कैसे तय हुआ इंडियन स्टैंडर्ड टाइम और क्यों रहे विवाद?

1947 में आज़ादी (Independence) मिलने के बाद आज ही के दिन इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (Indian Standard Time) ज़ोन की व्यवस्था अपनाई गई थी. जानिए कि इससे पहले क्या व्यवस्था थी और इससे जुड़ी क्या मांगें उठती रहीं.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: September 1, 2019, 7:21 PM IST
कैसे तय हुआ इंडियन स्टैंडर्ड टाइम और क्यों रहे विवाद?
जानें भारत में टाइम ज़ोन की कहानी.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: September 1, 2019, 7:21 PM IST
मैं समय हूं... हमेशा से हूं और हमेशा के लिए. जगहों के हिसाब से सबको अलग-अलग समझ में आता रहा. किसी ने मुझे समझने के लिए सूरज की तरफ देखा, तो किसी ने चांद (Solar & Lunar Calendars) तो किसी ने तारों की तरफ. धूप छांव, दिन रात की चाल से मुझे समझने की कोशिश की जाती रही. भारत (India) ने सदियों पहले से ये कोशिश शुरू की थी और फिर तकरीबन दो सदी पहले ब्रिटिश राज (British India) में भारत को एक व्यवस्था मिली और इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (IST) जैसा शब्द सामने आया. इससे पहले बम्बई (Bombay), मद्रास (Madras) और कलकत्ता (Calcutta) के टाइम ज़ोन (Time Zones) प्रचलित थे. आइए, मुझे समझने की इस पूरी व्यवस्था को ठीक से समझिए.

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इंडियन स्टैंडर्ड टाइम
भारत को आज़ादी (Independence of India) मिली, तो 1 सितंबर 1947 को पूरे देश के लिए एक समय ज़ोन चुना गया, जिसे आईएसटी कहा गया. यह दुनिया के कॉर्डिनेटेड समय (यानी UTC) के हिसाब से +05:30 माना गया यानी साढ़े पांच घंटे आगे वाला टाइम ज़ोन. जब ये तय हुआ तो एक समस्या पैदा हुई कि पूर्व से पश्चिम तक भारत (East To West) की सीमा करीब 2933 किलोमीटर की थी, तो एक टाइम ज़ोन कैसे संभव होगा? मैं समय हूं तो असम (Assam) और कच्छ (Kutch) में मेरी समानता कैसे होगी? इसे लेकर चर्चाएं होती रहीं, जिन पर चर्चा करेंगे, लेकिन पहले ये जानें कि आईएसटी कैसे तय हुआ.

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बॉम्बे टाइम
आज़ादी से पहले भारत में मुझे दो ज़ोन के हिसाब से समझा जाता था, जिनमें से एक था बॉम्बे टाइम ज़ोन. अंग्रेज़ों ने 1884 में इस टाइम ज़ोन को तय किया था जब अमेरिका में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेरे ज़ोन तय किए जाने वाली बैठक हुई थी. ग्रीनविच मीनटाइम यानी जीएमटी से चार घंटे 51 मिनट आगे का टाइम ज़ोन बॉम्बे टाइम था. फिर 1906 में जब आईएसटी का प्रस्ताव ब्रिटिश राज में ही आया, तब बॉम्बे टाइम की व्यवस्था को बचाने के लिए फिरोज़शाह मेहता ने पुरज़ोर वकालत थी और बॉम्बे टाइम की कहानी बची रही.
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कलकत्ता टाइम
साल 1884 वाली बैठक में ही भारत में मेरे दो ज़ोन तय किए गए थे, जिनमें से एक था कलकत्ता टाइम था. जीएमटी से 5 घंटे 30 मिनट और 21 सेकंड आगे के टाइम ज़ोन को कलकत्ता टाइम माना गया था. 1906 में आईएसटी का प्रस्ताव जब नाकाम रहा, तो कलकत्ता टाइम भी चलता रहा. कहते हैं कि अंग्रेज़ खगोलीय और भौगोलिक घटनाओं के दस्तावेज़ीकरण में कलकत्ता टाइम का ही इस्तेमाल करते थे. मैं समय हूं और मुझे समझने के लिए बॉम्बे और कलकत्ता टाइम के बहुत पहले से मद्रास टाइम भारत में ज़रिया था.

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पड़ोसी देशों के टाइम ज़ोन की तुलना में भारतीय स्टैंडर्ड टाइम ज़ोन. चित्र विकिपीडिया से साभार.


मद्रास टाइम
भारत में ब्रितानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पहले खगोलशास्त्री जॉन गोल्डिंघम ने 1802 में मद्रास टाइम ज़ोन की व्यवस्था बनाई थी. जीएमटी से 5 घंटे 21 मिनट और 14 सेकंड के आगे वाले इस टाइम ज़ोन को बाद में ​रेलवे ने भी अपनाया था तो इसे रेलवे टाइम भी कहा जाने लगा था. बॉम्बे और कलकत्ता टाइम ज़ोन के बावजूद रेलवे ने इसे अपनाया था. हालांकि 1884 के बाद से इसकी वैधता खत्म हो चुकी थी.

फिर जब 1947 में आईएसटी की व्यवस्था हुई तो मद्रास में बनी नक्षत्रशाला का प्रयागराज ज़िले में तबादला किया गया और भारत ने पूरे देश के लिए मेरा एक तरह से एकीकरण कर दिया. लेकिन, देश की फैली सीमाओं में मुझे एक जैसा समझने में दिक्कत हुई तो क्या हुआ?

टाइम ज़ोन ​विवाद
भारत में दो या दो से ज़्यादा टाइम ज़ोन की चर्चा हर वक्त हुआ करती थी लेकिन चीन की तरह फैली सीमाओं के बावजूद भारत ने भी एक ही टाइम ज़ोन रखने पर ज़ोर दिया. 80 के दशक में शोधकर्ताओं ने जब दो टाइम ज़ोन का प्रस्ताव रखा तो कहा गया कि इससे ब्रिटिश राज की व्यवस्था लौटेगी. फिर 2004 में भी सरकार ने इस तरह की व्यवस्था को नकारा. उधर, जहानु बरुआ जैसे असम के कलाकार और तरुण गोगोई जैसे नेता उत्तर पूर्व भारत के लिए अलग टाइम ज़ोन की मांग अक्सर करते रहे.

विज्ञान कहता है कि गुजरात के कच्छ के रण में और उत्तरपूर्वी सीमा के किसी असमिया इलाके में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में दो घंटे से ज़्यादा का अंतर रहता है. मैं समय हूं और मेरे निर्धारण के लिए संभवत: इस तरह की मांग उठती रहेगी और हो सकता है कि अब तक नकारी गई डेलाइट सेविंग टाइम यानी डीएसटी जैसी व्यवस्था भी भारत में कभी देखने को मिले.

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First published: September 1, 2019, 5:18 PM IST
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