भारत में एड्स का पहला मरीज़ कौन था और कैसे मिला था?

भारत में एड्स (AIDS in India) का इतिहास तीन दशक से ज़्यादा का हो चुका है और आंकड़े गवाही (HIV Statistics) दे रहे हैं कि अब भी ये बीमारी (Epidemic) देश के लिए एक चुनौती बनी हुई है.

News18Hindi
Updated: September 8, 2019, 4:53 PM IST
भारत में एड्स का पहला मरीज़ कौन था और कैसे मिला था?
एड्स के प्रति जागरूकता के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कार्यक्रम लगातार जारी हैं.
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बिहार (Bihar) में स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी के आंकड़ों के हवाले से खबर आई है कि पिछले एक साल में 1.38 लाख युवाओं की जांच की गई, जिनमें से 1050 को एचआईवी पॉज़िटिव (HIV Positive) पाया गया. यह आंकड़ा वाकई चिंताजनक है कि एक राज्य के युवाओं को यह लाइलाज बीमारी अपनी चपेट में ले रही है. उत्तर पूर्व (North East) के राज्यों में इस बीमारी के आंकड़े पहले भी चिंताजनक रहे हैं. ताज़ा आंकड़ों (Fresh Statistics) की भी बात करेंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत (India) में सबसे पहले कब और कैसे एड्स मरीज़ (First Case of HIV) का पता चला था?

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फिलहाल भारत में 21.40 लाख से ज़्यादा एड्स मरीज़ (AIDS Patients) दर्ज हैं लेकिन यूएनएड्स के एक अनुमान के मुताबिक भारत में एड्स पीड़ितों की संख्या 30 लाख तक होना मुमकिन है. हालांकि पिछले कुछ सालों में एड्स के प्रति जागरूकता अभियानों (Awareness Programs) के ​चलते इस संक्रमण (Infection) पर कुछ हद तक काबू पाया गया है लेकिन बिहार से इस तरह की ताज़ा खबर आने का मतलब है कि चुनौतियां अब भी बरकरार हैं. जानिए कि देश में एड्स का सिलसिला (History of AIDS in India) शुरू कैसे हुआ था.

एड्स पर बात करना शर्मनाक था

ये बात 1980 के दशक की है जब अमेरिका में पहली बार इस तरह की बीमारी की आधिकारिक टेस्टिंग व्यवस्था पहली बार शुरू हुई थी. इस खबर ने जल्द ही भारत समेत पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था. खून के सैंपल की जांच से किसी व्यक्ति को एड्स होने का पता लगाया जा सकता था. उस समय भारत के कई राज्य पर्यटन के नक्शे पर उभर रहे थे. दक्षिणी राज्यों से बड़ी संख्या में लोग मध्य पूर्व और अफ्रीका के देशों में रोज़गार व कारोबार के लिए जाने लगे थे.

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डॉ. सुनीति सोलोमन ने एड्स संबंधी शोधों के बाद एड्स के उपचार केंद्र और पीड़ितों की सेवा के लिए जीवन समर्पित किया था.

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कारोबारी और पर्यटन के कारणों के चलते मध्य पूर्व और अफ्रीका के देशों के कई लोग बड़ी संख्या में भारत आने लगे थे. ऐसे वक्त में जब अमेरिका से एड्स पर हो रहे शोधों को लेकर खबरें आईं तब तमिलनाडु में दो महिला डॉक्टरों ने इस बीमारी का खतरा पता लगाने का बीड़ा उठाया था. ये वो समय था जब सुरक्षित यौन संबंधों और इससे जुड़ी बीमारियों के बारे में लोग बात करने में शर्म महसूस करते थे और जो बात करे उसे बेशर्म तक कहा जाता था.

टीचर और स्टूडेंट ने किए पहले खुलासे
डॉक्टर और माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट सुनीति सोलोमन ने विदेशों में लंबे समय तक प्रशिक्षण और सेवाओं के बाद भारत लौटने का फैसला किया और मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर बनीं. 1981 से ही सुनीति एड्स को लेकर हो रहे शोधों से लगातार जुड़ी हुई थीं. एचआईवी की खोज और तकनीकें आ जाने के बाद 1986 में सुनीति ने अपनी स्टूडेंट डॉक्टर सेल्लप्पन निर्मला के साथ मिलकर भारत में एड्स का खतरा जानने का सफर शुरू किया.

दोनों ने मिलकर 1986 में चेन्नई की सेक्स वर्कर महिलाओं की बस्तियों से करीब 200 ब्लड सैंपल इकट्ठे किए. उस वक्त एड्स या एचआईवी की जांच हर जगह मुमकिन नहीं थी इसलिए सैंपल को वेल्लूर प्रयोगशाला भिजवाकर जांच करवाई तो सौ में से 6 सैंपल में एचआईवी की पुष्टि हुई. लेकिन, सुनीति इस टेस्ट को निश्चित करना चाहती थीं इसलिए उन्होंने ये सैंपल अमेरिका की जॉन होपकिन्स यूनिवर्सिटी की लैब तक पहुंचवाए और जांच में एचआईवी की पुष्टि हुई.

पीएम तक पहुंची थी खबर
ये भारत का वो दस्तावेज़ी वाकया है, जहां देश में पहली बार एड्स मरीज़ मिलने का इतिहास मिलता है. इसके बाद हुआ ये था कि एचआईवी के मरीज़ों के बारे में मेडिकल रिसर्च काउंसिल को सूचना दी गई और उसके ज़रिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक सूचना पहुंची. इसके बाद अगले कुछ ही सालों में एड्स भारत में बड़ी बीमारी के रूप में फैलने वाला संक्रमण पाया गया. 90 के दशक के आधे बीत जाने के बाद देशव्यापी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम शुरू हुए.

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अब ये हैं ताज़ा हालात
देखा जाए तो पिछले एक दशक में आंकड़े या कुल संख्या के मामले में एड्स का संक्रमण फैलने की रफ्तार कम हुई है लेकिन मरीज़ों के बढ़ने और दुनिया के कुल मरीज़ों की तुलना में भारत के मरीज़ों के आंकड़े बताते हैं कि चुनौतियां अभी कम नहीं हैं. 21 से 22 लाख के बीच कुल एड्स मरीज़ भारत में हैं लेकिन यूएनएड्स की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक साल में करीब 88 हज़ार मरीज़ नए पाए गए. अनुमान ये भी है कि नए मरीज़ों की संख्या 1 लाख 20 हज़ार तक भी हो सकती है.

इस आंकड़े को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि 2018 की इस रिपोर्ट के मुताबिक एक साल में 69 हज़ार मौतें एड्स संबंधी कारणों से हुईं. यानी जितनी मौतें हर साल एड्स से हो रही हैं, तकरीबन उतने ही नए मरीज़ भी जुड़ रहे हैं. इसी तरह, दुनिया के एड्स मरीज़ों की कुल संख्या की तकरीबन 10 फीसदी आबादी भारत में है. इंडेक्समंडी पोर्टल की मानें तो एड्स के सबसे ज़्यादा मरीज़ों वाले देशों की सूची में दक्षिण अफ्रीका और नाइजीरिया के बाद भारत तीसरे नंबर पर है.

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First published: September 8, 2019, 3:17 PM IST
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