सवा सौ साल पहले क्या गौरक्षा मुहिम की वजह से हुए थे बम्बई के भीषण दंगे?

क्या आप जानते हैं कि गौ रक्षा आंदोलन का इतिहास देश के पश्चिमी प्रांत में क्या रहा? वर्तमान मुंबई जब बॉम्बे प्रेसिडेंसी था, तब पहली बार आज ही के दिन भीषण दंगे क्यों हुए थे? जानें इतिहास के पन्नों से एक महत्वपूर्ण कहानी.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 11, 2019, 4:37 PM IST
सवा सौ साल पहले क्या गौरक्षा मुहिम की वजह से हुए थे बम्बई के भीषण दंगे?
1946 में बम्बई में हुए दंगों के दौरान की दुर्लभ आर्काइव तस्वीर.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 11, 2019, 4:37 PM IST
बम्बई (Bombay/Mumbai) के दंगों की बात छिड़ते ही बाबरी कांड (Babri Structure Demolition) के बाद हुए 1992-93 के दंगों की याद आती है, जिसमें करीब 700 लोग मारे गए थे. लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि इन दंगों से ठीक सौ साल पहले बम्बई प्रेसिडेंसी में जो सांप्रदायिक दंगे (Communal Riots) हुए थे, उन्हें इस राज्य के पहले दुर्भाग्यपूर्ण और भीषण फसाद के तौर पर याद किया जाता है. इतिहास के पन्नों में दर्ज इन दंगों के समय कैसे अंग्रेज़ों ने 'फूट डालो राज करो' (Divide And Rule) की नीति अपनाई थी और अस्ल में, दंगों के पीछे क्या कारण थे? ये बातें जानने के साथ ही आपके लिए ये जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि इन दंगों के दौरान 'गाय' (Cow) का क्या एंगल था.

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बॉम्बे प्रेसिडेंसी, उस वक्त एक राज्य की तरह था जिसमें वर्तमान गुजरात (Gujarat) का बड़ा हिस्सा शामिल था. आबादी के लिहाज़ से उस वक़्त बम्बई में तकरीबन 20 फीसदी मुसलमान (Muslim Population) थे, जिनकी आबादी चाकला, उमरखड़ी, खारा तलाव और दूसरे नागपाड़ा जैसे इलाकों में 60 फीसदी के आसपास थी. बाकी हिस्सों में हिंदुओं की आबादी (Hindu Population) ज़्यादा थी और कुछ इलाकों में तो 90 फीसदी तक हिंदू ही रहा करते थे. पारसी और ईसाई संप्रदाय अल्पसंख्यक होते हुए भी महत्वपूर्ण आबादी थे क्योंकि कारोबार और व्यवस्था वगैरह ज़्यादातर इन्हीं के हाथ में थी. अब, आज से सवा सौ पहले हुए दंगों के बारे में जानिए.

1893 के भीषण दंगे

इन सांप्रदायिक दंगों के बारे में जो जानकारी है, उसके अनुसार 11 अगस्त 1893 को बम्बई में तब दंगे भड़के थे, जब दक्षिण बम्बई स्थि​त मशहूर जुमा मस्जिद से कुछ मुसलमान जुम्मे की नमाज़ के बाद निकले और उन्होंने पास की हनुमान गली में हमला बोल दिया. वो ज़माना सूचना प्रौद्योगिकी से महरूम था इसलिए अगले दो दिनों के भीतर इस बारे में सूचनाएं फैलीं और फिर भीषण दंगों की शुरूआत हुई. करीब 11 दिन बाद 22 अगस्त 1893 को ये दंगे थमे और आर्मी भी तैनात कर दी गई थी. 25 हज़ार दंगाइयों के हमलों में करीब 75 जानें गईं, मंदिर, मस्जिदें और दुकानों जैसी 300 से ज़्यादा इमारतें तोड़ी या जलाई गईं और सैकड़ों लोग घायल हुए थे.

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आर्काइव से हासिल साल 1890 के चित्र में बम्बई का कालबादेवी रोड इलाका ऐसा दिखता था.

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क्या ये दंगे गाय की वजह से हुए थे?
तत्कालीन कार्यकारी पुलिस कमिश्नर आर एच विन्सेंट ने अपनी रिपोर्ट में बगैर किसी संकोच के ​कहा था 'हिंदुओं में गौ-वध को लेकर रोष था और वो उसका लगातार विरोध कर रहे थे. इसी के कारण दो संप्रदायों में दुर्भावनाएं बढ़ीं और ये दंगे हुए'. ये बात अस्ल में, पूरा सच नहीं थी और विन्सेंट ने ब्रितानिया हुकूमत के उस सिद्धांत को बल देने के लिए कही थी, जिससे देश के दो समुदायों के बीच मनमुटाव और दूरी और बढ़े यानी फूट डालो और राज करो की नीति थी.

पूरा सच क्या था?
ईपीडब्ल्यू ने 'बम्बई में 1893 के दंगे' विषय पर शशिभूषण उपाध्याय का एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें लिखा गया था कि 'दंगे खत्म होने के बाद इतिहासकार व लेखक पीबी जोशी ने सचिव को लिखा था कि इन दंगों के पीछे वास्तविक कारण गौ-वध को लेकर रोष नहीं बल्कि प्रभास पट्टन का मामला था'. यही नहीं, उस वक्त के राजनीतिक और सामाजिक व्यक्तित्व बाल गंगाधर तिलक ने भी विन्सेंट के इस तरह के बयान का खंडन किया था.

