास्क का ज़िक्र है, जो हॉरमूज़ की खाड़ी से सटा हुआ क्षेत्र है. अभी चेकपॉइंट पर अमेरिकी नियंत्रण है अमेरिकी वर्चस्व का बड़ा कारण भी है. अब जिस रास्ते से दुनिया भर में तेल का बड़ा कारोबार होता है, वहां चीनी दखल होगा.

इसके अलावा, ईरान में इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश के चलते अफगानिस्तान तक चीन की सीधी पकड़ बेहद मज़बूत हो जाएगी. इसका मतलब यह होगा कि पाकिस्तान से लेकर ईरान तक भारत की पड़ोसियों पर चीन का प्रभाव भारत से कहीं ज़्यादा होगा.
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