बापू के प्रिय और कांग्रेस अध्यक्ष रहे अंसारी कैसे रहे आज़ादी के 'अनसंग हीरो'

बापू के प्रिय और कांग्रेस अध्यक्ष रहे अंसारी कैसे रहे आज़ादी के 'अनसंग हीरो'
स्वतंत्रता सेनानी मुख्तार अहमद अंसारी की याद में डाक टिकट.

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में शुमार मुख्तार अहमद अंसारी आज़ादी की लड़ाई में योगदान के बावजूद वो तवज्जो नहीं पा सके,​ जिसके हकदार रहे. इतिहास और अंसारी रोड, दिल्ली स्थित यादगार कोठी के हवालों से जानें कि 10 मई 1936 को दुनिया को विदा कहने वाले अंसारी को क्यों याद किया जाना चाहिए.

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इससे पहले कि आप ये जानें कि क्यों स्वतंत्रता संग्राम (India Freedom Struggle) सेनानी मुख्तार अहमद अंसारी (Dr M. A. Ansari) को आज़ादी के इतिहास (History) और नायकों की यादों में बराबर तवज्जो नहीं मिली, आपको यह जानना ही होगा कि अंसारी अस्ल में थे कौन और उनका योगदान क्या था. फिर ये जानेंगे कि उनकी यादों को संजोने के किस तरह की कोशिशें कामयाब नहीं हुईं.

देश के शुरूआती सर्जन थे अंसारी
साल 1896 में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के गाज़ीपुर से हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद अंसारी अपने भाइयों के पास हैदराबाद (Hyderabad) गए और उच्च शिक्षा हासिल की. ग्रैजुएशन के बाद मद्रास मेडिकल कॉलेज (Madras Medical College) में उन्हें निज़ाम स्कॉलरशिप से दाखिला मिला क्योंकि वह बेहतरीन विद्यार्थी थे. एमडी और एमएस की डिग्री टॉप रहकर पाने के बाद उन्हें लंदन (London) के लॉक अस्पताल में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया. यह उपलब्धि किसी भारतीय के नाम नहीं रही थी.

भारत के शुरूआती सर्जन अंसानी ने इसके बाद लॉक अस्पताल के साथ ही, लंदन के ही चेयरिंग क्रॉस अस्पताल के लिए भी बेहतरीन सेवाएं दीं. इसके नतीजे में आज भी चेयिरिंग क्रॉस अस्पताल में अंसारी की याद में अंसारी वार्ड बना हुआ है.
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20वीं सदी के पूर्वार्ध में लंदन स्थित लॉक अस्पताल का चित्र, जहां अंसारी रजिस्ट्रार रहे.




कांग्रेस के दर्शक से अध्यक्ष बनने में लगे 29 साल
मद्रास में पढ़ाई के दौरान 1898 में पहली बार अंसारी ने आनंद मोहन बोस की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में दर्शक के तौर पर भाग लिया था. 1927 में जब मद्रास में अगली बार कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तब खुद अंसारी उसके अध्यक्ष थे. इन 29 सालों में लंदन में रहते हुए अंसारी का जुड़ाव कांग्रेस के नेताओं से बना रहा. इसी जुड़ाव के चलते वह लंदन की सुख सुविधा की ज़िंदगी छोड़कर भारत आए और मुस्लिम लीग व कांग्रेस से जुड़कर राजनीति में सक्रिय हुए, लेकिन उन्होंने यहां भी अपनी मेडिकल प्रैक्टिस लगातार जारी रखी.

तुर्की के लिए विशेष मिशन
राष्ट्रवादी नेता कहे जाने वाले अंसारी खिलाफत आंदोलन के मुखर समर्थक रहे थे. बालकन युद्ध के समय तुर्की सैनिकों के इलाज के लिए मेडिकल मिशन में अंसारी की प्रमुख भूमिका थी. पश्चिमी क्रूरता के विरोध में छह महीनों तक भारतीयों खासकर भारतीय मुस्लिमों ने ओटोमान साम्राज्य के सैनिकों के लिए यह मिशन चलाया था, जिसके तहत चंदे के ज़रिये मिली रकम से दवाएं और मेडिकल उपकरण तुर्की पहुंचाए गए थे.

जिन्ना से अलगाव और गांधी का साथ
कांग्रेस में मुस्लिमों और भारतीय ​मुस्लिमों की तरक्की के लिए एक दृष्टि और कई गतिविधियां करने वाले अंसारी धर्म के आधार पर बंटवारे के समर्थक कभी नहीं थे. 1920 के दशक में जब मुस्मिल लीग में मोहम्मद अली जिन्ना का प्रभुत्व बढ़ा और बंटवारे की राजनीति को हवा मिलने लगी, तब अंसारी ने महात्मा गांधी के विचारों को तरजीह देते हुए कांग्रेस के साथ नज़दीकियां और मज़बूत कीं.

