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देश में पेश होता रहा है घाटे का बजट, क्या होता है ये और इसका असर

देश में पेश होता रहा है घाटे का बजट, क्या होता है ये और इसका असर

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हमारे देश में हर बार बजट घाटे का ही पेश किया गया है. आखिर इसकी वजह क्या है. क्यों ज्यादातर देशों का बजट घाटे का ही होता है. सरकार (Government) के पास इस तरह का बजट अपनाने की खास वजह होती है. जानते हैं कि इस तरह के बजट और इनसे पड़ने वाले असर के बारे में.

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    भारत का बजट आजादी के बाद से घाटे का ही पेश होता रहा है. आमतौर दुनियाभर के देश घाटे का बजट ही पेश करते हैं. दुनिया के बहुत नाममात्र के देश हैं, जिनका बजट घाटे की बजाए मुनाफे का होता है. 2022-23 के भारत के बजट में राजस्व घाटा जीडीपी का 6.4 फीसदी रहने का अनुमान है. 2021-22 में संशोधित राजस्व घाटा जीडीपी का 6.9% बताया गया है.

    भारत का पहला बजट सिर्फ साढ़े सात महीने 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक के लिए पेश किया गया था. इसमें करीब 171 करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया, जबकि अनुमानित खर्च करीब 197 करोड़ रुपये का था.

    क्या होता है ये
    घाटे के बजट में सरकार आमदनी से ज्यादा खर्च का प्रावधान करती है. इसे घाटे की वित्त व्यवस्था भी कहा जाता है. जब सरकार के पास लोक कल्याणकारी योजनाओं के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता है तब सरकार इस तरह का बजट पेश करती है.

    लेकिन घाटे का क्यों
    घाटे का बजट साधारण किस्म का बजट नहीं होता है. निजी क्षेत्र की किसी भी कंपनी में इस तरह का बजट देखने को नहीं मिलता है. निजी क्षेत्र का लक्ष्य खर्चा करना नहीं बल्कि मुनाफा कमाना होता है, लेकिन सरकार का लक्ष्य विकास करना होता है. लोगों के लिए बड़े स्तर की मूलभूत सुख सुविधाओं और उनकी स्थितियों को बेहतर करने की जिम्मेदारी भी सरकार की होती है. इसलिए सरकार आमदनी से ज्यादा खर्च की वजह से घाटे के बजट को अपनाती है.

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    सरकारें इस तरह के बजट (Deficit budget) में कर (Tax) और कर्ज (Borrowing) के जरिए अपनी आमदनी हासिल करती है.

    आम आदमी पर क्या होता है असर
    घाटे बजट में आम आदमी का कैसा प्रभाव पड़ता है. यह काफी कुछ सरकारी की बजट की नीतियों और घोषणाओं पर होता है. यही वजह है कि सरकार का बजट देश की अर्थव्यवस्था का आइना होता है. क्योंकि इसमें सरकार बताती है कि वह अपने खर्चों के लिए पैसा कैसे जुटाएगी. इसके लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर लगाने के अलावा सरकार वित्तीय बाजार से कर्ज भी ले सकती है. सरकार यह घोषणा भी करती है.

    और बाजार पर असर
    बजट का बाजार पर सीधा असर होता है. इसकी वजह एक नहीं बल्कि कई हैं. जहां सरकार कई वस्तुओं की कीमतों को प्रभावित करने का काम केवल कर लगाकर ही नहीं करती. बल्कि उन वस्तुओं के निर्माण सामग्री पर कर, उनके परिवहन को प्रभावित करने वाले पेट्रोल-डीजल के दाम भी कम ज्यादा कर सकती है.

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    घाटे के बजट (Deficit budget) से महंगाई बढ़ने का अंदेशा होता है.

    और ये वाला बाजार
    आमतौर पर बाजार का एक मतलब शेयर बाजार भी होता है जिसका बजट पर सीधा असर भी होता है. जब हम शेयर बाजार की बात करते हैं तो हम एक तरह से देश में निवेश के माहौल की बात कर रहे हैं. देश में बेहतर आर्थिक माहौल के लिए विदेशी कंपनियों और निवेशकों को विश्वास  होना चाहिए कि देश में निवेश सुरक्षित है और उनके निवेश को रिटर्न मिलेगा. सरकार की निवेश के अनुकूल नीतियां और बजट निवेशकों को आकर्षित करती हैं.

    क्या कोई खतरा भी है घाटे के बजट से
    घाटे के बजट का सबसे बड़ा खतरा है महंगाई बढ़ना. घाटे के बजट से ज्यादा पैसा बाजार में आता है जिससे महंगाई बढ़ जाती है. यह पैसा केंद्रीय बैंक की ओर से आता है. हालात बिगड़ने पर मंदी भी आ सकती है. दूसरी ओर कई बार आर्थिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और उन्हें बढ़ाने के लिए भी बाजार में पैसा डालना पड़ता है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि यह पैसा आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा दे नहीं तो मंदी और खतरनाक हो जाती है.

    Tags: Budget, Finance minister Nirmala Sitharaman, Fiscal Deficit, Nirmala Sitaraman

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