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एक उदार अंग्रेज़ की वजह से शुरू हुआ था ब्रिटिश इंडियन आर्मी का भारतीयकरण

पहले विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना का दुर्लभ चित्र.

पहले विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना का दुर्लभ चित्र.

भारत और भारतीय सेना (Indian Defense) के इतिहास में 25 अगस्त की तारीख काफी अहमियत रखती है क्योंकि 103 साल पहले इसी दिन सेना के भारतीयकरण की शुरूआत हुई थी. इस ऐतिहासिक दिन के बाद ही भारतीय फौजियों (Indian Soldiers) को अंग्रेज़ी अफसरों के बराबर ओहदे मिलने का रास्ता खुला था.

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    समय था पहले विश्व युद्ध (World War-I) का. यानी आज़ादी से पहले ब्रिटिश इंडियन आर्मी (British Indian Army) मूलत: भारतीयों की ही फौज थी लेकिन इसे ब्रिटिश सेना के तौर पर दुनिया जानती थी. इस आर्मी का मकसद ब्रिटिश इंडिया (British India) और शाही रियासतों की हिफाज़त करना था, लेकिन पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश फौज के तौर पर भारतीय फौज ने हिस्सा लिया था. इस फौज ने पहले विश्व युद्ध में जिस तरह की बहादुरी और कौशल का परिचय दिया, उसके बाद ब्रिटिशों का ध्यान भारतीय फौजियों की तरफ गया.

    25 अगस्त 1917 के दिन ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेवाएं देने वाले 7 चुनिंदा भारतीयों को ब्रितानी राजा की मुहर वाली कमीशन रैंक (Commissioned Ranks) दी गई. यह पहला पुख्ता कदम था, जब ब्रिटिश इंडियन आर्मी का भारतीयकरण हुआ था क्योंकि कमीशन रैंक के अफसर सेना में आला मुकाम हुआ करते थे. पहला विश्व युद्ध खत्म होने से पहले दो और भारतीय फौजियों को कमीशन अफसर बनाया गया.

    गुलाम भारत के सुरक्षा बलों में भारतीयों को कभी आला मुकाम नहीं मिला था, लेकिन पहली बार जब कमीशन रैंक मिली, तो इसे सेना के भारतीयकरण के तौर पर देखा गया. इसके बाद गोरों के बराबर भारतीयों को हक दिए जाने की राह खुली. हालांकि ब्रिटिश अफसरों की जगह भारतीयों को ही सेना में रखने के मुद्दे पर विवाद होता रहा.

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    सिरका में 1915 की इस दुर्लभ तस्वीर में बॉम्बे पैदल सेना की पहली रे​जीमेंट के जवान सिगनल तैयार करते हुए दिखते हैं.


    एक ब्रिटिश अफसर का रोल था अहम
    1917 से 1922 तक भारत में स्टेट सेक्रेट्री रहे ब्रिटेन के उदारवादी राजनेता एडविन मोंटैगू ने भारतीय फौजियों की सेवाओं और वीरता की कद्र करते हुए कमीशन रैंक दिए जाने में अहम भूमिका निभाई थी. यही नहीं, मोंटैगू आर्मी और सिविल सेवाओं में नस्ल के आधार पर भेदभाव के खिलाफ थे.

    कुछ ब्रिटिश अफसर थे विरोधी
    एक तरफ मोंटैगू थे तो दूसरी तरफ 19वीं सदी में काफी कामयाब रह चुके ब्रिटिश कमांडर फ्रेडरिक रॉबर्ट्स थे. रॉबर्ट्स ने युद्ध में भारतीय सैनिकों के साहस की तारीफ तो की थी, लेकिन वो मानते थे कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए था, जिससे आगे चलकर भारत में शख्सियतें या लीडर पैदा हो सकें. ऐसी ही सोच के एक और ब्रिटिश फौजी क्लॉडे ऑचिनलेक थे, जो सेना के भारतीयकरण के खिलाफ थे. यही क्लॉडै दूसरे विश्वयुद्ध के समय इंडियन आर्मी के कमांडर इन चीफ भी रहे थे.

    भारत में स्वराज की नींव
    मोंटैगू और चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट आने के बाद 1918 में भारत के स्वराज के सिद्धांत की नींव रखी गई. इस सिद्धांत के तहत भारतीय आर्मी ऑफिसर कॉर्प्स को पूरी तरह स्वतंत्र किए जाने की प्रक्रिया शुरू होना थी लेकिन दूसरे विश्व युद्ध तक यह सिद्धांत केवल सिद्धांत तक ही सीमित रह गया और व्यावहारिक नहीं हो सका. लेकिन वास्तव में, यह रिपोर्ट एक तरह से भारतीय फौजियों की बहादुरी का इनाम थी.

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    पहले विश्व युद्ध में जनरल रह चुके रॉलिनसन ने 1921 में माना था कि स्वाधीन भारत का कोई मतलब नहीं होगा अगर भारत की सेना स्वतंत्र नहीं होगी. अगर ब्रिटिश ही सेना के संचालक बने रहेंगे तो भारत अपना प्रशासन लेकर करेगा भी क्या! लेकिन ये सब बातों और सिद्धांतों के स्तर तक ही सिमट कर रह गया और इन बातों पर अमल नहीं हुआ.

    तीन साल बाद फिर भारतीयकरण की कवायद
    मोंटैगू व चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के तीन साल बाद भी आर्मी के भारतीयकरण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका था. 1921 में जब भारत की विधायी सभा ने मांग रखी कि मिलिट्री भर्ती के लिए एक कमेटी बनाई जाने संबंधी एक नीति होना चाहिए, तब आर्मी के भारतीयकरण संबंधी नीति बनाने के लिए लॉर्ड रॉलिंग को चेयरमैन बनाया गया और एक कवायद शुरू हुई.

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    मोंटैगू और चेम्सफोर्ड ने भारतीय स्वराज संबंधी कई सुधार प्रस्तावित करने वाली रिपोर्ट पेश की थी.


    रॉलिंग ने माना कि भारतीय फौजियों को कुशल अफसर के रूप में खुद को साबित करने का मौका मिलना चाहिए था. इसके बाद भारतीय सैनिकों को प्रमोशन दिए गए, हाई रैंक्स दी जाने लगीं और भारतीय कैडेट्स को इंग्लैंड की रॉयल मिलिट्री अकादमी भेजा जाने लगा. इन नए प्रशिक्षित अफसरों को बाद में इंग्लैंड के राजा के कमीशन अफसर की हैसियत दी गई, जो ब्रिटिश अफसरों से किसी भी लिहाज़ से कम नहीं थे.

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