बॉलीवुड और मोदी फैन रहे चिराग ने कैसे अपनी पार्टी को बनाया आत्मनिर्भर?

बॉलीवुड और मोदी फैन रहे चिराग ने कैसे अपनी पार्टी को बनाया आत्मनिर्भर?
न्यूज़18 इलस्ट्रेशन

बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में तेज़ी से उभरे हैं चिराग पासवान. जब वो राजनीति में आए थे, तब उनके पिता रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) की पार्टी एलजेपी का वजूद ही खतरे में था, लेकिन चिराग के पार्टी में आने के बाद से उनकी पार्टी के सांसद और विधायकों की संख्या कई गुना बढ़ गई. आगामी बिहार चुनाव (Bihar Election 2020) में चिराग क्या किसी नये कीर्तिमान की तरफ हैं?

  • News18India
  • Last Updated: September 8, 2020, 3:50 PM IST
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बॉलीवुड (Bollywood) में फ्लॉप हीरो रहने के बाद राजनीति में एंट्री मारने वाले चिराग पासवान बिहार की सियासत में हिट चेहरा बनकर उभरे. पिछले ही साल चिराग उस लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) के प्रमुख बने, जिसकी नींव 20 साल पहले उनके पिता रामविलास पासवान ने जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) के नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मतभेदों के चलते रखी थी. बिहार में इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Election) की सुर्खियों के बीच चिराग अपनी सियासी रणनीतियों को लेकर लगातार चर्चा में बने हुए हैं.

क्या आपको साल 2004 व 2005 में रामविलास पासवान का दौर याद है? केंद्र में यूपीए के नेतृत्व में और फिर 2005 बिहार चुनाव में पासवान ने यूपीए का हिस्सा होते हुए भी राष्ट्रीय जनता दल के खिलाफ चुनाव लड़ा था. कुछ ऐसे ही तेवर अब उनके बेटे चिराग अपनाने जा रहे हैं. चिराग के बारे में कुछ रोचक फैक्ट्स के साथ ही आपको बताते हैं कि कैसे वो अपने पिता की राह पर चल पड़े हैं और क्यों सुर्खियों में बने हुए हैं.

क्या हैं चिराग के समीकरण?
लोजपा ने बिहार चुनाव में गठबंधन, सीट बंटवारे और चुनावी सियासत पर तमाम फैसले लेने का अधिकार युवा नेता चिराग को सौंप दिया है. अब चिराग का रुख जीतन राम मांझी की तरफ नरम है, लेकिन नीतीश कुमार की तरफ सख्त है. लोजपा के नेताओं की मंशा है कि नीतीश के प्रत्याशियों के खिलाफ लोजपा अपने प्रत्याशी खड़े करे.
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नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ना चिराग को रास नहीं आ रहा है इसलिए वो केंद्र में भाजपा के साथ रहते हुए बिहार में एनडीए के ही दल जेडीयू के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाकर अपने पिता के रास्ते पर ही चलने की मिसाल पेश कर सकते हैं.

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पिता रामविलास के साथ चिराग.


चिराग का चुनावी अभियान
'बिहार फर्स्‍ट, बिहारी फर्स्‍ट यात्रा' के तहत बिहार के विकास का एक विजन डॉक्यूमेंट पेश करने वाले चिराग को इस चुनावी अभियान के लिए न केवल सुर्खियां मिलीं बल्कि खासी तारीफ भी. बिहार के विकास में बिहारियों को केंद्र में रखने वाले इस अभियान में ​राज्य को नंबर वन बनाने का नारा​ दिया गया है. ये भी कहा जा चुका है कि चिराग के इस अभियान से नीतीश सरकार न केवल खफा है, बल्कि उसे झटका भी लगा है.

