चीन को रोक पाना अब अमेरिका के लिए क्यों है नामुमकिन?

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Updated: September 9, 2019, 3:52 PM IST
चीन को रोक पाना अब अमेरिका के लिए क्यों है नामुमकिन?
न्यूज़18 क्रिएटिव.

अमेरिका और चीन (US & China) के बीच जो ट्रेड वॉर (Trade War) जारी है, क्या उसका अंजाम एक भयानक युद्ध भी हो सकता है? इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारतीय अर्थशास्त्री (Indian Economist) रघुराम राजन (Raghuram Rajan) की राय क्या है?

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कारोबार के मोर्चे पर हर रोज़ एक नया खतरा पैदा हो रहा है. अमेरिका और चीन के बीच जो ट्रेड वॉर (US China Trade War) यानी व्यापार युद्ध चल रहा है, उसकी भूमिका और खतरों के बारे में आप क्या जानते हैं? इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ (Global Expert) क्या राय रखते हैं? अब तक दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच रिश्ते बनाने के लिए जो पुल थे, क्या वही खाई में तब्दील हो जाएंगे और क्या इन हालात से सिर्फ आर्थिक त्रासदी (Economic Calamity) ही नहीं बल्कि सैन्य संघर्ष (Military Conflict) तक बात पहुंच सकती है?

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बात ​अब सिर्फ ट्रेड वॉर की या थोड़े समय के मतभेदों की नहीं रह गई है. अंग्रेज़ी अखबार मिंट में प्रकाशित एक लेख में आरबीआई के पूर्व गवर्नर और शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रघुराम राजन (Raghuram Rajan) ने साफ लिखा है कि चीन न केवल आर्थिक बल्कि सैन्य स्तर पर भी अमेरिका के लिए चुनौती के रूप में (China America Relations) खड़ा है. यह पूरा घटनाक्रम एक तरह से अमेरिका के दुनिया के अधिपति होने वाली मानसिकता और उसके तहत बनी पूरी व्यवस्था (Global Trade System) को चुनौती देने का समय है.

कैसे बनी थी 'सबका साथ सबका विकास' की नीति?

दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के समय युद्ध में शामिल हर देश की अर्थव्यवस्था तकरीबन चौपट होने के मुहाने पर थी. ऐसे में अमेरिका ने दुनिया की सभी ताकतों से अपील करते हुए ये विचार रखा था कि सभी देश मिलकर इस तरह कारोबारी रिश्ते बनाएं कि एक दूसरे की मदद से सभी देश एक साथ विकास के रास्ते पर चल सकें. ये सैद्धांतिक शुरुआत लंबे समय तक ईमानदारी रही नहीं और सबके स्वार्थ आड़े आने लगे. अमेरिका अपने ही इस नियम को तोड़कर अपने फायदे के कदम उठाता रहा.

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चीन न केवल आर्थिक बल्कि सैन्य स्तर पर भी अमेरिका के लिए चुनौती है और विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रेड वॉर सैन्य संघर्ष का कारण भी बन सकता है. फाइल फोटो.

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ये हुआ 'सबके विकास' के सिद्धांत का हश्र?
जी7 देशों पर अपने प्रभाव और प्रभुत्व को अमेरिका मज़बूत करता चला गया. इस तरह की ग्लोबल व्यापार व्यवस्था से केवल यूएसएसआर बाहर रहा क्योंकि वह दुनिया की राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक ताकत का दूसरा ध्रुव बना रहा. भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके रघुराम राजन ने लिखा है कि अमेरिका ने धीरे धीरे दुनिया में सिरमौर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के चक्कर में कई देशों के साथ कारोबारी रिश्तों में अपने स्वार्थ को तरजीह दी.

इस व्यवस्था को लेकर विकासशील देशों में विरोध शुरू हुआ और वहां के नीति निर्माताओं ने अपनी अर्थव्यवस्था और इंटैलैक्चुअल प्रॉपर्टी के अधिकारों के लिए अपनी नीतियों की वकालत शुरू की. इनमें एक बड़ा देश बनकर चीन उभरा, जिसने तकनीक के क्षेत्र में लोहा मनवाया. तो जो ग्लोबल ट्रेड का मूल सिद्धांत था 'सबके साथ से सबका विकास' हो, वह टूट चुका है और लगातार टूट रहा है. राजन लिखते हैं कि चीन की रफ्तार को कुछ कम ज़रूर कर सकता है लेकिन अमेरिका अब उसे रोक पाने की स्थिति में नहीं है.

'अपने गिरेबान में झांके अमेरिका'
राजन ने लिखा है कि विकास की राह पर बढ़ते हुए देश अपनी भलाई चाह रहे हैं और उनका यही कहना है कि अमेरिका ने अपने विकास की राह में जिन स्टैंडर्ड्स को नहीं माना, अब दूसरे विकासशील देशों पर वो कैसे इस तरह के नियम थोप सकता है. न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने की बात हो या कोयले का इस्तेमाल बंद करने की, ऐसी शर्तें एक अमीर देश, विकासशील देशों पर थोपेगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था तो नहीं कहलाएगी.

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राजन के मुताबिक संभव है कि सारे बड़े देश एक साथ आकर एक नई विश्व व्यवस्था बनाने जैसा कदम उठाने के बारे में सोच भी रहे हों. फाइल फोटो.


अब क्या हैं आगे के खतरे?
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? अस्ल में, इंटैलैक्चुअल प्रॉपर्टी का मुद्दा हो, पर्यावरण का या निरस्त्रीकरण का, हर मुद्दा आखिर में कारोबार की एक धमकी बन रहा है. रिश्ते जो टूट रहे हैं या टूट चुके हैं, अब उनमें विश्वास दोबारा कायम हो पाना भी टेढ़ी खीर लग रहा है. राजन के मुताबिक संभव है कि सारे बड़े देश एक साथ आकर एक नई विश्व व्यवस्था बनाने जैसा कदम उठाने के बारे में सोच भी रहे हों. दुनिया का एक अधिपति किसी को मंज़ूर न हो. लेकिन क्या ये व्यवस्था मुमकिन होगी? अगर हां तो कैसे? पिछली बार इसके लिए एक वैश्विक तनाव, विश्व युद्ध और त्रासदियों के सिलसिले की कीमत अदा करना पड़ी थी, इस बार क्या होगा?

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First published: September 9, 2019, 2:57 PM IST
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