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'न्यू नॉर्मल' के तहत कैसी होगी पोस्ट कोविड ट्रेन? कितना विश्वास करेंगे यात्री?

भारतीय रेल के बनाए कोविड आइसोलशन कोच में से सिर्फ 20 फीसदी का ही हुआ कोरोना मरीजों के लिए इस्‍तेमाल.

भारतीय रेल के बनाए कोविड आइसोलशन कोच में से सिर्फ 20 फीसदी का ही हुआ कोरोना मरीजों के लिए इस्‍तेमाल.

आगामी 12 सितंबर से 80 नई ट्रेनें शुरू करने जा रहा रेलवे इनके रिज़र्वेशन (Railway Reservation) 10 सितंबर से शुरू करेगा. 15 बड़े राज्यों के बीच मुख्यत: ये ट्रेनें शुरू होंगी, लेकिन सफर पहले की तरह नहीं रहने वाला है. निकट भविष्य में ट्रेनों में यात्री काफी बदलाव देखेंगे लेकिन सवाल यही है कि क्या इस कवायद से रेलवे यात्रियों को फिर खींच सकेगा?

  • News18India
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    Covid-19 से उबरने के बाद ट्रेन का सफर (Train Travelling) कतई पहले की तरह नहीं रह जाएगा. रेलवे एक बहुत बड़े बदलाव की योजना की तरफ विचार कर रहा है. ज़ीरो बेस्ड टाइमटेबल की योजना के हिसाब से 500 नियमित ट्रेनें (Regular Trains) और 10 हज़ार स्टॉपेज खत्म हो जाएंगे. 'न्यू नॉर्मल' के तहत आप ट्रेन से सफर ज़रूरत के चलते ही कर सकेंगे. जिन ट्रेनों में 50 फीसदी सीटें खाली रहेंगी, उन्हें बंद कर दिया जाएगा. यही नहीं, ट्रेन के सफर के दौरान यात्रियों (Rail Passengers) को कई तरह के बदलावों को 'न्यू नॉर्मल' समझना होगा. वो क्या होंगे?

    ज़ीरो बेस्ड योजना के मुताबिक 200 किमी के पहले कोई स्टॉपेज बमुश्किल ही हो पाएगा. यात्री गाड़ियों की स्पीड करीब 10 फीसदी तक बढ़ने की उम्मीद है जबकि विशेष कॉरिडोर में 15 फीसदी नई ट्रेनें चलने की. कोरोना वायरस महामारी के दौरान 12 मई से रेलवे ने ट्रेनों का सफर क्रमबद्ध ढंग से शुरू किया और अब पोस्ट कोविड दौर के लिए एक बड़ी नीति बन रही है.

    चूंकि त्योहारों का मौसम जल्द ही देश भर में आने वाला है इसलिए यात्रियों का लोड और मांग बढ़ेगी. आगामी 12 सितंबर से करीब 80 नई ट्रेनें और शुरू की जा सकती हैं. इससे पहले 230 ट्रेनें पहले ही बहाल हो चुकी हैं. ट्रेनों में चादर, तकिये, कंबल के साथ ही भोजन न मिलने जैसे बदलाव आप देख चुके हैं. अब देखिए कि और क्या क्या बदलने जा रहा है.

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    रेलवे यात्रियों को डिस्पोज़ेबल ब्लैंकेट, तकिए खरीदने की सुविधा देगा.


    क्या होगा पोस्ट कोविड कोच?
    इस विशेष कोच में सभी तरह की सुविधाएं 'हैंड्स फ्री' होंगी. जैसे नल, साबुन, टॉयलेट की कड़ी और फ्लश आदि आपको हाथ से नहीं छूना होगा, बल्कि पैर से दबाना होगा. इसके अलावा, प्लाज़्मा एयर प्यूरीफायर सिस्टम इस कोच में होगा, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज़ से जल्द ही रेलवे लॉंच करने की तैयारी में है. इसी तरह, ऐसे कोचों में कंपार्टमेंटों में लगे दरवाज़ों बांह के सहारे खुलने वाले हैंडल होंगे.

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    जानिए क्या हैं और कई नए फीचर
    चूंकि तांबे में जीवाणु रोधी शक्तियां हैं, इसलिए रेलवे कुछ सतहों पर तांबे की कोटिंग करने के मूड में है ताकि संक्रमण से बचाव हो सके. संक्रमण की गुंजाइश कम से कम रहे और सामाजिक दूरी का पालन ज़्यादा से ज़्यादा हो सके इसलिए रेलवे QR कोड वाले स्कैनिंग डिवाइस के ज़रिये टिकट चेक सिस्टम लॉंच करने जा रहा है. उत्तर मध्य रेलवे ने यह कॉंटैक्टलेस सिस्टम लॉंच कर दिया है.

    बेडिंग और तकिए तो भूल ही जाइए
    कोविड 19 के चलते हुए लॉकडाउन के बाद जबसे रेलवे ने सेवाएं दोबारा शुरू की हैं, तबसे एसी कोचों में दिए जाने वाले बेडरोल और हैंड नैपकिन नहीं दिए जा रहे हैं. अब ट्रेनों में यात्रियों के पास विकल्प होगा कि वो चाहें तो वन टाइम यूज़ वाले डिस्पोज़ेबल ब्लैंकेट, तकिए और शीट स्टेशन पर सस्ते दामों में खरीद सकेंगे. निकट भविष्य में रेलवे पहले की तरह बेडरोल मुहैया कराने के मूड में नहीं है क्योंकि प्रति बेडरोल करीब 50 रुपये तक धुलाई पर खर्च होता है और रेलवे के पास फिलहाल करीब 18 लाख लिनन सेट हैं.

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    और रही बात भोजन की तो...
    मई से दोबारा ट्रेनें शुरू होने के साथ ही रेलवे ने भोजन देना भी बंद किया था. अब भी रेलवे पका हुआ भोजन परोसने के बारे में नहीं बल्कि रेडी टू ईट यानी पैकेज्ड फूड दे पा रही है. और खबरों के मुताबिक आगे भी कुछ समय तक ऐसा ही रहेगा. कुछ रेलवे डिविज़नों में पैकेज्ड फूड मुहैया कराने वाले सप्लायरों के साथ लंबे समय के अनुबंध करने की संभावना भी देखी जा रही है

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    ट्रेनों में रेडी टू ईट फूड ही मिलेगा.


    क्या इन बदलावों से भरोसा लौटेगा?
    कोरोना वायरस की मार झेल रहे देश में लोग ट्रेनों में सफर करने से काफी डरे हुए हैं. अब रेलवे के सामने चुनौती यह है कि वो लोगों का यह भरोसा दिला सके कि ट्रेनें उनके लिए सुरक्षित होंगी. इस चिंता के मामले में ईवाय इंडिया के पार्टनर राजाजी मेश्राम के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि सफर करने के बर्ताव और कारण अब पूरी तरह से अलग हो चुके हैं, जिसका असर रेलवे पर भी होगा.

    हालांकि मेश्राम मानते हैं कि सार्वजनिक यात्रा के मामले में रेलवे सबसे कम प्रभावित हुआ है, फिर भी चूंकि हालात पहले से बहुत अलग हैं इसलिए रेलवे को दोबारा पहले जैसे संचालन और सेवा में लौटने के लिए एक साल या उससे ज़्यादा समय लग सकता है. रेलवे अपनी तरफ से कोशिश कर रहा है कि यात्रियों को सुरक्षित यात्रा का भरोसा दे सके लेकिन अब यात्रा के फैसले पहले से पूरी तरह अलग हो चुके हैं, इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता.

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