मैन V/S मशीन : क्या देश ने उस तरह विकास किया, जैसा गांधीजी चाहते थे?

मैन V/S मशीन : क्या देश ने उस तरह विकास किया, जैसा गांधीजी चाहते थे?
इस मंदिर में महात्मा गांधी का चरखा, मेज, लकड़ी से बना कलम स्टैंड, आसन और बिस्तर वैसा ही है जैसा उन्होंने इसका इस्तेमाल किया था.

#GANDHI@150 : क्या महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) पूरी तरह औद्योगिकीकरण (industrialization) के खिलाफ थे? क्या समय के साथ पूरी तरह बदल गए थे गांधीजी के विचार?

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  • Last Updated: September 27, 2019, 7:02 PM IST
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'मैं यंत्र मात्र (Machine) का विरोधी नहीं हूं, लेकिन जो यंत्र हमारा स्वामी बन जाए, उसका मैं सख़्त विरोधी हूं.' आज की दुनिया मशीनों के मनुष्य पर हावी हो जाने (Mechanical Life) के समय के रूप में दर्ज हो रही है. ऐसे में, 80 साल पुराना महात्मा गांधी का यह विचार प्रासंगिक है, सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं. आर्टिफि​शियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) की बात हो या रोज़मर्रा के जीवन में मशीनों पर निर्भरता की, समय यह सोचने का है कि मशीनें हमारे नियंत्रण में हैं या हालात इसके उलट हैं. मशीनों या उद्योगों (Industries) को लेकर महात्मा गांधी के विचार जानकर आपको खुद तय करना चाहिए कि आप किस तरफ होना चाहेंगे.

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क्या गांधी मशीनों और औद्योगिकीकरण (Machines & Industry) के खिलाफ थे? या उन्हें इससे जुड़े विचारों के लिए पुरातनपंथी (Pre-Modernist) क्यों कहा गया? मशीनों पर गांधी ने विस्तार से विमर्श किया है, जिसे समझना चाहिए. इससे पहले ये जानें कि गांधी का समय 20वीं सदी (20th Century) की शुरूआत का समय था, जब भारत में मशीनों व उद्योगों को लेकर शुरूआत हो रही थी और तकरीबन आधी सदी के बीच किस तरह राष्ट्रपिता (Father of Nation) महात्मा गांधी इस बारे में अपने विचारों (Gandhian Philosophy) को समय की ज़रूरतों के हिसाब से ​परिभाषित करते रहे.



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गांधीजी हमेशा गांव केंद्रित और कुटीर उद्योग के विकास के पक्ष में थे और औद्योगिकीकरण के खतरों को लेकर चेताते थे.

क्या गांधी के विचार दकियानूसी थे?
ब्रितानी साम्राज्यवाद के खिलाफ क्रांतिकारी नेता के तौर पर जो आलोचक महात्मा गांधी के सामाजिक और आर्थिक नज़रिए की आलोचना करते हैं, वो उन्हें प्रतिक्रियावाद या पुराने खयालात का बताते हैं. 1909 में 'हिंद स्वराज' में गांधी के लिखे नज़रिए 'प्रकृति की तरफ लौटना होगा' का हवाला देकर उन्हें पुरानी अर्थव्यवस्था का हिमायती कहा जाता है. लेकिन ये आलोचक भूल जाते हैं कि दुनिया में जब औद्योगिकीकरण की पहली पहली लहरें उठी थीं, तब यानी 18वीं सदी में स्विस दार्शनिक जीन जैक्स रूसो ने भी यही बात कही थी. और ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण व जीवन के तमाम खतरों के समय में हम कह सकते हैं कि ये विचार तब भी ध्यान देने लायक थे.