मुझे लगता है कि आपसी भाईचारा ही इकलौता सूत्र है. नस्ल या धर्म के आधार पर अगर कोई बंटवारा होता है, तो मेरे खयाल से, यह नकली और स्वेच्छाचारी कदम होगा.
मुख्तार अहमद अंसारी


जामिया मिल्लिया के चांसलर
भारतीय मुस्लिमों की तरक्की के लिए अंसारी का विज़न यही था कि बेहतर शिक्षा संस्थान हों और लोग शिक्षित हों. इसी नज़रिये के चलते दिल्ली में जामिया मिल्लिया की स्थापना में अंसारी शामिल रहे और इस यूनिवर्सिटी के प्रमुख संस्थापक हकीम अजमल खान के 1927 में गुज़रने के बाद से अपने जीवन तक अंसारी ही चांसलर रहे. उल्लेखनीय है कि 1936 में मृत्यु के बाद अंसारी को उनकी प्रिय रही इसी यूनिवर्सिटी के परिसर में दफ्न किया गया.

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दिल्ली के दरियागंज में स्थित अंसारी रोड का एक हिस्सा.


अंसारी क्यों बन गए अनसंग हीरो
आज़ादी के बाद गांधी, नेहरू और पटेल जैसे व्यक्तित्व इतिहास लेखन के केंद्र में रहे तो वहीं, क्षेत्रों और समुदायों के इतिहास के केंद्र में भी कई नायक रहे. मसलन, बोस और चितरंजन बंगाल में, राजगोपालाचारी तमिलनाडु में, लाला लाजपत राय पजाब में और मदनमोहन मालवीय उत्तर प्रदेश में बड़े नायकों की फेहरिस्त में शुमार रहे और इनके बारे न सिर्फ लेखन खूब हुआ बल्कि इनकी यादों को भी कई तरह से संजोया गया. मुशीरुल हसन अपनी किताब में लिखते हैं कि अंसारी दूसरी श्रेणी के नेताओं में रहे, जिन्हें क्षेत्र और समुदायों तक ने भुला दिया.

क्या हो सकते हैं भुलाने के कारण?
अंसारी को जानबूझकर भुलाया गया हो, ऐसा नहीं है लेकिन फिर भी कुछ कारण तलाशे जाएं तो हसन की किताब में कहा गया है कि अंसारी अपने समकालीन मुस्लिम नेताओं की तुलना में शायद कम करिश्माई व्यक्तित्व वाले या कम प्रभावशाली नेता रहे. दूसरी ओर, एक प्रमुख कारण यह मान्यता भी रही कि भारत के बंटवारे की थ्योरी के संदर्भ में कांग्रेस न तो मुस्लिम लीग पर हावी हो सकी और न ही भारतीय मुस्लिमों का साथ कमा सकी इसलिए कांग्रेस के मुस्लिमों को खास तवज्जो नहीं दी गई.

कैसे सहेजा गया अंसारी का योगदान?
अंसारी की मृत्यु के बाद 14 मई 1936 को आसफ अली ने गांधीजी से बात करते हुए अंसारी की यादों को बड़े पैमाने पर संजोने के प्रस्ताव रखे थे. गांव गांव तक पहुंच रखने वाली 'अंसारी ट्रैवलिंग डिस्पेंसरी' और 'अंसारी मेडिकल कॉर्प्स' के रूप में उनकी यादों को अमर करने के प्रस्ताव थे, लेकिन इन्हें कभी अमली जामा नहीं पहनाया जा सका. बस दिल्ली में अंसारी की जो हवेली थी, दरियागंज में उस गली को अंसारी रोड का नाम दिया गया. नंबर 1 अंसारी रोड, आज भी उस कोठी का पता है, जहां अंसारी का काफी इतिहास जज़्ब है.

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दरियागंज स्थित एमए अंसारी की यादगार कोठी.


और 'दारुस्सलाम' का किस्सा भी
अंसारी की कोठी दारुस्सलाम यानी 'शांति का ठिकाना' अब वहां रहने वाले डॉ. जैन द्वारा कई मायनों में अब भी संरक्षित है. गांधीजी जब भी​ दिल्ली आया करते थे, तब अक्सर अंसारी इसी कोठी में उनके रुकने का इंतज़ाम करते थे. इसके अलावा यह कोठी अरुणा आसफ अली और मनुभाई शाह जैसे क्रांतिकारियों के छुपने का ठिकाना भी हुआ करती थी. यहीं अंसारी की मेडिकल प्रैक्टिस चलती थी और यहीं कांग्रेस की बैठकें हुआ करती थीं.

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