चुनाव लड़ने वाली पहली महिला कमलादेवी हमेशा मुद्दों के लिए लड़ीं

सरोजिनी नायडू के साथ कमलादेवी चट्टोपाध्याय.

सरोजिनी नायडू के साथ कमलादेवी चट्टोपाध्याय.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अभिनेत्री, सामाजिक कार्यकर्ता, कला प्रेमी, राजनीतिक और फेमिनिस्ट कमलादेवी चट्टोपाध्याय (Also Known As Kamaladevi Chatterjee) भारतीय संस्कृति और इतिहास में अपनी अनूठी छाप रखती हैं. जानिए कि तकरीबन भुला दी गई इस महान महिला का योगदान कितना अहम रहा.

  • News18India
  • Last Updated: September 13, 2020, 11:26 AM IST
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1920 का दशक... यह वो समय था जब महिलाएं (Indian Women) घरों की चारदीवारी और चूल्हे चौके में ही कैद रहा करती थीं, तब कमलादेवी का रुझान राजनीति (Indian Politics) में हो चुका था. 1923 में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के असहयोग आंदोलन से जुड़ने के लिए लंदन (London) से भारत लौटीं कमलादेवी की माग्रेट कजन्स (Margret Cousins) के साथ मुलाकात कई नतीजों वाली साबित हुई. कांग्रेस के सेवा दल से जुड़ीं कमलादेवी ने कजन्स की संस्था वीमन्स कॉन्फ्रेंस (All India Women's Conference) के महासचिव पद की ज़िम्मेदारी संभाली. कजन्स की पहल से महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला था, लेकिन चुनाव लड़ने (Poll Contest) का तब भी नहीं.

यहां से कमलादेवी ने बीड़ा उठाया और कजन्स के नक्शे कदम पर चलते हुए महिलाओं के चुनाव लड़ने के अधिकार के लिए संघर्ष किया. 1926 में जब मद्रास प्रांतीय विधान परिषद के लिए चुनावों से ऐन पहले महिलाओं को चुनाव लड़ने की इजाज़त मिली. और, कमलादेवी भारत की पहली महिला बनीं, जिन्होंने राजनीतिक व्यवस्था में चुनाव लड़ा.

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कस्तूरबा गांधी के साथ कमलादेवी चट्टोपाध्याय.




'कमलादेवी चट्टोपाध्याय- ए बॉयोग्राफी' किताब में लेखक रीना नंदा इस चुनाव के बारे में दिलचस्प फैक्ट्स बता चुकी हैं कि कैसे बहुत कम समय में कमलादेवी के पति मशहूर कवि व नाटककार हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय सहित महिला कार्यकर्ताओं ने नाटकों और गीतों के ज़रिये ज़ोरदार प्रचार किया. हालांकि कमलादेवी चुनाव हार गई थीं, लेकिन उनके लिए कई दरवाज़े खुल चुके थे. 1927-28 में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की सदस्य बनीं कमलादेवी आज़ादी के बाद राजनीतिक पद लेने से मना कर आजीवन मुद्दों के लिए संघर्ष करती रहीं.
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कितना अहम है कमलादेवी को जानना?
मद्रास प्रेसिडेंसी में मैंगलोर में 1903 को जन्मीं कमलादेवी बहुमुखी प्रतिभाओं की धनी थीं और गुलाम भारत के समय से आज़ाद भारत और फिर नए भारत के निर्माण में प्रमुख भूमिकाओं में रहीं. उनकी कुछ भूमिकाओं और उपलब्धियों के बारे में कुछ पॉइंट्स में जानिए.

* आज़ादी से पहले कमलादेवी ने बाल विवाह के ख़िलाफ़ और सहमति की उम्र जैसे क़ानूनों साथ ही रजवाड़ों में आंदोलन पर कांग्रेस की नीति तय करने में प्रमुख रोल निभाया था.
* महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह में महिलाओं की भागीदारी उन्होंने ही सुनिश्चित करवाई थी.
* कमलादेवी के साहस के चर्चे तब हुए, जब वो नमक सत्याग्रह के बाद 'फ्रीडम सॉल्ट' लेकर पहले स्टॉक एक्सचेंज और फिर हाई कोर्ट पहुंच गईं और जज को भी 'आज़ादी का नमक' बेचने से भी नहीं हिचकिचाईं.
* कमलादेवी के पिता कलेक्टर थे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनका बाल विवाह करवाया गया. वह बाल विधवा हुईं और बाद में उन्होंने सरोजिनी नायडू के भाई हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय से अपनी मर्ज़ी से शादी की. चूंकि कमलादेवी विधवा थीं इसलिए उनकी इस शादी पर कई सवाल खड़े किए गए. बाद में हरींद्रनाथ से तलाक के वक्त भी सवाल उठे, लेकिन वो कभी डरी नहीं.

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* कन्नड़ भाषा की पहली मूक फिल्म 'मृच्छकटिका' में कमलादेवी ने तब अभिनय किया था, जब यह काम समाज के नज़रिये से महिलाओं के लिए नहीं माना जाता था. इसके बाद, कमलादेवी ने 1940 के दशक में तानसेन, शंकर पार्वती और धन्ना भगत जैसी फिल्मों में काम किया था.
* आज़ादी के बाद कमलादेवी ने शरणार्थियों को बसाने का बीड़ा उठाया. आज उस जगह को फरीदाबाद कहा जाता है. इसके अलावा, सहकारिता आंदोलन में उन्होंने इंडियन कोऑपरेटिव यूनियन की स्थापना करवाई.
* लोककलाओं, शास्त्रीय कलाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया. कमलादेवी ने जो इंडियन नेशनल थिएटर बनाया था, वही बाद में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के तौर पर विकसित हुआ. साथ ही, संगीत नाटक अकादमी की स्थापना के पीछे भी वही रहीं.
* कमलादेवी खुद एक लेखक थीं. महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी पहली किताब 1929 में छपी थी. साल 1982 में छपी उनकी आखिरी किताब भी स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के संघर्ष की गाथा पर आधारित थी.

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गूगल ने डूडल बनाकर कमलादेवी को याद किया था. (Google Doodle)


कुल मिलाकर, फरीदाबाद जैसे नगर और एनएसडी जैसी कई संस्थाओं को जन्म देने वाली कमलादेवी को एक ज़माने में कामराज राज्यपाल बनाना चाहते थे और जवाहरलाल नेहरू भी राज़ी थे, लेकिन वो खुद किसी राजनीतिक पद लेने को तैयार नहीं थीं. बहरहाल, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित की गईं कमलादेवी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी नारीवादी आंदोलन से जुड़ी रही थीं और महिलाओं व देश की आज़ादी के लिए उन्होंने कई महत्वपूर्ण कदम और जोखिम उठाए थे.
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