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मशीनों पर कैसे बदले गांधी के सुर?
'ये मशीनरी ही है, जिसने भारत को गरीब बना दिया.' 'मशीनरी आधुनिकता का प्रतीक है लेकिन बहुत बड़ा पाप भी है.' 'इन मशीनों ने बम्बई की मिलों के कामगारों को गुलाम बना दिया है.' 'मशीनों को लेकर हमारा पागलपन ऐसे ही बढ़ा तो हमारा देश एक दुखी ज़मीन बन जाएगा.' 1909 में महात्मा गांधी ने अपनी किताब हिंद स्वराज में इस तरह के कई विचार रखे थे. गांधी की ही एक और चर्चित पुस्तक सर्वोदय में भी इससे जुड़े कई संदर्भों का ज़िक्र है.

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चरखा भी तो एक मशीन ही था, इस मुद्दे को लेकर शोधगंगा के एक लेख में लिखा गया कि 1909 में गांधी जी मशीनों और औद्योगिकीकरण के फर्क को पूरी तरह समझे नहीं थे. 1921 में यंग इंडिया में गांधीजी ने खुद लिखा भी 'मैं उस तरह की मशीनों का स्वागत करूंगा, जिनके उपयोग से भारत की गरीबी और आलस दूर हो सके'. इसके साथ ही, गांधीजी ने चरखे के विकास को तब भी तरजीह दी.

क्या पूरी तरह बदल गए थे विचार?
1925 में यंग इंडिया में गांधीजी ने इस विषय पर फिर चर्चा करते हुए कहा था​ कि अगर मशीनों के ज़रिए पूंजी कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित होती है और बड़ी आबादी का शोषण होता है तो यह स्थिति स्वीकार नहीं की जाना चाहिए. फिर 1926 में उन्होंने लिखा कि भाप और बिजली के यंत्रों का इस्तेमाल हमें सावधानी से करना होगा कि उद्योग हावी न हो जाएं. 30 के दशक में भी गांधीजी ने मशीनों की तो कुछ ज़रूरत मानी लेकिन उद्योगों को लेकर सतर्कता की बात पर ज़ोर दिया. साथ ही, उनका नज़रिया इस पर केंद्रित था कि भारत गांवों में बसता है, खेती उसका धर्म है इसलिए मशीनों को गांव और कृषि का सहयोगी होना चाहिए न कि विरोधी.

'मैं मानता हूं कि कुछ काम के उद्योग ज़रूरी हैं. मैं आक्रामक समाजवाद का हामी नहीं हूं. मैं एक्शन में विश्वास रखता हूं. कुल मिलाकर मैं उद्योगों को बेलगाम छोड़ने के बजाय उन पर राज्य के नियंत्रण की बात करूंगा ताकि बड़ी आबादी मिल जुलकर काम कर सकें.'


1946 में 'हरिजन' पत्र में गांधीजी के इस विचार को उनका बड़ा बदलाव माना गया और समझा गया कि उन्होंने औद्योगिकीकरण को मंज़ूर कर लिया.

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महात्मा गांधी लगातार किताबें और पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन करते रहे.


कितने अपनाए गए गांधीजी के विचार?
मशीनी द्वंद्व को लेकर गांधीजी ने हमेशा यही कहा कि भारत की गरीबी की बड़ी वजहों में गांवों की अर्थव्यवस्था और लादी गई बेरोज़गारी को अनदेखा किया जाना रहा. हालांकि आज़ाद भारत में जब नेहरू सरकार बनी तो आर्थिक विकास के गांधीवादी विचार को एक तरह से नहीं अपनाया गया. उसके बाद आधुनिकता और बड़े स्तर पर औद्योगिकीकरण की दौड़ में जुड़ चुके भारत में कुटीर उद्योगों और ग्राम स्वराज से जुड़े कुछ कार्यक्रम शुरू किए गए. ऐसे कार्यक्रम गांधीजी के विचारों के प्रति श्रद्धा तो जताते रहे लेकिन आज़ादी के 70 साल बाद भी कहा जा सकता है कि गांधी के विचारों की आत्मा को नहीं, देश ने उन विचारों के ब्रांड को ही अपनाया.

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