कोरोना वायरस : कैसे चपेट में आया यूरोप? सिंगापुर से कैसे ले सकता था सबक?

कोरोना वायरस : कैसे चपेट में आया यूरोप? सिंगापुर से कैसे ले सकता था सबक?
कोरोना वायरस इस समय दुनिया में तेजी से फैल रहा है.

किसी भी आपदा से निपटने के लिए सबसे ज़रूरी दो चीज़ें होती हैं : पहली आपका रवैया कितना सकारात्मक है और दूसरी आपके पास दूरदृष्टि कितनी है. इन दोनों मोर्चों पर यूरोप के कई देश नाकाम साबित हुए और कोविड 19 संक्रमण की चपेट में बुरी तरह आ गए. जानें काफी हद तक कैसे बचा जा सकता था.

  • News18India
  • Last Updated: March 27, 2020, 2:52 PM IST
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पूरी दुनिया को हिलाकर रख देने वाले कोरोना वायरस (Corona Virus) के प्रकोप के कारण एक तरफ तो ऑस्ट्रिया (Austria) जैसे यूरोप (Europe) के कथित विकसित और आज़ाद देश हैं, जिन्होंने अपने नागरिकों को घरों में बंद (Lockdown) कर दिया है और दूसरी तरफ सिंगापुर (Singapore) जैसे एशियन देश (Asia) भी हैं, जहां पिछले कुछ हफ्तों में लोग तुलनात्मक रूप से ज़्यादा आज़ाद हैं. ऐसा क्यों और कैसे मुमकिन हुआ?

चीन (China) के साथ सीधे भौगोलिक और आर्थिक संबंधों के बावजूद सिंगापुर ने कोरोना वायरस के प्रभाव (Covid 19) को कम से कम रखने में सफलता दिखाई. यूरोप के देश चाहते तो इससे सबक ले सकते थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आइए समझें कि आखिर ऐसा क्यों नहीं हुआ और सिंगापुर ने ये बाज़ी कैसे जीत ली.

सिंगापुर आ सकता था चपेट में
दुनिया भर के नागरिकों का शहर कहलाने वाला घना बसा यह छोटा सा राज्य चीन का पड़ोसी होने के बावजूद कोविड 19 पर एक तरह से जीत दर्ज करने वाला देश बनकर उभरा. अब तक सिंगापुर में 400 से कुछ ही ज़्यादा संक्रमण मामले सामने आए और सिर्फ दो मौतों की खबर. लेकिन आप समझ सकते हैं कि चीन के बहुत करीब और अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए मशहूर इस देश में कितना प्रभाव हो सकता था.



1. पहल करना साबित हुआ कारगर


अपनी आर्थिक स्थितियों की चिंता को दूसरे स्थान पर रखकर सिंगापुर ने 1 फरवरी को ही यात्रा प्रतिबंध लागू कर दिए थे, जो उस समय डब्ल्यूएचओ की सलाह के विपरीत थे. तब डब्ल्यूएचओ ने कहा था कि यात्रा प्रतिबंधों की उस वक्त ज़रूरत नहीं थी, लेकिन सिंगापुर ने दूर की सोच का परिचय देकर पहल की.

2. दूरदृष्टि वाले कुछ और कदम
डब्ल्यूएचओ की सलाह से अलग यात्रा प्रतिबंध के बावजूद सिंगापुर में फरवरी के मध्य तक 80 से ज़्यादा संक्रमण मामले सामने आ चुके थे, जो चीन के बाहर उस समय सबसे ज़्यादा थे. ऐसे में सिंगापुर ने तुरंत मरीज़ों को आइसोलेट किया और जिस भी व्यक्ति में फ्लू या निमोनिया के लक्षण थे, उसकी जांच की गई.

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सिंगापुर ने प्रो एक्टिव होकर समय से कारगर कदम उठाकर संक्रमण को काबू करने में सफलता दर्ज की.


3. पुराने अनुभव का फायदा
साल 2003 में सार्स महामारी के समय सिंगापुर ने 'कॉंटैक्ट ट्रैसिंग मेथड' अपनाया था. यानी संक्रमण के शिकार पाए गए लोगों के संपर्क में आए लोगों को पहचानने की प्रणाली और फिर उनकी भी जांच किया जाना. यह कदम इस बार भी बेहद कारगर रहा. कुल मिलाकर तीन बेहतरीन कदम — जल्दी सीमाएं बंद करना, कॉंटैक्ट ट्रैस करना और बड़ी संख्या में जांचें करना, सिंगापुर के लिए बाज़ी मारने वाले कदम साबित हुए.

सिंगापुर में नहीं है सख़्त लॉकडाउन
सिंगापुर ने जिस तरह समय से कदम उठाए, उसी का नतीजा है कि वहां अब जीवन तकरीबन सामान्य है. रेस्तरां, मॉल, स्कूल और दफ्तर इस समय खुले हुए हैं और लोग सतर्कता बरतते हुए सामान्य की तरह ही रोज़मर्रा के काम कर रहे हैं. इसी तरह हांगकांग और ताईवान जैसे छोटे छोटे देशों ने भी चीन के बहुत करीब होने के बावजूद सफलता की कहानियां बयान की हैं.