क्या विधानसभा में चलेगा सांसद का जादू?
चाहे कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान बिहार का संकट रहा हो या फिर बाढ़ के दौरान समस्याओं की बात रही हो, चिराग ने नीतीश सरकार को घेरने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा है. कथित तौर पर नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बना रहे चिराग क्या विधानसभा चुनाव में कोई बड़ा दांव खेलने में कामयाब हो सकेंगे? यह धीरे धीरे साफ होगा, लेकिन यह तय है कि चिराग अपनी प्रतिभा साबित कर चुके हैं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सवा पांच लाख से ज़्यादा वोट ​हासिल कर जमुई सीट से चिराग लोकसभा पहुंचे थे और करीबी प्रतिद्वंद्वी भूदेव चौधरी को हराया था. इसी तरह, 2014 के आम चुनाव में भी इसी सीट से सुधांशु शेखर भास्कर को 85 हज़ार से ज़्यादा वोटों से चिराग ने पटखनी दी थी. पिछले ही साल अपने पिता की बनाई पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद अब चिराग पर विधानसभा चुनाव में अपना नेतृत्व साबित करने की ज़िम्मेदारी है.

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परिवारवाद के दूसरे बड़े उदाहरण!
जी हां, देश में समाजवाद की विचारधारा वाली जो प्रमुख पार्टियां रही हैं, उनमें एक वंश की पीढ़ी के तौर पर पार्टी में प्रमुख हो जाने के दूसरे उदाहरण चिराग हैं. इससे पहले समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव की जगह ली थी. हालांकि चिराग कह चुके हैं कि वो पारिवारिक पृष्ठभूमि से ज़रूर आते हैं, लेकिन आखिर में लोगों ने ही उन्हें अपना नेता चुना है क्यों​कि लोगों की सह​मति के बगैर आप बने नहीं रह सकते.

बॉलीवुड में किस्मत आज़मा चुके चिराग
साल 2011 में फिल्म मिले ना मिले हम रिलीज़ हुई थी, जिसमें कंगना रनौत के साथ चिराग बतौर हीरो नज़र आए थे. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म के बुरी तरह पिट जाने के बाद चिराग का बॉलीवुड करियर तो खत्म हो गया लेकिन उसके बाद चुनाव में बतौर बॉलीवुड स्टार उन्होंने अपने पिता के लिए चुनाव प्रचार ज़रूर किया था. तब ये भी कहा गया था कि 'फिल्म भले पिट गई हो, लेकिन राजनीति तो चिराग के खून में है ही.'

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कंगना रनौत और सागरिका घाटगे के साथ चिराग की फिल्म का यूट्यूब पोस्टर.


2013 और 2014 में वही समय था, जब चिराग बॉलीवुड छोड़कर बिहार की राजनीति में सक्रिय तौर कूद रहे थे और दूसरी तरफ, लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटे तेजप्रताप और तेजस्वी भी क्षेत्रीय राजनीति में अपना करियर शुरू कर रहे थे. बीत छह सात सालों में ये साफ है कि चिराग आगे निकल चुके हैं. हालांकि उनकी कुछ फिल्में रिलीज़ नहीं हो सकी थीं, लेकिन दो बार सांसद की रेस जीतकर पार्टी अध्यक्ष का रुतबा भी उनके खाते में है.

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और ऐसी है चिराग की पर्सनल लाइफ
अपने पिता रामविलास पासवान की दूसरी पत्नी की संतान चिराग की तीन बहनें हैं. 2019 आम चुनाव के दौरान जो शपथ ​पत्र चिराग ने भरा था, उसके मुताबिक उनकी शादी नहीं हुई है और वो पटना में स्थायी रूप से रहते हैं. राजनीति के साथ ही, चिराग एनजीओ से भी जुड़े रहे हैं. बच्चों की शिक्षा के लिए वो चिराग पासवान फाउंडेशन नाम का एनजीओ चलाते रहे. इसके अलावा, 'चिराग का रोजगार' नाम से भी उनका एक एनजीओ है.

मोदी के प्रशंसक लेकिन 'आत्मनिर्भर' भी
चिराग खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रशंसक बता चुके हैं और कह चुके हैं कि वो मोदी के गुजरात मॉडल से काफी प्रभावित रहे थे इसलिए उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन में जाने का मन भी बनाया था. चिराग गुजरात की तरह ही बिहार के विकास का नज़रिया भी रखते हैं लेकिन वो हर हाल में बीजेपी के साथी नहीं हैं. झारखंड चुनावों में उन्होंने बीजेपी के खिलाफ जाकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था क्योंकि सीटों को लेकर सहमति नहीं बनी थी और चिराग के मुताबिक उनकी एलजेपी अब छोटी नहीं बल्कि आत्मनिर्भर पार्टी है.
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