जन्मदिन : शाहजहां की वो बेटी, जो थी दुनिया की सबसे अमीर शहजादी

जहांआरा की एक पेंटिंग

जहांआरा की एक पेंटिंग

अंग्रेज़ हैरान होते थे कि मुगल महिलाएं (Mughal Women) प्रशासन से व्यापार तक कितनी प्रभावशाली थीं क्योंकि उस वक्त ब्रिटेन में महिलाओं (British Women) के पास इतने अधिकार नहीं थे. 'पादशाह बेगम' की अकूत संपत्ति तो अब तक सबको हैरान करती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2021, 7:54 AM IST
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सिर्फ 14 साल की उम्र से ही जहांआरा (Jahan Ara) की दिलचस्पी शासन में थी और वह अपने पिता यानी मुगल बादशाह शाहजहां (Mughal Emperor Shah Jahan) के काम में हाथ बंटाया करती थी. तब उसे नहीं मालूम था कि कुछ ही साल बाद उसे बड़ी ज़िम्मेदारी मिलेगी और वह 'पादशाह बेग़म' या 'बेग़म साहब' (Beghum Sahib) कहलाएगी. कहा जाता है कि शाहजहां की बेटी जहांआरा मुगल साम्राज्य में उन गिनी चुनी महिलाओं में शुमार है, जो वर्चस्व तक पहुंचीं. वहीं जहांआरा मुगल सल्तनत (Mughal Empire) ही नहीं बल्कि दुनिया भर की उन रानियों में रही, जो बेपनाह दौलत की मालिक थीं.

मुगल दौर में गुलबदन बेगम, नूरजहां, मुमताज महल, जहांआरा, रोशनआरा और ज़ेबुन्निसा के नाम प्रभावशाली महिलाओं के तौर पर लिये जाते हैं, लेकिन इनमें से किसी का भी मरतबा जहांआरा के आसपास का भी नहीं था. नूरजहां और मुमताज़ महल तो मल्लिका रहीं लेकिन बाकी किसी की हैसियत जहाँआरा के मुकाबले काफी कम दिखती है.

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शाहजहां की बेटी जहांआरा को भारत ही नहीं दुनिया के इतिहास की सबसे अमीर प्रिंसेस में शुमार किया जाता है.

जब जहाँआरा की मां यानी मुमताज़ महल की मौत हुई थी, तब उनके पिता इस कदर दुखी थे कि 17 साल की उम्र में ही मुगल साम्राज्य के हरम का भार जहांआरा को संभालना पड़ा. महबूब-उर-रहमान कलीम अपनी किताब 'जहांआरा' में लिखते हैं कि 'मुमताज महल की मौत के बाद बादशाह ने शोक वाला काला लिबास पहन लिया था', लेकिन कुछ अन्य इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं रहे.

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लिबास काला रहा हो या सफ़ेद, यह फैक्ट है कि शाहजहां ने उस स्थिति में महल के मामले अपनी किसी और म​ल्लिका के बजाय बेटी को सौंपे थे. जहांआरा को पादशाह बेगम बनाकर उनके सालाना वजीफ़े में चार लाख रुपये का इज़ाफ़ा किया गया था. लेकिन जहांआरा की संपत्ति का अंदाज़ा इससे मत लगाइए. उनकी जागीर का लेखा जोखा बहुत बड़ा रहा.



'डॉटर ऑफ़ द सन' की लेखिका, इतिहासकार एरा मख़ोती की मानें तो 'जब पश्चिमी पर्यटक भारत आते तो मुगल महिलाओं का प्रभाव देखकर हैरान होते थे. उस समय ब्रिटिश महिलाओं के पास इतने अधिकार नहीं थे. वो इसलिए भी हैरान होते थे कि मुगल महिला व्यापार के संबंध में भी निर्देश दिया करती थी.'

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मुगलकाल में जनजीवन दर्शाती एक पेंटिंग


मुगल साम्राज्य में महल, प्रशासन और व्यापार संभालने वाली जहांआरा के पास कई जागीरें थीं. उनकी मां की मौत के बाद सारी संपत्ति का आधा हिस्सा जहांआरा को सौंपा गया था और बाकी आधा बाकी बच्चों को दिया गया था. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर एम. वसीम राजा जहांआरा की दौलत के बारे में इस तरह बताते हैं :

जब उन्हें पादशाह बेगम बनाया गया, तो उस दिन एक लाख अशर्फियां, चार लाख रुपये और चार लाख रुपये सालाना की ग्रांट दी गई. बाग जहाँआरा, बाग नूर और बाग सफा उनके सुपुर्द किए गए. अछल, फरजहरा और बाछोल, सफापुर, दोहारा की सरकारें और पानीपत का परगना उन्हें दिया गया. सूरत का शहर भी उन्हें दिया गया, जहां उनके जहाज़ चलते थे और अंग्रेजों के साथ व्यापार होता था...


निज़ाम हैदराबाद की सल्तनत में पुरातत्व निदेशक जी. यज़दानी ने 1913 के शोधपत्र में लिखा कि 'नवरोज़ पर जहांआरा को 20 लाख के आभूषण और जवाहरात तोहफ़े में दिए गए थे... एतदाल शबो रोज़ (दिन और रात बराबर होने की तारीख) का जश्न शुक्रवार को होता था. तब जहांआरा ने 1637 को बादशाह को ढाई लाख का अष्टकोणीय सिंहासन तोहफ़े में दिया था.'

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इस बीच आपको बताएं कि एक बड़ी दुर्घटना में जहांआरा आग की चपेट में आ गई थीं. आठ महीने बाद जब वो ठीक हुईं तो उनके स्वस्थ होने का जश्न आठ दिनों तक मनाया गया. यज़दानी के मुताबिक उन्हें सोने में तोला गया और वो सोना गरीबों में बांटा गया. हर दिन उन्हें तोहफ़े और संपत्ति दी गई. मोती, रुपये, कंगन, हीरे जवाहरात, सूरत का बंदरगाह वगैरह से आठ दिनों तक जहांआरा को नवाज़ा जाता रहा.

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मुगल बादशाह शाहजहां की पेंटिंग


यही नहीं, जहांआरा की बला उतारने के लिए गरीबों और लोगों में भारी भरकम खैरात बांटी गई. जहांआरा का इलाज करने वाले हकीम और सेवा करने वाले गुलामों को भी मालामाल कर दिया गया था. दौलत के अलावा भी, जहांआरा के जीवन में बहुत कुछ दिलचस्प रहा.

जहांआरा की हमदर्दी दारा शिकोह के प्रति थी, फिर भी विजयी औरंगज़ेब और मुराद से मिलकर उसने चारों भाइयों को मिलजुलकर साम्राज्य शांतिपूर्वक रखने की कोशिश की थी, लेकिन कोशिश रंग नहीं लाई. औरंगज़ेब की कैद में शाहजहां की सेवा जहांआरा ने की थी. शायरी भी करने वाली जहांआरा अपने आखिरी वक्त में लाहौर के संत मियाँ पीर की शागिर्द हुई थीं. 1681 में करीब 67 साल की उम्र में जहांआरा की मौत हुई थी.
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