इन दंगों के विषय पर ही ईपीडब्ल्यू ने मीना मेनन का लेख प्रकाशित किया था, जिसमें दर्ज है कि तिलक ने अपने अखबार केसरी में लिखा था 'इन दंगों को गौ रक्षा आंदोलन से जोड़ने का जो काम टाइम्स ऑफ इंडिया ने किया है, वह केवल मुसलमानों को और भड़काने का ही मंसूबा ज़ाहिर करता है'. इस तरह के संदर्भ ये स्पष्ट करते हैं गौ रक्षा आंदोलन इन दंगों का कारण बताना अंग्रेज़ों की चाल थी, लेकिन यहां दो सवाल उठते हैं, एक प्रभास पट्टन मामला क्या था और दूसरा ये गौ रक्षा आंदोलन क्या था, जिसकी इतनी चर्चा हुई.

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लोकमान्य बालगंगाधर तिलक.


पहले जानें गौ रक्षा आंदोलन क्या था
इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात ये थी कि ये किसी हिन्दू ने शुरू नहीं किया था. 28 जुलाई 1887 को गौरक्षक सभा या गौरक्षा मंडली के नाम से एक संस्था बनी थी, जिसके अध्यक्ष मिल मालिक दिनशॉजी मानेकजी पेटिट थे. इस संस्था ने गाय और भैंसों को काटे जाने से बचाने की मुहिम छेड़ी थी, जिससे मुसलमानों में नाराज़गी थी क्योंकि उनके कारोबार पर असर पड़ने वाला था. मुसलमानों के कुछ समूहों ने इसे दुर्भावनापूर्ण आंदोलन करार दिया था, जबकि इस आंदोलन को धीरे धीरे हिंदुओं का काफी समर्थन मिलने लगा था.

फरवरी 1890 में सूरत में तिलकचंद ताराचंद ने एक नोटिस जारी कर मुसलमानों के साथ गौ रक्षा को लेकर एक बैठक करने की अपील की लेकिन रांदेर के मौलवी हफ़ीज़ ग़ुलाम मोहम्मद ने इस कदम का विरोध किया और इसे मुसलमानों के हितों के लिए गलत बताया. मेनन के ​लेख में उल्लेख है कि यह बैठक नहीं हुई लेकिन इसके बाद हिंदुओं ने चंदा इकट्ठा कर गायों के लिए शेल्टर बनाने की कवायद शुरू की. इसी तरह के ज़ुबानी हमले आगे भी चलते रहे और दोनों पक्षों में इस आंदोलन को लेकर एक दूसरे के प्रति खटास तो पनप ही रही थी.

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साल 1915 में लिया गया बम्बई स्थित विक्टोरिया टर्मिनस का दुर्लभ चित्र.


फिर प्रभास पट्टन का मामला
ब्रिटिश राज में मुसलमानों के राज यानी सत्ताएं अंग्रेज़ छीन चुके थे और मुसलमान नई स्थितियों के लिए समझ बना ही रहे थे कि तभी अंग्रेज़ों ने कई तरीकों से सांप्रदायिक भेदभाव का ज़हर बोना शुरू कर दिया था. तिलक के जीवन पर आधारित सोनाली ​हर्डिकर व राजर्षि नंदी के लेख के मुताबिक 25 जुलाई 1893 को एक मामूली बहस के बाद बम्बई की सीमा से लगे हिंदू तीर्थ प्रभास पट्टन, जिसे सोमनाथ पट्टन भी कहा जाता है, में एक सांप्रदायिक संघर्ष हुआ जिसमें मुसलमानों के हमले से 11 हिंदू मारे गए. इस दंगे की खबर तेज़ी से फैली. कुछ दिनों में बम्बई प्रेसिडेंसी में दंगे छिड़े.

तो फिर अंग्रेज़ों ने मानी ग़लती?
अंग्रेज़ों ने विन्सेंट की टिप्पणी पर कूटनीतिक रवैया अपनाया और जोशी व तिलक जैसे व्यक्तित्वों के विरोध के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना बयान बदला. शशिभूषण के लेख में कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार ने कहा कि 'गवर्नमेंट इन काउंसिल इस बात पर असहमत है कि गौ रक्षा आंदोलन दंगों का मुख्य कारण था. प्रभास पट्टन में जो हुआ, उसकी प्रतिक्रिया देश के कई हिस्सों में दंगे के रूप में हुई'. ​फिर फूट डालने वाला हथकंडा अपनाते हुए इसी बयान में ये भी कहा गया 'इन दंगों के पीछे इस बात के संकेत हैं कि मुसलमान अपने आप को हिंदुओं के हाथों परेशान महसूस कर रहे थे'. ये भी कहा गया कि गौ रक्षा आंदोलन ने आग में घी का काम किया था.

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1893 में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद.


और इस घटना की विडंबना क्या थी?
बम्बई प्रेसिडेंसी में हुए सांप्रदायिक दंगों का समय ही विडंबना था. ये वही समय था, जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में धर्म संसद में भाग लेकर भारत की सभ्यता, सनातन धर्म और सर्वधर्म समभाव के भारतीय दर्शन व सामाजिक ताने बाने का गुणगान कर रहे थे और भारतीय संस्कृति को दुनिया के लिए अनुकरणीय बता रहे थे. ये भी गौरतलब है कि 1893 से पहले हिंदू-मुसलमान संप्रदायों के बीच इतने बड़े या गंभीर स्तर के दंगे फसाद नहीं हुए थे और दोनों ही वर्ग अंग्रेज़ों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की दिशा में साथ ही थे.

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First published: August 11, 2019, 4:31 PM IST
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