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हरियाणा चुनाव नतीजे: ऐसे बंटे वोट, सियासत तय करते हैं ये फैक्टर

News18Hindi
Updated: October 25, 2019, 8:14 AM IST
हरियाणा चुनाव नतीजे: ऐसे बंटे वोट, सियासत तय करते हैं ये फैक्टर
न्यूज़18 क्रिएटिव

Haryana Election Result 2019: जानिए क्या गठबंधन की सरकार (Coalition Government) हरियाणा (Haryana) के हित में होगी और क्यों राज्य के मुद्दे आखिरकार पीछे छूट गए.

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  • Last Updated: October 25, 2019, 8:14 AM IST
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हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे (Assembly Election Result 2019) स्पष्ट हो रहे हैं और राज्य में किसी भी एक पार्टी को साफ बहुमत (Majority) मिलने की संभावना न के बराबर है. ऐसे में साफ है कि गठबंधन के ​बगैर सरकार (Coalition Government) नहीं बनेगी. पहला सवाल तो यह है कि ऐसी स्थिति बनी क्यों और दूसरा सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या राज्य में जोड़ तोड़ वाली सरकार चल पाएगी? प्रदेश की राजनीति (Haryana Politics) के अतीत पर एक नज़र डालें तो बहुत सी बातें साफ होती नज़र आती हैं.

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हरियाणा में वोट बैंक (Vote Bank) किस तरह बने और उन्हें किस तरह भुनाया जाता रहा? इस तरह की राजनीति के कारण और असर क्या रहे? और क्या जोड़ तोड़ वाली सरकारें हरियाणा के हित में रहीं? इन तमाम सवालों के जवाब उन फैक्टरों में छुपे हैं, जो हरियाणा की सियासत में हमेशा अहम रहे हैं. शोध गंगा में छपे एक विस्तृत लेख 'बैकग्राउंड टू पॉलिटिक्स इन हरियाणा' में इन फैक्टरों के ज़रिए राज्य के राजनीतिक माहौल को बारीकी से समझा गया है.

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जातिवाद और क्षेत्रीयता
हरियाणा की राजनीति में जातिवाद फैक्टर सबसे बड़ा रहा है. इस मामले में ये भी समझना महत्वपूर्ण है कि जातियों के भीतर भी कई तहें हैं और उप जातियों तक को चुनाव के दौरान तरजीह दी जाती रही है. अहीर, ब्राह्मण, जाट और अनुसूचित जाति के साथ ही क्षेत्रीयता का फैक्टर भी राज्य में चलता रहा है. विधानसभा चुनाव 2014 के बाद मुख्यमंत्री बने मनोहरलाल खट्टर को भी तब करनाल सीट से चुनाव लड़ने के समय विरोधी प्रत्याशी दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने 'बाहरी' करार दिया था.

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गुरुवार शाम पांच बजे तक स्पष्ट हुए रुझान.

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किसान और गैर किसान
राज्य में सियासी खेमों और वोटरों के बीच एक बड़ा बंटवारा है किसान और गैर किसान बैकग्राउंड का. पंजाब से अलग होकर बना राज्य हरियाणा शुरू से ही खेती किसानी पर आधारित रहा और यही उसके वाणिज्य का प्रमुख स्रोत भी रहा. आधुनिक भारत में हरियाणा के कुछ इलाके उद्योग आधारित हुए तो राज्य दो हिस्सों में बंट गया. किसान वर्ग और गैर किसान या उद्योग सम​र्थक वर्ग के बीच एक बड़ी गहरी खाई बन चुकी है, जिसके नाम पर वोटों की खेती होती रही है.

दलबदल की परंपरा
हरियाणा राज्य में दलबदल का अक्सर दोहराया जाने वाला इतिहास रहा है. 1979 में हरियाणा में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था. जनता पार्टी से जुड़े चौधरी देवीलाल की हरियाणा में सरकार थी, लेकिन राजनीतिक संकट था. ऐसे में राज्य सरकार में मंत्री रहे भजनलाल ने न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी हथिया ली थी, बल्कि पार्टियों और विधायकों की ऐसी उठापटक की थी, जो इतिहास बन गई. हुआ ये कि कांग्रेस ने दलबदल करने वालों को मुख्यमंत्री तक का पद दिया और यहीं से राज्य में अनैतिक राजनीति भी शुरू हुई थी.

गठबंधन नहीं चलता
हरियाणा की राजनीति का इतिहास देखा जाए तो साफ कहा जा सकता है कि विकास और प्रशासन के नज़रिए से तब कुछ बेहतर स्थिति बनी है जब एक स्थिर सरकार बनी है. गठबंधन या जोड़ तोड़ वाली सरकारें बनने की स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता और लचर प्रशासन जैसे हालात साफ दिखाई दिए हैं.

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मुद्दों की राजनीति नहीं?
हरियाणा की राजनीति के इन तमाम फैक्टरों के चलते अक्सर यही होता रहा है कि राज्य के मूलभूत मुद्दे कभी मुख्यधारा में नहीं रहे. पार्टी नहीं बल्कि प्रत्याशी के धर्म, जाति, समुदाय और ऐसे ही आधारों पर जीतने हारने के सिलसिले के बीच विकास से जुड़े मुद्दे राज्य में कम ही तवज्जो पा सके. हालिया चुनाव में भी कश्मीर और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे चुनावी भाषणों में सुनाई दिए, लेकिन राज्य में बढ़ी बेरोज़गारी जैसे ज़मीन से जुड़े मुद्दे पूरी तरह भुला दिए गए. ताज़ा नतीजे सामने आने के बाद कई जानकार इन स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं.

आखिरकार कहा जा सकता है कि जातियों, उप जातियों और समुदायों में बंटने के कारण हरियाणा की राजनीति का असर ये हुआ है कि कई तरह के छोटे छोटे धड़े बन गए हैं और इनके हितों के चक्कर में राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा और कार्यक्रम दरकिनार होते रहे हैं. जानकार मानते हैं कि अगर हरियाणा को विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो राज्य में एक स्थिर सरकार का होना ज़रूरी है.

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First published: October 25, 2019, 7:19 AM IST
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