यूरोप कैसे पिछड़ता चला गया?
ज़्यादातर यूरोपीय देशों के कोरोना वायरस के प्रकोप की चपेट में आ जाने का कारण इन देशों का ढीला और टालमटोली वाला रवैया रहा. दिसंबर 2019 में इन देशों को इस वायरस के बारे में ठीक से खबर हो चुकी थी लेकिन इसके बावजूद यहां इसे सिर्फ 'एशियाई समस्या' कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया. आइए यूरोप की इस त्रासदी को एक एक कर समझें.

1. यूरोप ने कुछ भी ठीक नहीं किया?
सिंगापुर ने जो तीन खास कदम उठाए, उन्हीं तीनों पर यूरोपीय देश पिछड़ गए. न तो समय रहते सीमाएं सील की जा सकीं, न बड़ी संख्या में टेस्ट किए गए और न ही संक्रमण के कॉंटैक्ट ट्रैसिंग को गंभीरता से लिया गया. मसलन ऑस्ट्रिया ने चीन, ईरान और इटली की उड़ानों को 9 मार्च को जाकर प्रतिबंधित किया. अस्ल में, यूरोपीय देशों ने कड़े कदम इस डर से नहीं उठाए कि उनकी अर्थव्यवस्था को ज़ोर को झटका न लग जाए.

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यूरोपीय देशों ने समय रहते सख़्त और ज़रूरी कदम नहीं उठाए.


2. संक्रमण की चेन न पहचानना गलती
यूरोपीय देशों की सबसे बड़ी गलती यही कही जा सकती है. वैश्विक आपदा के समय में सिंगापुर ने जिस तरह कॉंटैक्ट ट्रैसिंग के ज़रिए संक्रमण पर काबू पाने की तरकीब अपनाई, यूरोप में इस प्रणाली को सोचा भी नहीं जा सका. दूसरी तरफ, युद्ध के बाद जैसे सख्त प्रतिबंध यूरोप में लगा दिए गए. बजाय इसके कि संक्रमितों को पहचान कर उन्हें आइसोलेट किया जाता, हुआ ये कि सेमी आइसोलेशन की अप्रभावी तस्वीर सामने आई. यूरोप में अब तक किसी को ये नहीं पता कि कौन संक्रमित है, कौन नहीं क्योंकि संक्रमण की चेन को पहचानने की कोशिश ही नहीं हुई.

3. कैसे फैला यूरोप में संक्रमण?
इशग्ल के स्की रिसॉर्ट ने आइसलैंड के सभी संक्रमित पर्यटकों को लेकर कदम उठाने में पूरे 8 दिन लगाए. वहां गतिविधियां भी तत्काल बंद नहीं की गईं और वहां पहुंचे सभी मेहमानों को बगैर जांच के आगे जाने दिया गया और पूरा महाद्वीप संक्रमण की चपेट में आ गया. यूरोपीय देशों की सरकारों ने समय बहुत ज़ाया किया. मेडिकल स्टाफ के पास पर्याप्त टेस्टिंग की सुविधाएं नहीं रहीं. साथ ही, जांच के दौरान संक्रमण के आशंकित व्यक्तियों को क्वारैन्टीन करने के बजाय टेस्ट रिपोर्ट का इंतज़ार करने के लिए छोड़ दिया गया.

यूरोप ही नहीं, सबको लेने चाहिए सबक
सिंगापुर जैसे कुछ देशों से यूरोप तो ये सबक ले ही सकता था, भारत समेत कई देश भी सतर्क हो सकते थे. पहला तो ये कि संक्रमण फैलने का इंतज़ार न करते हुए प्रो एक्टिव होकर सीमाएं बंद की जा सकती थीं. एयरपोर्ट पर ही टेस्टिंग की सख्त व्यवस्था हो सकती थी. अर्थव्यवस्था को तरजीह न देते हुए नागरिकों की जान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी. अगर किसी देश के पास सार्स का अनुभव नहीं था, तो अनुभवी देशों से प्रणाली समझने और उस पर अमल करने की ज़रूरत थी.

जहां कोरोना वायरस का भयंकर प्रकोप है, वहां सिर्फ स्वास्थ्य सेक्टर की समस्याएं ही नहीं, बल्कि प्रबंधन की समस्याएं ज़्यादा सामने आई हैं. सिंगापुर से यूरोप को सबक लेने संबंधी यह लेख डीडब्ल्यू पोर्टल ने प्रकाशित किया है और इसमें ऑस्ट्रिया की पत्रकार क्रिस्टीना ज़ूर नेडेन ने लिखा है कि हमारे नेताओं को हमारे स्वास्थ्य और आज़ादी दोनों को सुरक्षित करना था, लेकिन जांच होना चाहिए कि वो कैसे नाकाम हुए.

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